
लेखक: यतीन्द्र मिश्र
काशी केवल एक प्राचीन नगर नहीं, बल्कि भारत की उस जीवंत चेतना का नाम है, जहां परंपरा समय के साथ संवाद करती है, शास्त्र सवालों के सामने खुलते हैं और आस्था अपनी जड़ों को थामे भविष्य की ओर देखती है। गंगा के प्रवाह की तरह यहां संस्कृति भी निरंतर गतिमान है। इसी सांस्कृतिक वातावरण में सिगरा स्थित रुद्राक्ष कन्वेंशन सेंटर में आयोजित तीन दिवसीय संस्कृति संसद के दूसरे दिन सनातन परंपरा, भारतीय ज्ञान-विरासत, सामाजिक समरसता, राष्ट्रीय सुरक्षा और युवा नेतृत्व जैसे विषयों पर व्यापक विमर्श हुआ। दूसरी ओर जेन-जी कॉन्क्लेव ने नई पीढ़ी की सोच, उसके अधिकारों और राष्ट्र निर्माण में उसकी भागीदारी को केंद्र में रखा।
इन दोनों आयोजनों के बीच एक साझा सूत्र दिखाई दिया—भारत का भविष्य उसकी सांस्कृतिक स्मृति, विवेकपूर्ण संवाद और युवा पीढ़ी की सक्रिय भागीदारी से निर्मित होगा।
सनातन संस्कृति की अविरल धारा और युवा पीढ़ी की जिम्मेदारी
संस्कृति संसद के दूसरे दिन के अंतिम सत्र में महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने भारतीय संस्कृति को अविरल नदी की धारा के समान बताते हुए कहा कि सनातन धर्म जोड़ने का कार्य करता है, तोड़ने का नहीं। उन्होंने काशी और महाराष्ट्र के ऐतिहासिक संबंधों का उल्लेख करते हुए छत्रपति शिवाजी महाराज के राज्याभिषेक में काशी के विद्वान पंडित गागाभट्ट की भूमिका को स्मरण किया। उनके अनुसार, महाराष्ट्र संतों की भूमि है और काशी ज्ञान तथा अध्यात्म की।
शिंदे ने युवाओं को सनातन संस्कृति का रक्षक और वाहक बताते हुए उनसे राष्ट्र के विकास में योगदान देने का आह्वान किया। श्रीकाशी विद्वत् परिषद् ने उन्हें ‘धर्म ध्वजा धारक’ सम्मान प्रदान किया। दक्षिण भारत के संतों ने उन्हें सेंगोल भी भेंट किया। यह प्रसंग भारतीय सांस्कृतिक परंपराओं और विभिन्न क्षेत्रों के बीच ऐतिहासिक संबंधों को रेखांकित करता है।
युवा शक्ति सत्र में भाजपा के राष्ट्रीय महामंत्री सुनील बंसल ने कहा कि युवाओं की सोच और दिशा ही देश का भविष्य तय करती है। उन्होंने बदलते पारिवारिक परिवेश में संस्कारों की भूमिका पर जोर देते हुए युवाओं को भारतीय संस्कृति से जोड़ने की आवश्यकता बताई। काशी हिंदू विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. अजीत कुमार चतुर्वेदी ने संगीत, कला और साहित्य के माध्यम से युवाओं तक भारतीय ज्ञान परंपरा पहुंचाने तथा उनसे सार्थक संवाद बढ़ाने की बात कही।
इन विचारों में एक महत्वपूर्ण संकेत निहित है। नई पीढ़ी को केवल परंपराओं का उत्तराधिकारी मान लेना पर्याप्त नहीं; उसे परंपराओं के अर्थ समझने, प्रश्न पूछने और अपने समय की चुनौतियों के बीच उनका विवेकपूर्ण मूल्यांकन करने का अवसर भी मिलना चाहिए।
इतिहास, विरासत और सामाजिक समरसता का विमर्श
संस्कृति संसद के विभिन्न सत्रों में वक्ताओं ने भारतीय इतिहास, धार्मिक विरासत और राष्ट्रीय पहचान पर अपने विचार रखे। विश्व हिंदू परिषद के अंतरराष्ट्रीय उपाध्यक्ष चंपत राय ने इतिहास में हिंदू समाज के संघर्षों का उल्लेख किया, जबकि संगठन के अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष आलोक कुमार ने भारत की सांस्कृतिक एकता को नदियों, तीर्थस्थलों, धार्मिक परंपराओं और साझा विरासत से जोड़कर देखा।
सामाजिक समरसता के संदर्भ में संतों की भूमिका भी चर्चा के केंद्र में रही। आलोक कुमार ने चेन्नई की एक अनुसूचित जाति बस्ती का उदाहरण देते हुए बताया कि संतों के लोगों के घरों में जाने और उनके यहां भोजन स्वीकार करने से सामाजिक दूरी कम करने का संदेश मिला। यह प्रसंग याद दिलाता है कि संस्कृति की वास्तविक शक्ति केवल उसके गौरवशाली अतीत में नहीं, बल्कि वर्तमान समाज में समानता, सम्मान और आत्मीयता स्थापित करने की क्षमता में भी निहित है।
सुरक्षित राष्ट्र विषयक सत्र में गोवा के संत पद्मश्री सद्गुरु ब्रह्मेशानंदाचार्य स्वामीजी महाराज ने ऋषियों, संतों, गुरुओं और माता-पिता जैसी संस्थाओं की मजबूती को राष्ट्र की सुरक्षा से जोड़ा। उन्होंने ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की भावना पर जोर दिया। वहीं, विभिन्न वक्ताओं ने राष्ट्रीय एकता, सीमाओं की सुरक्षा और सांस्कृतिक पहचान के संरक्षण पर अपने विचार रखे।
कुछ वक्ताओं के संबोधनों में राजनीतिक आलोचना और धार्मिक-सामाजिक चिंताएं भी प्रमुख रहीं। ऐसे विमर्शों के बीच यह आवश्यक है कि राष्ट्रीय एकता की बात संवैधानिक मूल्यों, पारस्परिक सम्मान और समाज के सभी वर्गों के प्रति न्याय की भावना के साथ आगे बढ़े। सांस्कृतिक चेतना तभी व्यापक सामाजिक शक्ति बन सकती है, जब वह संवाद और समरसता के लिए भी स्थान बनाए।
ज्ञान परंपरा का संरक्षण और शास्त्रार्थ की आवश्यकता
संस्कृति संसद के इतिहास तथा भारतीय ज्ञान परंपरा से जुड़े सत्रों में प्राचीन ग्रंथों, पांडुलिपियों और हस्तलेखों के संरक्षण की आवश्यकता पर विशेष बल दिया गया। स्वामी जीतेंद्रानंद सरस्वती ने विदेशों में मौजूद भारतीय पांडुलिपियों को वापस लाने और प्राचीन ज्ञान-संपदा के संरक्षण की जरूरत बताई। श्रीकाशी विद्वत् परिषद् के महामंत्री प्रो. रामनारायण द्विवेदी ने भारतीय संस्कृति और ज्ञान परंपरा के संरक्षण को महत्वपूर्ण बताया।
प्रो. रविंद्र कुमार पाठक ने किसी विषय को बिना समझे स्वीकार करने के बजाय उसके मूल आधार और तर्क को जानने की आवश्यकता पर जोर दिया। काशी सुमेरुपीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी नरेंद्रानंद जी महाराज ने मूल ग्रंथों के अध्ययन, गुरुकुलों को प्रोत्साहन और मठ-मंदिरों के प्रबंधन पर अपने विचार रखे।
कार्यक्रम अध्यक्ष स्वामी विशोकानंद भारती जी महाराज ने शास्त्रों के नियमित अध्ययन तथा प्रमाण आधारित विमर्श की आवश्यकता बताई। उनके विचारों में भारतीय परंपरा की उस विशेषता का स्मरण था, जिसमें शास्त्रार्थ के माध्यम से मतभेदों को समझने और तर्क के आधार पर विचार रखने की परंपरा रही है।
ज्ञान का संरक्षण केवल पुराने ग्रंथों को सुरक्षित रखने तक सीमित नहीं है। उनके मूल पाठ, ऐतिहासिक संदर्भ, भाषाई अर्थ और बदलते समय में उनकी व्याख्याओं का गंभीर अध्ययन भी उतना ही आवश्यक है। परंपरा को जीवित रखने के लिए श्रद्धा के साथ अध्ययन और विवेक का संतुलन जरूरी है।
जेन-जी कॉन्क्लेव: सवाल पूछने का साहस और नेतृत्व की चुनौती
संस्कृति संसद के समानांतर आयोजित जेन-जी कॉन्क्लेव के दूसरे दिन ‘यूथ लीडरशिप: वॉयस टू एक्शन’ विषय पर युवाओं की भूमिका और नेतृत्व क्षमता को लेकर चर्चा हुई। पश्चिम बंगाल के भाजपा युवा विधायक संतु पान ने कहा कि युवा केवल देश का भविष्य नहीं, बल्कि वर्तमान भी हैं। उन्होंने युवाओं के सरकार से जवाब मांगने के अधिकार पर जोर दिया और अपने राजनीतिक अनुभवों का उल्लेख किया।
टाटा पावर के सोशल इम्पैक्ट ग्रुप के प्रमुख एवं चीफ एथिक्स काउंसलर भारत छाबड़ा ने आत्मविश्वास, सकारात्मक दृष्टिकोण और संतुलित जीवन को सफलता के महत्वपूर्ण आधार बताया। वहीं, श्रीवेश कुमार ने ‘जेन-जी’ जैसी पीढ़ीगत पहचान के आधार पर समाज को बांटने की प्रवृत्ति पर सवाल उठाए। अखंड प्रताप सिंह ने आधुनिकता को केवल पहनावे से नहीं, बल्कि विचारों की प्रगतिशीलता से जोड़ते हुए युवाओं से अपनी सांस्कृतिक जड़ों के प्रति सजग रहने की अपील की।
कवि डॉ. शिव प्रकाश साहित्य ने अपनी कविता के माध्यम से युवा पीढ़ी के साहस, संस्कार और मातृभूमि के प्रति भावनात्मक जुड़ाव को अभिव्यक्त किया। कार्यक्रम का संदेश था कि नई पीढ़ी को लेकर प्रचलित नकारात्मक धारणाओं से आगे बढ़कर उसकी रचनात्मक क्षमता और सकारात्मक ऊर्जा को पहचानना चाहिए।
युवाओं को दिशा देने का अर्थ उनकी स्वतंत्र सोच को सीमित करना नहीं है। उन्हें सही जानकारी, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, रोजगार के अवसर और लोकतांत्रिक संस्थाओं से संवाद का मंच उपलब्ध कराना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। सरकार से प्रश्न पूछना लोकतंत्र का स्वाभाविक अधिकार है और उन प्रश्नों का तथ्यपूर्ण उत्तर देना सार्वजनिक जीवन की जिम्मेदारी।
परंपरा और आधुनिकता के बीच संवाद ही भविष्य की राह
काशी में संस्कृति संसद और जेन-जी कॉन्क्लेव के दूसरे दिन का विमर्श भारतीय समाज के दो महत्वपूर्ण पक्षों को सामने लाता है। एक ओर अपनी सभ्यतागत स्मृति, धार्मिक परंपराओं और ज्ञान-विरासत को सुरक्षित रखने की आकांक्षा है; दूसरी ओर बदलते समय में युवाओं की स्वतंत्र सोच, नेतृत्व और भागीदारी की आवश्यकता है।
इन दोनों के बीच विरोध का संबंध अनिवार्य नहीं है। परंपरा यदि प्रश्नों का स्वागत करे और आधुनिकता अपनी सांस्कृतिक जड़ों को समझे, तो दोनों मिलकर समाज को अधिक जागरूक और मजबूत बना सकते हैं। सनातन संस्कृति का संरक्षण केवल नारों से नहीं, बल्कि उसके मूल्यों को जीवन में उतारने, ज्ञान को आगे बढ़ाने, सामाजिक भेदभाव कम करने और आने वाली पीढ़ियों के लिए बेहतर अवसर तैयार करने से संभव है।
काशी की सांस्कृतिक भूमि पर उठे ये विचार इसी बड़े प्रश्न की ओर संकेत करते हैं—हम अपनी विरासत को आने वाली पीढ़ियों तक किस रूप में पहुंचाना चाहते हैं? उत्तर केवल अतीत के गौरव में नहीं, बल्कि उस भविष्य में छिपा है, जहां ज्ञान के साथ करुणा, आस्था के साथ विवेक और राष्ट्रीय चेतना के साथ सामाजिक समरसता भी बनी रहे।
लेखक: यतीन्द्र मिश्र
