करवा चौथ : प्रेम, समर्पण और विश्वास का पावन पर्व
चाँदनी रात, सोलह श्रृंगार और चाँद के दीदार में झलकता दांपत्य प्रेम कविता : संजय एम. तराणेकर चाँदनी रात, सजी थाली, हाथों में मेहँदी, मुख पे लाली,सोलह श्रृंगार से सजती…
निष्पक्ष खबर, सशक्त विचार
चाँदनी रात, सोलह श्रृंगार और चाँद के दीदार में झलकता दांपत्य प्रेम कविता : संजय एम. तराणेकर चाँदनी रात, सजी थाली, हाथों में मेहँदी, मुख पे लाली,सोलह श्रृंगार से सजती…
कश्मीर, आतंकवाद और सियासत पर कवि संजय एम. तराणेकर की बेबाक अभिव्यक्ति कश्मीर में अमन की आस और आतंकवाद पर सवाल, सियासत के बीच जनता के दर्द को बयां करती…
इंदौर (राष्ट्र की परम्परा)। शरद पूर्णिमा की उजली रात, चाँदनी की शीतल आभा और राधा-कृष्ण की दिव्य रासलीला के आध्यात्मिक भावों को समेटे कवि, लेखक एवं समीक्षक संजय एम. तराणेकर…
नफरत की राजनीति पर तीखा प्रहार, लोकतंत्र बचाने का आह्वान सत्य, विवेक और मानवीय मूल्यों की रोशनी से ही मिटेगा नफरत का अंधकार ✍️ कविता तमस के अंधेरों में, जब…
रावण की व्यथा के बहाने आधुनिक समाज के दोहरे चरित्र पर तीखा प्रहार प्रस्तुतकर्ता: संजय एम. तराणेकर ✍️ विशेष कविताप्रभु श्रीराम! सुनो पुकार, क्यों सहूँ मैं अग्नि की मार?हर साल…
सत्ता की सियासत, बयानबाजी और लोकतंत्र के दोहरे मापदंड पर तीखा व्यंग्य किसने किसको क्या कहा, किसने किसको घेरा,बयानबाजी की आँधी में, ‘गुम’ हो गया है सवेरा।कभी राम के नाम…
मानवाधिकार, समानता और न्याय की अलख जगाने वाली शख्सियत को काव्यात्मक नमन जिसने अन्याय के आगे झुकना नहीं सीखा,जिसने अत्याचारों के आगे रुकना न सीखा।मानवता की पीड़ा को अपना दर्द…
नाना पाटेकर के अभिनय, संवेदनाओं और अद्भुत संवाद अदायगी को समर्पित भावपूर्ण कविताजिस आवाज़ में था सच का साहस,जिस आँखों में दर्द का एहसास,जिसके संवादों में जीवन बोलता था,हर किरदार…
हरमन, तुमने क्यों छोड़ी कमान,आज यह पूछ रहा है हिंदुस्तान।जीत की राहों की तुम सरताज,तुमसे रोशन हुआ देश का मान।तुमने ही सिखाया—हार नहीं होती,हाँ, जब हौसलों में आग जगी हो।राह…
रानी दुर्गावती के शौर्य, स्वाभिमान और मातृभूमि के लिए बलिदान को समर्पित वीर रस की कविता हाँ, वह चंदेलों की बेटी थी, गोंडों की बनी थी बहू,माटी की आन बचाने…
हरेक चेहरे पर मुस्कान सजाकर,दिल में वो दर्द छिपाकर बैठे हैं।दुनिया समझे सब कुछ अच्छा,हम खामोशी को अपना बैठे हैं।किससे कहें अपने मन की बातें,हमको कौन यहाँ सुनने वाला है।यहाँ…
जनता प्यासी, व्यवस्थाओं पर सवाल और पानी की एक-एक बूंद की कीमत पर सवाल उठाती कविता गरीब देश की ऊँची कुर्सी, अफसरशाही का अंदाज़,जनता प्यासी, सूखे हलक, मेज़ों पर पानी…
हाँ, कच्ची दीवारों पर जब, संजा मुस्कुराती थी,मिट्टी-गोबर-फूलों से बेटियाँ दुनिया सजाती थीं।नन्ही-सी उँगलियों में पूरा “गाँव” उतर आता था,हर दिन आकृति में मन का सपना मुस्काता था।सहेलियाँ गीत सुनातीं,…
था, रिश्तों में था प्यार।अब रिश्ते हैं फोन में, सूना है घर-द्वार॥थोड़ा था पर बाँटकर, खाते थे परिवार।अब थाली भरपूर है, फिर भी मन बीमार॥कच्चे घर में प्रेम था, पक्के…
जर्जर इमारतें गिरती रहीं, तंत्र सोता रहा,दीवारों की दरारें खूब चीखती रहीं,हमेशा शहर खामोश होता रहा।किसी छत ने पहले ही कहा था—“अब मुझमें दम नहीं है,”किसी खंभे ने भी काँपकर…