
अमेरिका-ईरान सैन्य तनाव के बीच होर्मुज जलडमरूमध्य पर ईरान की नई रणनीति ने वैश्विक चिंता बढ़ा दी है। यदि समुद्री आवाजाही पर वास्तविक प्रतिबंध लागू हुआ तो इसका असर तेल की कीमतों से लेकर वैश्विक व्यापार और भारत की ऊर्जा सुरक्षा तक पड़ सकता है।
तेहरान से लेकर वाशिंगटन तक बढ़ते सैन्य तनाव के बीच दुनिया की निगाहें अब होर्मुज जलडमरूमध्य पर टिक गई हैं। ईरान की सर्वोच्च राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के नए प्रमुख मोहसेन रेज़ाई ने सरकारी टेलीविजन पर संकेत दिया है कि ईरान इस रणनीतिक समुद्री मार्ग के आसपास एक नया ‘एक्सक्लूजन ज़ोन’ यानी वर्जित क्षेत्र घोषित करने की तैयारी कर रहा है। यह घोषणा आने वाले दिनों या हफ्तों में हो सकती है।
यदि यह केवल राजनीतिक चेतावनी नहीं बल्कि वास्तविक समुद्री प्रतिबंध में बदलती है, तो इसका असर अमेरिका और ईरान की लड़ाई से कहीं आगे जाएगा। दुनिया के ऊर्जा बाजार, समुद्री परिवहन, बीमा उद्योग और उन देशों की अर्थव्यवस्थाएं प्रभावित हो सकती हैं जो खाड़ी क्षेत्र से तेल और गैस आयात करते हैं।
होर्मुज क्यों है इतना महत्वपूर्ण?
होर्मुज जलडमरूमध्य फारस की खाड़ी को ओमान की खाड़ी और आगे अरब सागर से जोड़ता है। भौगोलिक रूप से यह अपेक्षाकृत संकरा समुद्री मार्ग है, लेकिन वैश्विक ऊर्जा व्यापार में इसकी भूमिका असाधारण है।
इसी रास्ते से खाड़ी क्षेत्र के बड़े तेल उत्पादक देशों का कच्चा तेल और पेट्रोलियम उत्पाद अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक पहुंचते हैं। इसलिए होर्मुज में तनाव का अर्थ केवल एक समुद्री मार्ग पर तनाव नहीं, बल्कि वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति की नस पर दबाव है।
अमेरिकी ऊर्जा मंत्री क्रिस राइट के मुताबिक संघर्ष से पहले इस मार्ग से प्रतिदिन औसतन करीब 90 लाख बैरल तेल गुजरता था। क्षेत्रीय पाइपलाइनों को जोड़ने पर मौजूदा तेल प्रवाह संघर्ष से पहले के स्तर का लगभग दो-तिहाई या उससे अधिक बताया जा रहा है।
यही कारण है कि होर्मुज में किसी भी तरह की नाकेबंदी, सैन्य कार्रवाई या जहाजों की आवाजाही पर रोक की आशंका बाजारों को तुरंत प्रभावित कर सकती है।
ईरान का ‘एक्सक्लूजन ज़ोन’ प्लान कितना गंभीर?
रेज़ाई के अनुसार प्रस्तावित क्षेत्र अमेरिकी नौसैनिक नाकेबंदी वाले इलाके से शुरू होकर होर्मुज जलडमरूमध्य की दिशा में फारस की खाड़ी तक फैल सकता है। उनका संकेत है कि इस क्षेत्र में प्रवेश करने वाले और होर्मुज से गुजरने की कोशिश करने वाले जहाजों की पहचान होने पर उन्हें ईरान की प्रतिबंध सूची में डाला जा सकता है।
लेकिन यहां सबसे बड़ा सवाल यह है कि ईरान जिस क्षेत्र को अमेरिकी नौसैनिक नाकेबंदी की शुरुआत मान रहा है, उसकी वास्तविक और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वीकार्य सीमा क्या होगी?
यही अस्पष्टता आने वाले दिनों में सबसे बड़ा जोखिम बन सकती है। समुद्र में जब दो विरोधी सैन्य शक्तियां एक-दूसरे की गतिविधियों को अलग-अलग तरीके से परिभाषित करती हैं, तो किसी छोटी घटना के भी बड़े सैन्य टकराव में बदलने की आशंका बढ़ जाती है।
अमेरिका की नाकेबंदी और ईरान की प्रतिक्रिया
अमेरिका की रणनीति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा ईरान के तेल निर्यात पर दबाव बढ़ाना बताया जा रहा है। अमेरिकी सेना के अनुसार इस अभियान में 20 से अधिक युद्धपोत लगाए गए हैं। रविवार तक 92 वाणिज्यिक जहाजों का मार्ग बदले जाने और तीन जहाजों को निष्क्रिय किए जाने की जानकारी भी अमेरिकी पक्ष ने दी।
ईरान इसे अपने आर्थिक और सामरिक हितों पर सीधा दबाव मान रहा है। ऐसे में तेहरान का एक्सक्लूजन ज़ोन प्रस्ताव अमेरिकी दबाव का जवाब हो सकता है।
यानी मामला अब केवल मिसाइलों और हवाई हमलों तक सीमित नहीं रह गया है। समुद्री मार्ग स्वयं संघर्ष का हथियार बनता दिखाई दे रहा है।
एक ड्रोन और बढ़ता अविश्वास
रविवार को ईरान ने दावा किया कि उसने होर्मुज में प्रवेश करने की कोशिश कर रहे एक अमेरिकी मानवरहित जहाज को निशाना बनाया। अमेरिका ने इस दावे को पूरी तरह झूठ बताया।
यह घटना भले ही दोनों पक्षों के अलग-अलग दावों के बीच उलझ गई हो, लेकिन इसका राजनीतिक महत्व बड़ा है। जब सैन्य गतिविधियों की जानकारी पर भी दोनों देशों के दावे एक-दूसरे के बिल्कुल विपरीत हों, तब किसी भी समुद्री घटना की सही तस्वीर सामने आने में समय लग सकता है।
यही स्थिति दुर्घटनावश सैन्य टकराव के खतरे को बढ़ाती है।
कूटनीति की विफलता सबसे बड़ी चिंता
अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत विफल होने के बाद सैन्य तनाव का दोबारा बढ़ना इस संकट को और गंभीर बनाता है। रेज़ाई ने पाकिस्तान, कतर और ओमान जैसे संभावित मध्यस्थ देशों की भूमिका पर भी सवाल उठाए हैं।
तेहरान का संदेश साफ दिखाई देता है—भविष्य में केवल मौखिक आश्वासन पर्याप्त नहीं होंगे। ईरान अधिक ठोस और भरोसेमंद गारंटी चाहता है।
यह बात इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि सैन्य संघर्ष के बीच संवाद के रास्ते बंद होना अक्सर संकट को लंबा खींच देता है। मध्यस्थ देशों की भूमिका तभी प्रभावी होती है जब दोनों पक्ष उनके आश्वासनों पर भरोसा करें।
दुनिया पर क्या होगा असर?
अगर होर्मुज के आसपास जहाजों की आवाजाही वास्तव में बाधित होती है, तो पहला झटका वैश्विक तेल बाजार को लग सकता है।
तेल की कीमतें बढ़ सकती हैं।
समुद्री बीमा महंगा हो सकता है।
जहाजों के मार्ग बदलने से परिवहन लागत बढ़ सकती है।
ऊर्जा आयात करने वाले देशों पर दबाव बढ़ सकता है।
तेल महंगा होने का असर पेट्रोल-डीजल तक सीमित नहीं रहता। परिवहन लागत बढ़ने से खाद्य पदार्थों, औद्योगिक उत्पादों और रोजमर्रा की वस्तुओं की कीमतों पर भी असर पड़ सकता है।
भारत जैसे बड़े ऊर्जा आयातक देश के लिए यह स्थिति विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल से आयात बिल बढ़ सकता है और इसका दबाव महंगाई तथा रुपये की विनिमय दर पर भी पड़ सकता है।
ईरान के लिए भी जोखिम कम नहीं
हालांकि होर्मुज पर दबाव बनाना ईरान के लिए सामरिक हथियार हो सकता है, लेकिन इसका इस्तेमाल जोखिम से खाली नहीं है।
ईरान स्वयं भी इस क्षेत्र के आर्थिक महत्व से परिचित है। यदि समुद्री मार्ग लंबे समय तक बाधित होता है, तो वैश्विक दबाव तेहरान पर और बढ़ सकता है। खाड़ी देशों की अर्थव्यवस्थाओं और अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजारों पर असर पड़ने से ईरान को कूटनीतिक रूप से भी मुश्किल परिस्थितियों का सामना करना पड़ सकता है।
इसलिए एक्सक्लूजन ज़ोन की घोषणा जितनी महत्वपूर्ण होगी, उससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण यह देखना होगा कि ईरान इसे किस तरह लागू करता है।
असली खतरा ‘गलत अनुमान’ का है
इस पूरे संकट का सबसे खतरनाक पहलू शायद यही है कि अमेरिका और ईरान दोनों सैन्य दबाव बढ़ा रहे हैं, जबकि संवाद का रास्ता कमजोर पड़ चुका है।
समुद्र में युद्धपोत, वाणिज्यिक जहाज, ड्रोन और तेल टैंकर एक ही क्षेत्र में सक्रिय हों तो किसी गलत पहचान, गलत सूचना या गलत सैन्य निर्णय से स्थिति अचानक नियंत्रण से बाहर जा सकती है।
होर्मुज की समस्या इसलिए केवल ईरान-अमेरिका विवाद नहीं है। यह वैश्विक अर्थव्यवस्था की समस्या बन सकती है।
होर्मुज को युद्ध का मैदान नहीं बनने देना होगा
ईरान का प्रस्तावित ‘एक्सक्लूजन ज़ोन’ एक चेतावनी है कि संघर्ष अब जमीन और आसमान से निकलकर समुद्र की जीवनरेखा तक पहुंच गया है। अमेरिका अपनी सैन्य और आर्थिक शक्ति से ईरान पर दबाव बढ़ा रहा है, जबकि तेहरान अपने सबसे प्रभावशाली सामरिक विकल्पों में से एक—होर्मुज—का इस्तेमाल करने के संकेत दे रहा है।
लेकिन किसी भी पक्ष के लिए यह भूलना खतरनाक होगा कि होर्मुज केवल ईरान या अमेरिका का मामला नहीं है। इस रास्ते से गुजरने वाला ऊर्जा व्यापार दुनिया के अनेक देशों की अर्थव्यवस्थाओं को प्रभावित करता है।
युद्ध में जीत-हार का फैसला मिसाइलों से हो सकता है, लेकिन उसकी कीमत अक्सर आम जनता तेल, महंगाई और रोजगार के रूप में चुकाती है।
इसलिए आज जरूरत सैन्य धमकियों की नहीं, बल्कि ऐसे प्रभावी कूटनीतिक तंत्र की है जो समुद्री मार्गों की सुरक्षा सुनिश्चित करे और दोनों पक्षों को बातचीत की मेज पर वापस लाए। यदि होर्मुज जलडमरूमध्य सचमुच संघर्ष का अगला मोर्चा बन गया, तो इसका झटका पूरी दुनिया महसूस करेगी।