Wednesday, June 17, 2026
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बाबा बालेश्वर नाथ मंदिर पर प्रशासन का कब्जा, अदालत ने सिटी मजिस्ट्रेट को सौंपी जिम्मेदारी

बाबा बालेश्वर नाथ मंदिर का प्रबंधन अब प्रशासन के हाथ, अदालत के फैसले से खत्म हुआ वर्षों पुराना विवाद


बलिया (राष्ट्र की परम्परा)। उत्तर प्रदेश के बलिया जिले में स्थित प्रसिद्ध बाबा बालेश्वर नाथ मंदिर के प्रबंधन को लेकर वर्षों से चला आ रहा विवाद अब अदालत के ऐतिहासिक फैसले के बाद समाप्त हो गया है। अपर जिला जज (प्रथम) बलिया की अदालत ने मंदिर का संपूर्ण प्रबंधन जिला प्रशासन को सौंपते हुए सिटी मजिस्ट्रेट, बलिया को मंदिर का रिसीवर नियुक्त किया है। इस निर्णय को मंदिर व्यवस्था में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है।
अदालत के आदेश के अनुसार अब मंदिर की दुकानों से मिलने वाला किराया, दानपात्र में आने वाली धनराशि और अन्य आय स्रोत प्रशासनिक निगरानी में रहेंगे। न्यायालय ने सिटी मजिस्ट्रेट को निर्देश दिया है कि तीन महीने के भीतर मंदिर की आय-व्यय का विस्तृत विवरण अदालत में प्रस्तुत किया जाए। इसके लिए चार्टर्ड अकाउंटेंट की सहायता लेने की भी अनुमति दी गई है, ताकि वित्तीय व्यवस्था पूरी तरह पारदर्शी रह सके।
मामला उस कथित कमेटी से जुड़ा था, जिसे मूल रूप से एक विद्यालय की समिति बताया गया और जिसने मंदिर प्रबंधन पर दावा किया था। मंदिर के सेवायतों और पुजारियों ने इस दावे का विरोध करते हुए लंबी कानूनी लड़ाई लड़ी। विवाद चिट फंड कार्यालय, आजमगढ़ से होते हुए कमिश्नरी और उच्च न्यायालय तक पहुंचा। हाईकोर्ट के निर्देश पर इसकी सुनवाई बलिया अदालत में हुई।
अदालत ने अपील संख्या 78/2016 “बाबा बालेश्वर नाथ मंदिर बनाम उदयभान श्रीवास्तव व अन्य” में 23 अप्रैल 2024 को पूर्व की कमेटी को निरस्त कर दिया। फैसले के बाद प्रशासनिक कार्रवाई भी तेज हो गई है। सिटी मजिस्ट्रेट ने वर्तमान प्रबंधकों को तत्काल उपस्थित होने का निर्देश दिया है।
प्रशासन ने मंदिर के दानपात्रों और महत्वपूर्ण कक्षों पर नियंत्रण स्थापित करने की प्रक्रिया भी शुरू कर दी है। सुरक्षा और पारदर्शिता को ध्यान में रखते हुए कई स्थानों पर ताले लगाए जा रहे हैं। विवाद से जुड़े विपक्षी पक्षों को अब मंदिर प्रबंधन से पूरी तरह अलग कर दिया गया है।
स्थानीय श्रद्धालुओं और नागरिकों में अदालत के फैसले को लेकर सकारात्मक प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है। लोगों का मानना है कि अब मंदिर की आय का उपयोग विकास कार्यों, श्रद्धालुओं की सुविधाओं और व्यवस्थाओं को बेहतर बनाने में किया जाएगा। यह फैसला धार्मिक संस्थानों के पारदर्शी संचालन की दिशा में एक महत्वपूर्ण उदाहरण माना जा रहा है।

23 हजार रुपये ने तोड़े रिश्ते, भाइयों के बीच खूनी बवाल

23 हजार रुपये के विवाद में खून-खराबा: भाइयों ने भाई का काटा कान, महराजगंज के गांव में दहशत


महराजगंज (राष्ट्र की परम्परा )। श्यामदेंउरवा थाना क्षेत्र के ग्राम पंचायत श्यामदेंउरवा में पारिवारिक विवाद ने रविवार को हिंसक रूप ले लिया। पिता के ब्रह्मभोज के बाद बचे 23 हजार रुपये के उपयोग को लेकर शुरू हुआ विवाद इतना बढ़ गया कि दो सगे भाइयों पर तीसरे भाई पर धारदार हथियार से हमला करने का आरोप लगा है। हमले में युवक का कान कट गया, जिससे गांव में सनसनी फैल गई।
जानकारी के अनुसार, श्यामदेंउरवा निवासी राहुल अग्रवाल ने पुलिस को दी तहरीर में बताया कि पिता के निधन के बाद ब्रह्मभोज के आयोजन के लिए परिवार के लोगों ने आपस में धन जुटाया था। कार्यक्रम समाप्त होने के बाद करीब 23 हजार रुपये बच गए थे। राहुल ने परिवार के सभी भाइयों के उपयोग के लिए घर में सीढ़ी बनवाने का सुझाव दिया।
बताया जा रहा है कि इसी बात को लेकर भाइयों के बीच कहासुनी शुरू हो गई। विवाद धीरे-धीरे गाली-गलौज और फिर मारपीट में बदल गया। आरोप है कि राहुल के भाई राम अग्रवाल और श्याम अग्रवाल ने उस पर हमला कर दिया। इसी दौरान धारदार हथियार से किए गए वार में राहुल का कान कट गया। गले पर भी हमला करने का आरोप लगाया गया है।
घटना के बाद घायल राहुल किसी तरह मौके से भागकर अपनी जान बचाई। बाद में उसने उपचार कराने के बाद थाने पहुंचकर पुलिस को पूरी घटना की जानकारी दी। पुलिस ने पीड़ित की तहरीर के आधार पर दोनों आरोपियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर लिया है।
श्यामदेंउरवा थानाध्यक्ष अभिषेक सिंह ने बताया कि मामले की जांच की जा रही है। दोनों आरोपियों का शांति भंग की आशंका में चालान किया गया है। गांव में घटना के बाद तनाव का माहौल बना हुआ है।
छोटे पारिवारिक विवादों का इस तरह हिंसक रूप लेना समाज के लिए गंभीर चिंता का विषय बनता जा रहा है। समय रहते आपसी संवाद और समझदारी से विवादों को सुलझाना बेहद जरूरी है, ताकि रिश्ते खून-खराबे तक न पहुंचें।

मौत से जंग जीतकर लौटे दो युवक, सिद्धार्थनगर में सेना का साहसिक अभियान

सिद्धार्थनगर में बड़ा रेस्क्यू ऑपरेशन: 16 घंटे बाद पानी की टंकी से सुरक्षित निकाले गए दो युवक, सेना के हेलिकॉप्टर ने बचाई जान


सिद्धार्थनगर (राष्ट्र की परम्परा डेस्क) में शनिवार रात से चल रहे हाई वोल्टेज रेस्क्यू ऑपरेशन का रविवार सुबह सफल समापन हो गया। करीब 16 घंटे तक पानी की ऊंची टंकी पर फंसे दो युवकों को भारतीय सेना के हेलिकॉप्टर की मदद से सुरक्षित बाहर निकाल लिया गया। सुबह 5:20 बजे गोरखपुर से सेना का हेलिकॉप्टर घटनास्थल पर पहुंचा और लगभग 15 मिनट तक चले विशेष अभियान के बाद दोनों युवकों को सुरक्षित रेस्क्यू कर लिया गया।
रेस्क्यू के बाद सेना के जवान दोनों युवकों को अपने साथ गोरखपुर ले गए, जहां उनका स्वास्थ्य परीक्षण कराया जाएगा। घटना के दौरान पूरे इलाके में भारी तनाव और चिंता का माहौल बना रहा। बड़ी संख्या में ग्रामीण और स्थानीय लोग रातभर मौके पर डटे रहे।
प्रशासन ने शुरुआत में टंकी तक पहुंचने के लिए दोनों ओर से वैकल्पिक सड़क बनाने का प्रयास किया था, ताकि राहत टीम सुरक्षित तरीके से ऊपर पहुंच सके। लेकिन रात करीब 3 बजे शुरू हुई तेज बारिश ने सड़क निर्माण कार्य को पूरी तरह प्रभावित कर दिया। लगातार बिगड़ते हालात और समय की गंभीरता को देखते हुए प्रशासन ने सेना से मदद मांगी।
सेना की त्वरित कार्रवाई के बाद हेलिकॉप्टर रेस्क्यू का निर्णय लिया गया, जिसने आखिरकार दोनों युवकों की जान बचा ली। मौके पर जिलाधिकारी, अपर जिलाधिकारी, अपर पुलिस अधीक्षक, एसडीएम, सीओ सदर समेत कई प्रशासनिक अधिकारी पूरी रात निगरानी करते रहे।
स्थानीय लोगों ने सेना और प्रशासन की तत्परता की सराहना करते हुए कहा कि समय रहते लिया गया फैसला बड़ा हादसा टालने में निर्णायक साबित हुआ। पूरे ऑपरेशन के दौरान सुरक्षा व्यवस्था कड़ी रही और क्षेत्र को पूरी तरह सील कर दिया गया था।
यह रेस्क्यू अभियान सिद्धार्थनगर के हालिया वर्षों के सबसे चुनौतीपूर्ण अभियानों में गिना जा रहा है, जिसमें प्रशासन, पुलिस और सेना के बेहतर समन्वय ने दो जिंदगियां बचाने में अहम भूमिका निभाई।

भारत में दिव्यांग और वरिष्ठ नागरिकों के लिए सहायक उपकरणों की गुणवत्ता पर सख्ती, 1 मई 2026 से लागू हुए नए BIS मानक

दिव्यांगों के लिए सहायक उपकरणों की क्वालिटी में लापरवाही अब नहीं चलेगी, BIS के नए मानकों से बढ़ेगी सुरक्षा और सुलभता



समानता से सुलभता तक: वॉकिंग स्टिक, बैसाखी, ब्रेल साइनेज और व्हीलचेयर रैंप के लिए नए राष्ट्रीय मानक जारी


भारत तेजी से बदलते सामाजिक और जनसांख्यिकीय दौर से गुजर रहा है। एक ओर युवा शक्ति देश की आर्थिक ऊर्जा का आधार बनी हुई है, वहीं दूसरी ओर वरिष्ठ नागरिकों और दिव्यांगजनों की बढ़ती संख्या नई सामाजिक, स्वास्थ्य और नीतिगत चुनौतियों को सामने ला रही है। बढ़ती जीवन प्रत्याशा, बेहतर चिकित्सा सुविधाओं और आधुनिक स्वास्थ्य सेवाओं के कारण बुजुर्ग आबादी का दायरा लगातार बढ़ रहा है। साथ ही सड़क दुर्घटनाएं, औद्योगिक हादसे, जन्मजात विकृतियां और गंभीर बीमारियां भी दिव्यांगजनों की संख्या में वृद्धि का कारण बन रही हैं।
ऐसे समय में किसी भी संवेदनशील और प्रगतिशील राष्ट्र की जिम्मेदारी केवल आर्थिक विकास तक सीमित नहीं रह जाती, बल्कि समाज के कमजोर और विशेष आवश्यकता वाले वर्गों के लिए सुरक्षित, सम्मानजनक और सुलभ वातावरण तैयार करना भी उतना ही आवश्यक हो जाता है। इसी दिशा में भारत सरकार द्वारा “विकलांग” शब्द के स्थान पर “दिव्यांग” शब्द को अपनाना केवल भाषाई बदलाव नहीं, बल्कि सोच और दृष्टिकोण में परिवर्तन का प्रतीक माना गया।
इसी समावेशी सोच को आगे बढ़ाते हुए भारतीय मानक ब्यूरो (BIS) ने 1 मई 2026 से बुजुर्गों और दिव्यांगजनों के लिए उपयोग होने वाले सहायक उपकरणों के लिए नए गुणवत्ता मानक जारी किए हैं। इनमें वॉकिंग स्टिक्स, बैसाखियां, व्हीलचेयर रैंप, ब्रेल साइनेज और टैक्टाइल गाइड मैप जैसे उपकरण शामिल हैं। यह पहल न केवल सुरक्षा और गुणवत्ता सुनिश्चित करेगी, बल्कि भारत को वैश्विक गुणवत्ता मानकों के अनुरूप भी स्थापित करेगी।
इन नए मानकों का आधार भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (ICMR) द्वारा तैयार राष्ट्रीय आवश्यक सहायक उत्पाद सूची (NLEAP) को बनाया गया है। यह सूची विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की उस अवधारणा से प्रेरित है, जिसमें सहायक उपकरणों को स्वास्थ्य सेवाओं का महत्वपूर्ण हिस्सा माना गया है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि बुजुर्गों और दिव्यांगजनों को केवल उपकरण उपलब्ध ही न हों, बल्कि वे सुरक्षित, टिकाऊ, आरामदायक और अंतरराष्ट्रीय गुणवत्ता के अनुरूप भी हों।
यदि वॉकिंग स्टिक यानी सहारा देने वाली छड़ी की बात करें, तो BIS ने इसके लिए IS 5145:2026 और IS 18558 (Part 4):2025 जैसे दो प्रमुख मानक तय किए हैं। IS 5145:2026 के तहत लकड़ी, बांस, एल्युमिनियम, प्लास्टिक और रबर से बनी छड़ियों की लंबाई, वजन, पकड़, मजबूती और टिकाऊपन से जुड़े विस्तृत दिशा-निर्देश निर्धारित किए गए हैं। इसका उद्देश्य उपयोगकर्ता को बेहतर संतुलन और सुरक्षा प्रदान करना है ताकि गिरने जैसी दुर्घटनाओं की संभावना कम हो सके।
वहीं IS 18558 (Part 4):2025 विशेष रूप से तीन या अधिक पैरों वाली वॉकिंग स्टिक्स के लिए तैयार किया गया है। यह उन वरिष्ठ नागरिकों और गंभीर रूप से दिव्यांग व्यक्तियों के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है जिन्हें अतिरिक्त स्थिरता की आवश्यकता होती है। इसमें हैंडल डिजाइन, रबर टिप की गुणवत्ता और प्रदर्शन परीक्षण जैसे पहलुओं को सख्ती से शामिल किया गया है।
इसी प्रकार एल्बो क्रच यानी कोहनी वाली बैसाखियों के लिए IS 18558 (Part 1):2025 मानक जारी किया गया है, जो ISO 11334-1 के अनुरूप है। इसमें ऊंचाई समायोजन, हैंडग्रिप की गुणवत्ता और शरीर पर दबाव कम करने जैसी बातों पर विशेष ध्यान दिया गया है, ताकि लंबे समय तक उपयोग करने पर भी उपयोगकर्ता को असुविधा न हो।
सुलभता के व्यापक दृष्टिकोण को ध्यान में रखते हुए BIS ने दृष्टिबाधित व्यक्तियों के लिए भी कई महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। IS 19189:2025 मानक टैक्टाइल गाइड मैप के डिजाइन और उपयोग से संबंधित है। यह रेलवे स्टेशन, एयरपोर्ट, पार्क और सरकारी भवनों जैसे सार्वजनिक स्थलों पर दृष्टिबाधित लोगों को स्वतंत्र रूप से मार्ग खोजने में मदद करेगा। इसमें उभरे हुए संकेतों और स्पर्श आधारित टेक्सचर को स्पष्ट और उपयोगी बनाने के निर्देश दिए गए हैं।
इसी क्रम में IS 19190:2025 ब्रेल साइनेज के लिए दिशा-निर्देश प्रदान करता है। इसमें ब्रेल अक्षरों के आकार, दूरी, सामग्री और उनके स्थान निर्धारण के स्पष्ट मानक तय किए गए हैं। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि दृष्टिबाधित व्यक्ति बिना किसी सहायता के सार्वजनिक और व्यावसायिक स्थानों पर आवश्यक जानकारी आसानी से प्राप्त कर सकें।
व्हीलचेयर उपयोगकर्ताओं और गतिशीलता सहायता की आवश्यकता वाले लोगों के लिए IS 19631:2026 मानक को बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। यह पोर्टेबल व्हीलचेयर रैंप के डिजाइन और निर्माण से जुड़ा स्वदेशी मानक है। इसमें रैंप की ढलान, पकड़, भार क्षमता और पोर्टेबिलिटी जैसे पहलुओं को स्पष्ट रूप से परिभाषित किया गया है। यह केवल दिव्यांगजनों के लिए ही नहीं, बल्कि बुजुर्गों, छोटे बच्चों, स्ट्रोलर और ट्रॉली उपयोगकर्ताओं के लिए भी उपयोगी साबित होगा।
इन सभी मानकों को तैयार करने में बहु-हितधारक दृष्टिकोण अपनाया गया है। BIS की तकनीकी समितियों में उद्योग, शिक्षाविद, सरकारी संस्थान और सामाजिक संगठनों के विशेषज्ञ शामिल रहे। भगवान महावीर विकलांग सहायता समिति जैसे संगठनों की भागीदारी ने इस प्रक्रिया को और अधिक व्यावहारिक और जमीनी बनाया।
यह पहल सुगम्य भारत अभियान को भी नई मजबूती प्रदान करेगी। पिछले कुछ वर्षों में रेलवे स्टेशनों, सरकारी कार्यालयों और शैक्षणिक संस्थानों में सुलभता बढ़ाने की दिशा में कई प्रयास किए गए हैं, लेकिन अब नए मानकों के लागू होने से गुणवत्ता और सुरक्षा का स्तर और अधिक मजबूत होगा।
आर्थिक दृष्टि से भी यह पहल काफी महत्वपूर्ण मानी जा रही है। सहायक उपकरणों का वैश्विक बाजार तेजी से बढ़ रहा है और भारत के लिए इसमें अपार संभावनाएं मौजूद हैं। यदि भारतीय निर्माता इन मानकों का पालन करते हैं, तो “मेक इन इंडिया” और “आत्मनिर्भर भारत” जैसी योजनाओं को नई गति मिलेगी। इससे उच्च गुणवत्ता वाले उत्पादों का निर्माण बढ़ेगा और निर्यात के नए अवसर भी पैदा होंगे।
हालांकि इन मानकों के प्रभावी क्रियान्वयन में कुछ चुनौतियां भी सामने आ सकती हैं। छोटे और मध्यम उद्योगों में जागरूकता की कमी, मानकों के अनुपालन की लागत और तकनीकी जानकारी का अभाव बड़ी बाधाएं बन सकते हैं। इसके लिए सरकार को प्रशिक्षण, वित्तीय सहायता और तकनीकी मार्गदर्शन उपलब्ध कराना होगा।
उपभोक्ताओं के स्तर पर भी जागरूकता बढ़ाना आवश्यक होगा। जब लोग प्रमाणित और गुणवत्ता युक्त उपकरणों की मांग करेंगे, तभी बाजार स्वतः ही मानकों के अनुरूप ढलेगा। इसमें मीडिया, सामाजिक संगठनों और जन-जागरूकता अभियानों की महत्वपूर्ण भूमिका रहेगी।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देखें तो यह पहल भारत को एक जिम्मेदार और समावेशी राष्ट्र के रूप में स्थापित करती है। ISO मानकों के अनुरूप तैयार किए गए ये दिशा-निर्देश भारतीय उत्पादों को वैश्विक प्रतिस्पर्धा के योग्य बनाएंगे और निर्यात क्षमता को भी बढ़ाएंगे।
कुल मिलाकर 1 मई 2026 से लागू हुए BIS के नए गुणवत्ता मानक केवल तकनीकी नियम नहीं हैं, बल्कि यह सामाजिक न्याय, समान अवसर और मानव गरिमा की दिशा में एक बड़ा कदम हैं। यदि इनका प्रभावी क्रियान्वयन सुनिश्चित किया गया, तो यह लाखों दिव्यांगजनों और वरिष्ठ नागरिकों के जीवन को अधिक सुरक्षित, सम्मानजनक और आत्मनिर्भर बना सकता है।
✍️एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी
गोंदिया, महाराष्ट्र

सम्पूर्ण समाधान दिवस में उमड़ी भीड़, डीएम-एसपी ने त्वरित निस्तारण का दिया भरोसा


दिव्यांग पेंशन प्रकरण पर डीएम सख्त, अधिकारियों को दिए स्पष्ट निर्देश

बलिया(राष्ट्र क़ी परम्परा )

तहसील सिकंदरपुर में शनिवार को आयोजित सम्पूर्ण समाधान दिवस में दूर-दराज से आए फरियादियों की भारी भीड़ उमड़ पड़ी। जिलाधिकारी मंगला प्रसाद सिंह और पुलिस अधीक्षक ओमवीर सिंह ने स्वयं मौजूद रहकर लोगों की समस्याएं गंभीरता से सुनीं और संबंधित अधिकारियों को त्वरित एवं गुणवत्तापूर्ण निस्तारण के निर्देश दिए।समाधान दिवस के दौरान विभिन्न विभागों से जुड़ी कुल 193 शिकायतें प्राप्त हुईं, जिनमें से 10 मामलों का मौके पर ही निस्तारण कर दिया गया। शेष प्रकरणों को संबंधित विभागों को सौंपते हुए समयबद्ध कार्रवाई सुनिश्चित करने के निर्देश दिए गए। सबसे अधिक शिकायतें भूमि कब्जा, वरासत और अन्य राजस्व विवादों से संबंधित रहीं। इस पर जिलाधिकारी ने राजस्व एवं पुलिस विभाग की संयुक्त टीम बनाकर मौके पर जाकर जांच करने और जल्द समाधान करने के निर्देश दिए। कार्यक्रम के दौरान आरजू खातून नामक शिकायतकर्ता ने दिव्यांग पेंशन न मिलने की समस्या उठाई। उन्होंने बताया कि ऑनलाइन आवेदन के बावजूद उन्हें अब तक पेंशन का लाभ नहीं मिल सका है। इस पर जिलाधिकारी ने कड़ा रुख अपनाते हुए जिला दिव्यांगजन अधिकारी को तत्काल जांच कर समस्या का शीघ्र समाधान सुनिश्चित करने के निर्देश दिए। उन्होंने स्पष्ट कहा कि पात्र लाभार्थियों को योजनाओं का लाभ न मिलना गंभीर लापरवाही है, जिसे किसी भी स्थिति में बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।पुलिस अधीक्षक ओमवीर सिंह ने भी पुलिस विभाग से संबंधित शिकायतों को प्राथमिकता के आधार पर निस्तारित करने के निर्देश दिए। उन्होंने कहा कि कानून-व्यवस्था से जुड़े मामलों में देरी स्वीकार्य नहीं है और पीड़ितों को समय पर न्याय मिलना चाहिए।इस दौरान उपजिलाधिकारी सिकंदरपुर, जिला विकास अधिकारी आनंद प्रकाश, मुख्य चिकित्सा अधिकारी समेत विभिन्न विभागों के जिला स्तरीय अधिकारी मौजूद रहे। अधिकारियों की मौजूदगी में कुछ मामलों का मौके पर निस्तारण होने से फरियादियों को राहत मिली, जबकि बाकी मामलों में जल्द कार्रवाई का भरोसा दिया गया।
समाधान दिवस में उमड़ी भीड़ यह दर्शाती है कि आमजन अपनी समस्याओं के समाधान के लिए इस मंच को महत्वपूर्ण मान रहे हैं। प्रशासन ने भी लोगों को आश्वस्त किया कि उनकी शिकायतों का प्राथमिकता के आधार पर समाधान किया जाएगा।

मानेसर सड़क हादसे में दो मजदूरों की मौत, शव पहुंचते ही गांव में मचा कोहरा


बलिया( राष्ट्र की परम्परा )

मनियर थाना क्षेत्र के जिगनी गांव में शनिवार सुबह उस समय शोक की लहर दौड़ गई, जब हरियाणा के मानेसर से दो मजदूरों के शव गांव पहुंचे। जैसे ही एंबुलेंस गांव में दाखिल हुई, पूरे माहौल में मातम पसर गया। परिजन दहाड़े मारकर रोने लगे और ग्रामीणों की आंखें भी नम हो गईं।जानकारी के अनुसार, जिगनी निवासी राजा राम प्रसाद और सुनील कुमार गोंड हरियाणा के गुरुग्राम स्थित मानेसर इलाके में मजदूरी करते थे। शुक्रवार तड़के करीब 2 बजे एएमटी फ्लाईओवर के पास सड़क दुर्घटना में दोनों की दर्दनाक मौत हो गई। बताया जाता है कि किसी अज्ञात वाहन की टक्कर से यह हादसा हुआ। घटना के बाद स्थानीय पुलिस ने दोनों शवों को कब्जे में लेकर पोस्टमार्टम कराया और शुक्रवार देर शाम परिजनों को सौंप दिया। शनिवार सुबह जब परिजन शव लेकर गांव पहुंचे तो सैकड़ों नहीं, बल्कि हजारों की संख्या में ग्रामीण जुट गए। हर ओर चीख-पुकार और सिसकियों की आवाज गूंज रही थी। मृतक राजा राम प्रसाद की पत्नी रानी देवी और सुनील कुमार गोंड की पत्नी प्रमिला देवी का रो-रोकर बुरा हाल है। परिवार के अन्य सदस्य भी गहरे सदमे में हैं। बच्चों और बुजुर्गों का भी दुख देखकर हर कोई भावुक हो उठा।ग्रामीणों का कहना है कि इस तरह की दर्दनाक घटना गांव में पहली बार हुई है, जिससे पूरा इलाका स्तब्ध है। मृतक दोनों ही परिवार के मुख्य कमाऊ सदस्य थे, जिनकी असमय मौत से परिजनों के सामने आर्थिक संकट भी खड़ा हो गया है। घटना की सूचना मिलने पर बांसडीह विधायक केतकी सिंह के प्रतिनिधि विश्राम सिंह मौके पर पहुंचे और शोक संतप्त परिवारों को ढांढस बंधाया। उन्होंने हर संभव सहायता का आश्वासन दिया। इस दौरान ग्राम प्रधान प्रतिनिधि कामाख्या सिंह, दीपु सिंह, राजू राजभर सहित कई गणमान्य लोग मौजूद रहे।
दोपहर बाद गमगीन माहौल में दोनों का अंतिम संस्कार किया गया। पूरे गांव में इस हृदयविदारक घटना के बाद सन्नाटा पसरा हुआ है।

बैग ठीक करने निकला बालक लापता परिजन बेहाल

पुलिस द्वारा हेल्पलाइन नंबरजारी

भागलपुर/देवरिया(राष्ट्र की परम्परा)
मईल थाना क्षेत्र के ग्राम जमुआं धरमेर से 10 वर्षीय बालक के लापता होने का मामला सामने आया है। जानकारी के अनुसार राजेश प्रसाद का पुत्र सुमित शुक्रवार की सुबह करीब 11 बजे घर से बैग की चेन बनवाने के लिए भागलपुर बाजार जाने की बात कहकर निकला था, लेकिन देर शाम तक वापस नहीं लौटा।
बालक के घर नहीं लौटने पर परिजनों की चिंता बढ़ गई। परिवार वालों ने पहले अपने स्तर पर आसपास के गांवों और संभावित स्थानों पर काफी खोजबीन की, लेकिन जब कोई सुराग नहीं मिला तो पुलिस को सूचना दी गई। सूचना मिलते ही पुलिस सक्रिय हो गई और आसपास के क्षेत्रों में तलाश अभियान शुरू कर दिया।
बालक के अचानक लापता होने से परिजनों का रो-रोकर बुरा हाल है। परिवार उसकी सकुशल वापसी की उम्मीद लगाए बैठा है।
पुलिस ने जारी किए संपर्क नंबर
पुलिस के अनुसार मामले को गंभीरता से लेते हुए संभावित स्थानों पर छानबीन की जा रही है और आसपास के लोगों से पूछताछ भी की जा रही है। आमजन से अपील की गई है कि यदि किसी को बालक के संबंध में कोई भी जानकारी मिले तो तत्काल पुलिस को सूचित करें।
इसके लिए चौकी इंचार्ज भागलपुर – 9140192120
थाना प्रभारी मईल – 9454403229
क्षेत्राधिकारी बरहज – 9454401410
पुलिस ने लोगों से सहयोग की अपील करते हुए कहा है कि किसी भी छोटी सूचना को नजरअंदाज न करें, जिससे बालक को जल्द से जल्द सकुशल बरामद किया जा सके।

देवरिया: भलुआ गांव में महीनों से टूटा बिजली का पोल बदला, अनिल यादव के हस्तक्षेप से मिली राहत

देवरिया (राष्ट्र की परम्परा)। देवरिया जिले के दक्षिणी वार्ड नंबर 51 अंतर्गत ग्राम सभा भलुआ में लंबे समय से टूटा पड़ा बिजली का पोल आखिरकार बदल दिया गया है। इस समस्या के समाधान में जिला पंचायत सदस्य प्रत्याशी अनिल यादव के हस्तक्षेप को अहम माना जा रहा है, जिसके बाद ग्रामीणों ने राहत की सांस ली है।

ग्रामीणों के अनुसार, यह बिजली का पोल कई दिनों से क्षतिग्रस्त था, जिससे न केवल बिजली आपूर्ति बाधित थी, बल्कि किसी बड़े हादसे का खतरा भी बना हुआ था। गांववासियों ने कई बार संबंधित अधिकारियों से शिकायत की, लेकिन कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई।

मामले में तब तेजी आई जब अनिल यादव जनसंपर्क के दौरान भलुआ गांव पहुंचे। उन्होंने मौके पर स्थिति का जायजा लिया और तुरंत बिजली विभाग के अधिकारियों से संपर्क कर समस्या की गंभीरता बताई। उनके प्रयासों से बिना देरी के नया बिजली का पोल लगवाया गया, जिससे गांव में बिजली व्यवस्था बहाल हो गई।

इस मौके पर अनिल यादव ने कहा,
“मेरा लक्ष्य राजनीति नहीं, बल्कि जनसेवा है। जब तक वार्ड के अंतिम व्यक्ति की समस्या का समाधान नहीं हो जाता, मेरा प्रयास जारी रहेगा।”

बिजली का पोल बदलने के बाद ग्रामीणों में खुशी का माहौल है। स्थानीय लोगों ने अनिल यादव के प्रयासों की सराहना करते हुए कहा कि जो काम महीनों से लंबित था, उसे उन्होंने कुछ ही समय में पूरा करवा दिया।

इस घटना के बाद क्षेत्र का सियासी माहौल भी प्रभावित होता नजर आ रहा है। ग्रामीणों ने अनिल यादव का फूल-मालाओं से स्वागत किया और आगामी चुनाव में समर्थन का भरोसा जताया।

बलिया: छात्राओं की शिकायत पर प्रधानाध्यापक निलंबित, जांच शुरू

सिकंदरपुर/बलिया (राष्ट्र की परम्परा)। बलिया जिले के सिकंदरपुर क्षेत्र में छात्राओं की शिकायत के बाद एक प्रधानाध्यापक को निलंबित कर दिया गया है। मामला नवानगर शिक्षा क्षेत्र के प्राथमिक विद्यालय सिवानकलां नंबर-3 का है, जहां तैनात प्रधानाध्यापक मु० फैजुल्लाह अंसारी पर गंभीर आरोप लगे हैं।

जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी मनीष कुमार सिंह ने खण्ड शिक्षा अधिकारी नवानगर की रिपोर्ट के आधार पर तत्काल कार्रवाई करते हुए आरोपी प्रधानाध्यापक को निलंबित कर दिया। जानकारी के अनुसार, छात्राओं द्वारा की गई शिकायत और दर्ज एफआईआर के बाद यह मामला सामने आया।

बताया जा रहा है कि 30 अप्रैल 2026 को सिकंदरपुर पुलिस ने आरोपी प्रधानाध्यापक को हिरासत में लिया था। इसके बाद संबंधित धाराओं में मुकदमा दर्ज कर उन्हें न्यायिक अभिरक्षा में जेल भेज दिया गया।

ये भी पढ़े – समाजवादी जिलाध्यक्ष सहित कई नेता हाउस गिरफ्तार, बरहज तहसील घेराव विफल

मामले की गंभीरता को देखते हुए शिक्षा विभाग ने त्वरित संज्ञान लेते हुए आरोपी के खिलाफ उत्तर प्रदेश सरकारी सेवक (अनुशासन एवं अपील) नियमावली-1999 के तहत विभागीय कार्यवाही शुरू कर दी है। साथ ही निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करने के लिए खण्ड शिक्षा अधिकारी रसड़ा को जांच अधिकारी नियुक्त किया गया है।

विभागीय सूत्रों के मुताबिक, जल्द ही आरोप पत्र जारी किया जाएगा और जांच रिपोर्ट के आधार पर आगे की कार्रवाई की जाएगी। इस घटना के बाद शिक्षा विभाग में हड़कंप मच गया है, जबकि अभिभावकों में भी भारी आक्रोश देखने को मिल रहा है।
प्रशासन ने भरोसा दिलाया है कि यदि आरोपी दोषी पाया जाता है, तो उसके खिलाफ सख्त से सख्त कार्रवाई की जाएगी।

जिला विद्यालय निरीक्षक डॉ. अमरकान्त सिंह का निधन शिक्षा विभाग में शोक की लहर

गोरखपुर(राष्ट्र की परम्परा)
जिला विद्यालय निरीक्षक डॉ. अमरकान्त सिंह का शनिवार को लखनऊ में उपचार के दौरान आकस्मिक निधन हो गया। उनके निधन की सूचना दूरभाष के माध्यम से प्राप्त होते ही पूरे शिक्षा विभाग में शोक की लहर दौड़ गई।
बताया गया कि डॉ. अमरकान्त सिंह का शनिवार 02 मई 2026 को अपरान्ह लगभग 12 बजे लखनऊ में इलाज के दौरान निधन हो गया। उनके आकस्मिक निधन से शिक्षा विभाग के अधिकारी, कर्मचारी, शिक्षक एवं शिक्षणेत्तर कर्मचारियों में गहरा दुख व्याप्त है।
इस दुखद सूचना के बाद कार्यालय जिला विद्यालय निरीक्षक, गोरखपुर परिसर में शोक सभा का आयोजन किया गया। शोक सभा में उपस्थित अधिकारियों एवं कर्मचारियों ने दिवंगत आत्मा की शांति के लिए दो मिनट का मौन रखकर श्रद्धांजलि अर्पित की।
इस दौरान ईश्वर से प्रार्थना की गई कि वह दिवंगत के परिजनों को इस अपार दुःख को सहन करने की शक्ति प्रदान करें। प्रभारी जिला विद्यालय निरीक्षक ने बताया कि डॉ. अमरकान्त सिंह के निधन से शिक्षा विभाग को अपूरणीय क्षति हुई है।

कटान मुद्दे पर विधायक जियाउद्दीन रिज़वी का सरकार पर आरोप, 15 मई को तहसील घेराव की चेतावनी

सिकंदरपुर/बलिया (राष्ट्र की परम्परा)। बलिया जिले के सिकंदरपुर विधानसभा क्षेत्र में घाघरा नदी के कटान को लेकर राजनीति तेज हो गई है। क्षेत्रीय विधायक मो. जियाउद्दीन रिज़वी ने राज्य सरकार पर गंभीर आरोप लगाते हुए चेतावनी दी है कि यदि जल्द कार्रवाई नहीं हुई तो 15 मई को तहसील का घेराव किया जाएगा।

शनिवार को जारी प्रेस विज्ञप्ति में विधायक रिज़वी ने कहा कि वर्तमान सरकार विकास कार्यों में भेदभाव कर रही है और सिकंदरपुर क्षेत्र को जानबूझकर नजरअंदाज किया जा रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि जिले में कटान रोकने के लिए कई परियोजनाएं स्वीकृत हुई हैं, लेकिन सबसे अधिक प्रभावित इलाकों को इसमें शामिल नहीं किया गया।

रिज़वी के अनुसार, सिसोटार, गोसाईपुर, जिंदापुर, खरीद, पुरुषोत्तम पट्टी, निपनिया, सोनुपार और बहदुरा जैसे गांव पिछले कई वर्षों से घाघरा नदी के कटान की गंभीर समस्या से जूझ रहे हैं। इस कारण हजारों एकड़ उपजाऊ जमीन नदी में समाहित हो चुकी है, जिससे किसानों की आर्थिक स्थिति बेहद खराब हो गई है।

उन्होंने बताया कि इस मुद्दे को लेकर वे कई बार विधानसभा में आवाज उठा चुके हैं और प्रमुख सचिव व सिंचाई मंत्री से मुलाकात कर प्रस्ताव भी सौंप चुके हैं। इसके अलावा मुख्यमंत्री को भी कई बार पत्र लिखकर समस्या से अवगत कराया गया, लेकिन अब तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया।
विधायक ने सरकार पर संवेदनहीनता का आरोप लगाते हुए कहा कि सरकार केवल बड़े उद्योगपतियों के हित में काम कर रही है, जबकि किसानों और गरीबों की समस्याओं की अनदेखी की जा रही है।

उन्होंने चेतावनी दी कि यदि जल्द ही कटान रोकने के लिए प्रभावी परियोजना स्वीकृत नहीं की गई, तो 15 मई को कटान पीड़ितों और कार्यकर्ताओं के साथ सिकंदरपुर तहसील का घेराव किया जाएगा। इस दौरान किसी भी स्थिति की जिम्मेदारी शासन-प्रशासन की होगी।

उबलती धरती डगमगाती थाली संकट में किसान

हीटवेव की मार से हरियाणा–पंजाब की खेती और किसानों की आय दोनों संकट में

डॉ. सत्यवान सौरभ

जलवायु परिवर्तन के इस निर्णायक दौर में चरम गर्मी अब केवल एक मौसमी विचलन नहीं रह गई है; यह एक गहरे संरचनात्मक संकट के रूप में उभर रही है, जो वैश्विक खाद्य प्रणालियों की बुनियाद को हिला रही है। बढ़ते तापमान और तीव्र होती हीटवेव्स ने कृषि, पशुपालन, मत्स्य पालन और खाद्य आपूर्ति शृंखलाओं को एक ऐसे दबाव में ला खड़ा किया है, जहां हर कड़ी कमजोर पड़ती दिख रही है। वैज्ञानिक और नीति-निर्माता अब इसे एक “रिस्क मल्टीप्लायर” के रूप में पहचान रहे हैं—ऐसा कारक जो न केवल स्वयं नुकसान पहुंचाता है, बल्कि अन्य जोखिमों को भी कई गुना बढ़ा देता है। यदि अब निर्णायक कदम नहीं उठाए गए, तो चरम गर्मी आने वाले दशकों में वैश्विक खाद्य सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा व्यवस्थित खतरा बन जाएगी।
चरम तापमान का सबसे प्रत्यक्ष और स्पष्ट प्रभाव फसलों पर पड़ता है। यह स्थापित तथ्य है कि 30 डिग्री सेल्सियस से ऊपर का तापमान गेहूं, चावल और मक्का जैसी प्रमुख फसलों के लिए प्रतिकूल होता है। अधिक तापमान पौधों की प्रकाश संश्लेषण प्रक्रिया को बाधित करता है, परागण को प्रभावित करता है और दानों के विकास को अधूरा छोड़ देता है। परिणामस्वरूप उत्पादन में गिरावट आती है, जो कई मामलों में 10 से 50 प्रतिशत तक पहुंच सकती है। यह केवल मात्रा की समस्या नहीं है—गर्मी के कारण अनाज का पोषण स्तर भी घटता है, जिससे खाद्य गुणवत्ता प्रभावित होती है। इस प्रकार, यह संकट उत्पादन और पोषण दोनों को एक साथ चोट पहुंचाता है।
पशुपालन क्षेत्र भी इस तापीय दबाव से अछूता नहीं है। उच्च तापमान के कारण पशुओं में हीट स्ट्रेस बढ़ता है, जिससे उनकी उत्पादकता पर सीधा असर पड़ता है। डेयरी पशुओं में दूध उत्पादन में कमी, मुर्गियों में अंडा उत्पादन का घट जाना और सूअरों में वृद्धि दर का धीमा होना इसके प्रमुख उदाहरण हैं। चरम परिस्थितियों में पशुओं की मृत्यु तक हो सकती है, जिससे किसानों की आय पर गंभीर चोट पड़ती है। मत्स्य पालन में स्थिति और भी जटिल हो जाती है—समुद्री तापीय लहरों के कारण जल में घुलित ऑक्सीजन की मात्रा घटती है, जिससे मछलियां तनावग्रस्त हो जाती हैं और उनका जीवित रहना कठिन हो जाता है। इस तरह, अत्यधिक गर्मी खाद्य उत्पादन के सभी प्रमुख स्रोतों को एक साथ प्रभावित कर रही है।
लेकिन असली चुनौती तब सामने आती है जब ये प्रभाव एक-दूसरे को बढ़ाने लगते हैं। चरम गर्मी सूखे को जन्म देती है, जिससे जल संसाधनों पर अभूतपूर्व दबाव पड़ता है। सिंचाई के लिए पानी की कमी फसलों की उत्पादकता को और घटा देती है, जबकि पशुओं और मनुष्यों के लिए जल संकट गंभीर रूप ले लेता है। इसके अलावा, उच्च तापमान कीटों और रोगों के प्रसार के लिए अनुकूल परिस्थितियां पैदा करता है। टिड्डी दल जैसी घटनाएं अधिक बार और अधिक तीव्रता से देखने को मिल रही हैं, जो कुछ ही दिनों में विशाल फसल क्षेत्र को नष्ट कर सकती हैं। इस प्रकार, तापमान वृद्धि केवल एक अलग-थलग समस्या नहीं, बल्कि एक ऐसे चक्र का हिस्सा है जो लगातार खुद को मजबूत करता जाता है।
वन क्षेत्रों में भी इसका गहरा प्रभाव दिखाई देता है। बढ़ती गर्मी और सूखे के कारण जंगलों में आग लगने की घटनाएं बढ़ रही हैं, जिससे जैव विविधता को नुकसान पहुंचता है और कार्बन चक्र बाधित होता है। यह एक खतरनाक दुष्चक्र को जन्म देता है—जंगलों की आग से कार्बन उत्सर्जन बढ़ता है, जो आगे तापमान वृद्धि को और तेज करता है, और यह वृद्धि फिर नई आग की घटनाओं को जन्म देती है। इस चक्र का प्रभाव अंततः कृषि और खाद्य प्रणालियों पर ही पड़ता है।
चरम गर्मी का एक महत्वपूर्ण लेकिन अक्सर अनदेखा पहलू श्रम उत्पादकता पर इसका प्रभाव है। कृषि क्षेत्र में काम करने वाले श्रमिक, विशेषकर विकासशील देशों में, अत्यधिक तापमान के कारण काम करने में असमर्थ हो जाते हैं। जब “गीला बल्ब तापमान” एक निश्चित सीमा से ऊपर पहुंच जाता है, तो मानव शरीर के लिए लंबे समय तक काम करना जानलेवा हो सकता है। यह स्थिति एक प्रकार का “हीट-इकोनॉमी ट्रैप” पैदा करती है, जहां गर्मी सीधे श्रम, उत्पादन और आय—तीनों को सीमित कर देती है। अनुमान है कि दक्षिण एशिया जैसे क्षेत्रों में साल के सैकड़ों दिन ऐसे हो सकते हैं, जब श्रमिकों के लिए काम करना संभव नहीं रहेगा। इसका सीधा असर किसानों और मजदूरों की आय पर पड़ता है, जिससे आर्थिक असुरक्षा बढ़ती है।
इन सभी प्रभावों का सम्मिलित परिणाम एक “कैस्केडिंग फेल्योर” के रूप में सामने आता है। जब फसलें असफल होती हैं, पशुधन प्रभावित होता है और श्रमिक काम नहीं कर पाते, तो खाद्य आपूर्ति शृंखला टूटने लगती है। इसका सीधा असर बाजार पर पड़ता है—खाद्य कीमतें बढ़ती हैं, जिससे गरीब और कमजोर वर्गों के लिए भोजन तक पहुंच और कठिन हो जाती है। यह स्थिति कुपोषण, गरीबी और सामाजिक अस्थिरता को जन्म देती है। कई क्षेत्रों में यह प्रवासन को भी बढ़ावा देती है, जहां लोग जीविका की तलाश में अपने घर छोड़ने को मजबूर हो जाते हैं। इस प्रकार, चरम गर्मी एक पर्यावरणीय समस्या से कहीं अधिक—एक व्यापक सामाजिक-आर्थिक संकट बन जाती है।
भारत जैसे कृषि प्रधान देश के लिए यह चुनौती और भी गंभीर है। हरियाणा, पंजाब और उत्तर भारत के अन्य हिस्सों में हाल के वर्षों में हीटवेव्स के कारण गेहूं और चावल की पैदावार पर प्रतिकूल प्रभाव स्पष्ट रूप से देखा गया है। विशेष रूप से देर से बोई गई फसलों पर इसका असर अधिक पड़ता है, जिससे उत्पादन में 10 से 15 प्रतिशत तक की गिरावट दर्ज की गई है। भारत की हरित क्रांति का केंद्र रहे ये क्षेत्र अब जलवायु अस्थिरता के सबसे बड़े प्रयोगशाला बनते जा रहे हैं। इसके साथ ही, भूजल का अत्यधिक दोहन और बढ़ती गर्मी मिलकर जल संकट को और गहरा कर रहे हैं, जो कृषि की स्थिरता के लिए गंभीर खतरा है।
इस संकट का प्रभाव समान रूप से वितरित नहीं है। छोटे और सीमांत किसान, महिलाएं और युवा सबसे अधिक प्रभावित होते हैं। उनके पास सीमित संसाधन, कम तकनीकी जानकारी और जोखिम उठाने की कम क्षमता होती है। परिणामस्वरूप, वे जलवायु परिवर्तन के इस बढ़ते दबाव के सामने अधिक असुरक्षित हो जाते हैं। इस प्रकार, अत्यधिक गर्मी केवल पर्यावरणीय चुनौती नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक असमानताओं को भी गहरा करने वाला कारक बन रही है।
ऐसे में समाधान की दिशा में ठोस और बहुआयामी रणनीतियों की आवश्यकता है। सबसे पहले, अनुकूलन (adaptation) पर ध्यान देना होगा। जलवायु-स्मार्ट कृषि पद्धतियां—जैसे गर्मी-सहनशील बीजों का उपयोग, फसल विविधीकरण, ड्रिप और स्प्रिंकलर सिंचाई, तथा छायादार खेती—इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। इसके अलावा, मौसम पूर्वानुमान और प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियों को मजबूत करना आवश्यक है, ताकि किसान समय रहते अपने निर्णय बदल सकें और नुकसान को कम कर सकें।
पशुपालन के क्षेत्र में भी सुधार की आवश्यकता है। बेहतर वेंटिलेशन वाले शेड, पर्याप्त जल उपलब्धता और चयनात्मक प्रजनन जैसी तकनीकों के माध्यम से पशुओं को गर्मी के प्रभाव से बचाया जा सकता है। साथ ही, बीमा योजनाओं और वित्तीय सहायता के जरिए किसानों को आर्थिक सुरक्षा प्रदान करना भी आवश्यक है, ताकि वे जलवायु जोखिमों का सामना कर सकें।
नीतिगत स्तर पर, सरकारों को एक समग्र और दीर्घकालिक दृष्टिकोण अपनाना होगा। जल संरक्षण, जैव विविधता संरक्षण और सतत कृषि पद्धतियों को बढ़ावा देना प्राथमिकता होनी चाहिए। भारत में राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन और अन्य कृषि योजनाओं को जलवायु परिवर्तन के अनुरूप पुनर्गठित करने की आवश्यकता है। साथ ही, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सहयोग बढ़ाना और ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को कम करना अनिवार्य है, क्योंकि दीर्घकालिक समाधान केवल शमन (mitigation) के माध्यम से ही संभव है।
अंततः, यह समझना आवश्यक है कि चरम गर्मी का यह संकट एक चेतावनी है—एक ऐसा संकेत जो हमें बताता है कि हमारी विकास प्रणाली प्रकृति की सीमाओं से टकरा रही है। खाद्य प्रणालियों को सुरक्षित रखने के लिए हमें केवल तकनीकी और नीतिगत बदलाव ही नहीं, बल्कि अपने दृष्टिकोण में भी परिवर्तन लाना होगा। सततता, लचीलापन और समावेशिता को केंद्र में रखकर ही हम इस चुनौती का सामना कर सकते हैं।
वक्त साफ है—या तो हम अभी कार्रवाई करें, या भविष्य में खाद्य असुरक्षा की भारी कीमत चुकाएं।

डॉ. सत्यवान सौरभ

बन्द मुट्ठी सवा लाख की

✍️ डॉ. कर्नल आदिशंकर मिश्र‘आदित्य’

बन्द मुट्ठी सवा लाख की,
खुल गयी तो ख़ाक की,
कहावत कितनी प्रसिद्ध है,
अपने आप से यह सिद्ध है।

बन्द मुट्ठी में जो कुछ भी होता है,
इंसान तभी तक गुप्त रख पाता है,
जब तक वह मुट्ठी नहीं खोलता है,
खुलने से सत्य पता चल जाता है।

बंद मुट्ठी पारिवारिक,सामाजिक
एकता की भी द्योतक होती है,
जब तक हम एक जुट रहते हैं,
सारी बाधाएँ पार कर लेते हैं।

एकता जैसे ख़त्म हो जाती है,
विरोधी शक्ति प्रबल हो जाती है,
पारिवारिक रिश्ते भी टूट जाते हैं,
सामाजिक ताने बाने बिखर जाते हैं।

छोटी छोटी बातों को तूल न दें,
आपस का सौहार्द बनाये रखें,
घर, परिवार, समाज और देश,
के सामने निहित स्वार्थ गौड़ रखें।

आदित्य एकता में जो ताक़त है,
अलग अलग होने में नहीं होती है,
एकल परिवार स्वार्थ आधारित हैं,
संयुक्त परिवार में सबका हित है।

जनगणना प्रशिक्षण में बवाल, शिक्षकों ने किया सड़क जाम

बस्ती (राष्ट्र की परम्परा)। जिले के हर्रैया क्षेत्र में जनगणना प्रशिक्षण के दौरान बड़ा विवाद खड़ा हो गया। हर्रैया ब्लॉक के आरकेवीएस इंटर कॉलेज में आयोजित तीन दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम के बीच विद्यालय प्रबंधन पर शिक्षकों से अभद्रता करने का आरोप लगा, जिसके बाद माहौल तनावपूर्ण हो गया।

बताया जा रहा है कि प्रशिक्षण के लिए पहुंचे शिक्षकों को परिसर में प्रवेश को लेकर काफी देर तक रोका गया। कई शिक्षकों ने आरोप लगाया कि उनके साथ अपमानजनक व्यवहार किया गया और उन्हें परिसर से बाहर जाने के लिए कहा गया। इस दौरान शिक्षक धर्मेंद्र पाण्डेय सहित कई अन्य शिक्षकों ने खुलकर विरोध जताया।

आक्रोशित शिक्षकों ने स्कूल परिसर में ही नारेबाजी शुरू कर दी। “प्रबंधक मुर्दाबाद”, “मान्यता रद्द करो” और “बीएसए जिंदाबाद” जैसे नारों से पूरा परिसर गूंज उठा। मामला बढ़ने पर शिक्षकों ने हर्रैया-बभनान मार्ग पर उतरकर सड़क जाम कर दिया, जिससे यातायात बाधित हो गया और राहगीरों को परेशानी का सामना करना पड़ा।

शिक्षकों का कहना है कि जनगणना जैसे महत्वपूर्ण राष्ट्रीय कार्य के प्रशिक्षण में इस तरह की अव्यवस्था बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। उन्होंने आरोप लगाया कि प्रशिक्षण केंद्र के चयन में भी लापरवाही बरती गई, जहां मूलभूत व्यवस्थाएं तक ठीक नहीं हैं।

प्रदर्शन कर रहे शिक्षकों ने साफ कहा कि जब तक संबंधित प्रबंधक सार्वजनिक रूप से माफी नहीं मांगते और उनके खिलाफ प्राथमिकी दर्ज नहीं होती, तब तक प्रशिक्षण दोबारा शुरू नहीं किया जाएगा। साथ ही उन्होंने प्रशिक्षण केंद्र बदलने और दोषियों पर कड़ी कार्रवाई की मांग भी उठाई।
सूचना मिलते ही स्थानीय प्रशासन और शिक्षा विभाग के अधिकारी मौके पर पहुंचे और शिक्षकों को समझाने का प्रयास किया। काफी देर तक चले हंगामे के बाद भी शिक्षकों का गुस्सा शांत नहीं हुआ और वे अपनी मांगों पर अड़े रहे।

इस घटना ने जनगणना जैसे अहम कार्य में प्रशासनिक तैयारियों और प्रबंधन व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

महीनों से अंधेरे में डूबा था भलुआ गांव, अनिल के प्रयास ने लौटा दी उजाला

देवरिया(राष्ट्र की परम्परा) जिला पंचायत क्षेत्र देवरिया दक्षिणी (वार्ड नंबर 51) के अंतर्गत आने वाले ग्राम सभा भलुआ में पिछले कई दिनों से अंधेरे और संभावित खतरे का सबब बना टूटा हुआ बिजली का पोल आखिरकार बदल दिया गया है। जनसमस्याओं के प्रति संवेदनशीलता दिखाते हुए जिला पंचायत सदस्य प्रत्याशी अनिल यादव के त्वरित हस्तक्षेप से यह कार्य संपन्न हुआ, जिसके बाद ग्रामीणों ने राहत की सांस ली है।
​अधिकारियों की उदासीनता पर भारी पड़ा जन-प्रतिनिधि का प्रयास ​ग्रामीणों के अनुसार, बिजली का पोल लंबे समय से क्षतिग्रस्त था। गांव वालों ने इसकी शिकायत कई बार उच्चाधिकारियों से की, लेकिन शिकायतों को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया। विभागीय सुस्ती के कारण पूरे गांव में बिजली आपूर्ति बाधित थी और हादसे का डर बना रहता था।
​भ्रमण के दौरान त्वरित एक्शन
​मामले में मोड़ तब आया जब वार्ड संख्या 51 के प्रत्याशी अनिल यादव जनसंपर्क के दौरान भलुआ गांव पहुंचे। ग्रामीणों की समस्या सुनने और टूटे पोल की स्थिति खुद देखने के बाद उन्होंने बिना एक पल की देरी किए बिजली विभाग के उच्चाधिकारियों से संपर्क किया। उन्होंने न केवल समस्या की गंभीरता से अवगत कराया, बल्कि व्यक्तिगत स्तर पर प्रयास कर तत्काल नया पोल लगवाया।

वही अनिल यादव ने कहा
​”मेरा लक्ष्य राजनीति नहीं, बल्कि जनसेवा है। जब तक वार्ड के अंतिम व्यक्ति की समस्या का समाधान नहीं हो जाता, मेरा प्रयास जारी रहेगा।” — अनिल यादव

ग्रामीणों में उत्साह, चुनाव से पहले बढ़ी लोकप्रियता
​पोल लगने और गांव में बिजली सुचारू रूप से संचालित होने के बाद ग्रामीणों का उत्साह देखते ही बन रहा था। भलुआ के निवासियों ने अनिल यादव के इस ‘नेक कार्य’ की भूरी-भूरी प्रशंसा की। स्थानीय लोगों का कहना है कि जो काम महीनों से अधिकारियों के चक्कर काटने पर नहीं हुआ, उसे अनिल यादव ने कुछ ही घंटों में करवा कर यह साबित कर दिया कि वे जनता के सच्चे हमदर्द हैं।
​इस घटना के बाद वार्ड नंबर 51 का सियासी माहौल पूरी तरह अनिल यादव के पक्ष में नजर आ रहा है। ग्रामीणों ने फूल-मालाओं के साथ उनका स्वागत किया और आने वाले चुनाव के लिए भारी समर्थन का भरोसा दिलाते हुए उनका उत्साहवर्धन किया।