बाबा बालेश्वर नाथ मंदिर का प्रबंधन अब प्रशासन के हाथ, अदालत के फैसले से खत्म हुआ वर्षों पुराना विवाद

बलिया (राष्ट्र की परम्परा)। उत्तर प्रदेश के बलिया जिले में स्थित प्रसिद्ध बाबा बालेश्वर नाथ मंदिर के प्रबंधन को लेकर वर्षों से चला आ रहा विवाद अब अदालत के ऐतिहासिक फैसले के बाद समाप्त हो गया है। अपर जिला जज (प्रथम) बलिया की अदालत ने मंदिर का संपूर्ण प्रबंधन जिला प्रशासन को सौंपते हुए सिटी मजिस्ट्रेट, बलिया को मंदिर का रिसीवर नियुक्त किया है। इस निर्णय को मंदिर व्यवस्था में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है।
अदालत के आदेश के अनुसार अब मंदिर की दुकानों से मिलने वाला किराया, दानपात्र में आने वाली धनराशि और अन्य आय स्रोत प्रशासनिक निगरानी में रहेंगे। न्यायालय ने सिटी मजिस्ट्रेट को निर्देश दिया है कि तीन महीने के भीतर मंदिर की आय-व्यय का विस्तृत विवरण अदालत में प्रस्तुत किया जाए। इसके लिए चार्टर्ड अकाउंटेंट की सहायता लेने की भी अनुमति दी गई है, ताकि वित्तीय व्यवस्था पूरी तरह पारदर्शी रह सके।
मामला उस कथित कमेटी से जुड़ा था, जिसे मूल रूप से एक विद्यालय की समिति बताया गया और जिसने मंदिर प्रबंधन पर दावा किया था। मंदिर के सेवायतों और पुजारियों ने इस दावे का विरोध करते हुए लंबी कानूनी लड़ाई लड़ी। विवाद चिट फंड कार्यालय, आजमगढ़ से होते हुए कमिश्नरी और उच्च न्यायालय तक पहुंचा। हाईकोर्ट के निर्देश पर इसकी सुनवाई बलिया अदालत में हुई।
अदालत ने अपील संख्या 78/2016 “बाबा बालेश्वर नाथ मंदिर बनाम उदयभान श्रीवास्तव व अन्य” में 23 अप्रैल 2024 को पूर्व की कमेटी को निरस्त कर दिया। फैसले के बाद प्रशासनिक कार्रवाई भी तेज हो गई है। सिटी मजिस्ट्रेट ने वर्तमान प्रबंधकों को तत्काल उपस्थित होने का निर्देश दिया है।
प्रशासन ने मंदिर के दानपात्रों और महत्वपूर्ण कक्षों पर नियंत्रण स्थापित करने की प्रक्रिया भी शुरू कर दी है। सुरक्षा और पारदर्शिता को ध्यान में रखते हुए कई स्थानों पर ताले लगाए जा रहे हैं। विवाद से जुड़े विपक्षी पक्षों को अब मंदिर प्रबंधन से पूरी तरह अलग कर दिया गया है।
स्थानीय श्रद्धालुओं और नागरिकों में अदालत के फैसले को लेकर सकारात्मक प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है। लोगों का मानना है कि अब मंदिर की आय का उपयोग विकास कार्यों, श्रद्धालुओं की सुविधाओं और व्यवस्थाओं को बेहतर बनाने में किया जाएगा। यह फैसला धार्मिक संस्थानों के पारदर्शी संचालन की दिशा में एक महत्वपूर्ण उदाहरण माना जा रहा है।
