2027 यूपी विधानसभा चुनाव: 115 सीटों पर सियासी गणित, BJP-SP के मुकाबले में BSP और चंद्रशेखर कितने अहम?

अभिषेक कुमार की रिपोर्ट
लखनऊ(राष्ट्र की परम्परा डेस्क)। उत्तर प्रदेश में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव को लेकर सियासी सरगर्मी तेज होने लगी है। देश की राजनीति में उत्तर प्रदेश की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है। राज्य की सत्ता पर काबिज दल का असर राष्ट्रीय राजनीति और दिल्ली की सत्ता के समीकरणों पर भी दिखाई देता है। ऐसे में 2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक दलों ने अभी से अपनी रणनीति को धार देना शुरू कर दिया है।
मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों में भारतीय जनता पार्टी (BJP) और समाजवादी पार्टी (SP) के बीच मुख्य मुकाबला नजर आ रहा है। हालांकि बहुजन समाज पार्टी (BSP) और आजाद समाज पार्टी (कांशीराम) भी चुनावी समीकरणों को प्रभावित करने की क्षमता रखती हैं। मायावती जहां बसपा के पुराने जनाधार को दोबारा मजबूत करने की कोशिश में जुटी हैं, वहीं चंद्रशेखर आजाद के नेतृत्व वाली आजाद समाज पार्टी दलित वोटों के बीच अपनी पकड़ बढ़ाने की रणनीति पर काम कर रही है।
PDA बनाम हिंदुत्व की रणनीति
समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव लगातार अपने PDA यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक समीकरण को मजबूत करने पर जोर दे रहे हैं। सपा के लिए यह सामाजिक गठजोड़ आगामी चुनाव में भाजपा को चुनौती देने का प्रमुख आधार माना जा रहा है।
दूसरी ओर भाजपा का जोर हिंदुत्व, विकास और सरकार की योजनाओं के साथ अपने पारंपरिक सामाजिक समीकरण को मजबूत रखने पर है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के लगातार प्रदेश के अलग-अलग हिस्सों में दौरे और विकास परियोजनाओं की घोषणाओं को भी चुनावी रणनीति के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
2024 लोकसभा चुनाव ने बदला 115 सीटों का गणित
इन 115 विधानसभा क्षेत्रों के राजनीतिक समीकरण को समझने के लिए 2024 के लोकसभा चुनाव के आंकड़े महत्वपूर्ण हैं। लोकसभा चुनाव में इन विधानसभा क्षेत्रों में समाजवादी पार्टी-कांग्रेस गठबंधन को कुल 67 सीटों पर बढ़त मिली थी। इनमें 54 विधानसभा क्षेत्रों में सपा और 13 में कांग्रेस आगे रही।
वहीं भाजपा 47 विधानसभा क्षेत्रों में बढ़त बनाने में सफल रही थी। उसकी सहयोगी राष्ट्रीय लोकदल (RLD) को भी एक विधानसभा क्षेत्र में बढ़त मिली थी।
हालांकि 2022 के विधानसभा चुनाव की तस्वीर इससे काफी अलग थी। उस चुनाव में इन 115 सीटों में भाजपा ने 71 सीटों पर जीत दर्ज की थी। अपना दल (सोनेलाल) और निषाद पार्टी ने क्रमशः तीन और दो सीटें जीती थीं।
समाजवादी पार्टी को 33 सीटों पर जीत मिली थी। उस समय सपा के गठबंधन सहयोगी रहे राष्ट्रीय लोकदल और सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी को क्रमशः तीन और दो सीटों पर जीत मिली थी। कांग्रेस सिर्फ एक सीट जीतने में सफल रही थी।
115 विधानसभा सीटों के भीतर 43 लोकसभा सीटें
इन 115 विधानसभा क्षेत्रों के अंतर्गत कुल 43 लोकसभा सीटें आती हैं। 2024 के लोकसभा चुनाव में इनमें से 21 सीटों पर समाजवादी पार्टी ने जीत दर्ज की, जबकि कांग्रेस के खाते में तीन सीटें गईं। भाजपा और उसके सहयोगी दलों ने 19 लोकसभा सीटों पर जीत हासिल की।
कांग्रेस ने रायबरेली, सहारनपुर और बाराबंकी में जीत दर्ज की। वहीं समाजवादी पार्टी के खाते में मैनपुरी, इटावा, आजमगढ़, फिरोजाबाद, रामपुर, गाजीपुर, फतेहपुर, अंबेडकर नगर, श्रावस्ती, कैराना और जालौन जैसी प्रमुख सीटें गईं।
भाजपा ने आगरा, गोरखपुर, अमरोहा, बुलंदशहर, गाजियाबाद, कुशीनगर, पीलीभीत, हाथरस, गौतम बुद्ध नगर, देवरिया, अलीगढ़, झांसी और महाराजगंज सहित कई सीटों पर जीत हासिल की। राष्ट्रीय लोकदल ने बागपत और बिजनौर में जीत दर्ज की।
योगी आदित्यनाथ का किन इलाकों पर फोकस?
2027 के चुनाव से पहले मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के प्रदेश के अलग-अलग हिस्सों में हो रहे दौरे भी राजनीतिक नजरिए से चर्चा में हैं। मुख्यमंत्री ने 24 अगस्त को रायबरेली का दौरा किया था। इस दौरान करीब 879 करोड़ रुपये की परियोजनाओं का उद्घाटन और शिलान्यास किया गया। इनमें बछरावां, हरचंदपुर और रायबरेली विधानसभा क्षेत्रों से जुड़ी परियोजनाएं शामिल थीं।
खास बात यह है कि 2024 के लोकसभा चुनाव में इन तीनों विधानसभा क्षेत्रों में कांग्रेस को बढ़त मिली थी। ऐसे में इन क्षेत्रों में मुख्यमंत्री का दौरा राजनीतिक रूप से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
मुख्यमंत्री ने 26 जुलाई को मैनपुरी में भी कार्यक्रम किया था। मैनपुरी लंबे समय से समाजवादी पार्टी का मजबूत राजनीतिक गढ़ माना जाता है और अखिलेश यादव के राजनीतिक प्रभाव वाले क्षेत्रों में इसकी विशेष अहमियत है।
इसी तरह अयोध्या-फैजाबाद क्षेत्र भी भाजपा की रणनीति में महत्वपूर्ण है। 2024 के लोकसभा चुनाव में यहां भाजपा को बड़ा राजनीतिक झटका लगा था। इसके बाद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अयोध्या में कई दौरे किए और विकास परियोजनाओं की सौगात दी।
गोरखपुर मुख्यमंत्री का गृह क्षेत्र होने के कारण पहले से ही भाजपा की राजनीति में महत्वपूर्ण है। वहीं वाराणसी पर भी भाजपा का विशेष फोकस माना जाता है, क्योंकि यह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का संसदीय क्षेत्र है।
मायावती और चंद्रशेखर आजाद बिगाड़ सकते हैं समीकरण
2027 के विधानसभा चुनाव में बसपा और आजाद समाज पार्टी की भूमिका को नजरअंदाज करना आसान नहीं होगा। राजनीतिक विश्लेषकों का एक वर्ग मानता है कि मायावती अगर बसपा के पुराने दलित जनाधार को काफी हद तक वापस लाने में सफल होती हैं तो चुनावी मुकाबले पर इसका सीधा असर पड़ सकता है।
बसपा के वोटों का बिखराव किस दिशा में होता है, यह भी चुनावी परिणामों के लिए महत्वपूर्ण होगा। यदि बसपा का वोट अलग-अलग दलों में बंटता है तो इसका लाभ भाजपा को मिल सकता है। वहीं यदि बसपा का प्रभावी वोट सपा-कांग्रेस गठबंधन की ओर जाता है तो भाजपा के सामने चुनौती बढ़ सकती है।
दूसरी ओर चंद्रशेखर आजाद पश्चिमी उत्तर प्रदेश की करीब 45 विधानसभा सीटों पर अपनी राजनीतिक पकड़ मजबूत करने की कोशिश में हैं। यदि आजाद समाज पार्टी का सपा या कांग्रेस के साथ किसी तरह का चुनावी तालमेल बनता है तो पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कई सीटों पर मुकाबला और अधिक दिलचस्प हो सकता है।
हालांकि यदि चंद्रशेखर आजाद की पार्टी अलग चुनाव लड़ती है, तो विपक्षी वोटों के बंटवारे की स्थिति में इसका फायदा भाजपा को मिलने की संभावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता।
2027 में किसके पक्ष में बनेगा माहौल?
2022 और 2024 के चुनावी आंकड़ों को साथ रखकर देखें तो उत्तर प्रदेश में राजनीतिक मुकाबले की तस्वीर लगातार बदल रही है। 2022 में भाजपा मजबूत स्थिति में थी, जबकि 2024 के लोकसभा चुनाव में सपा-कांग्रेस गठबंधन ने कई विधानसभा क्षेत्रों में अपनी स्थिति मजबूत की।
अब 2027 में भाजपा अपनी सरकार के कामकाज, हिंदुत्व और संगठनात्मक ताकत के सहारे मैदान में उतरने की तैयारी में है। सपा PDA समीकरण को विस्तार देने की कोशिश में है। बसपा अपने पुराने सामाजिक आधार को फिर से खड़ा करने की चुनौती से जूझ रही है, जबकि आजाद समाज पार्टी दलित राजनीति में अपनी जगह बनाने की कोशिश कर रही है।
यही वजह है कि 2027 का चुनाव सिर्फ भाजपा बनाम सपा का सीधा मुकाबला नहीं रह सकता। दलित वोटों की दिशा, पिछड़े वर्गों का रुझान, मुस्लिम मतदाताओं की रणनीति और छोटे दलों के गठबंधन—ये सभी कारक चुनावी नतीजों की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
आने वाले महीनों में राजनीतिक दलों के गठबंधन, उम्मीदवारों के चयन और क्षेत्रवार रणनीति स्पष्ट होने के साथ उत्तर प्रदेश का चुनावी गणित और अधिक दिलचस्प होने की उम्मीद है।