
यतीन्द्र मिश्र की विशेष रिपोर्ट
वाराणसी (राष्ट्र की परम्परा)। धर्म, संस्कृति और सनातन परंपराओं के संरक्षण के उद्देश्य से काशी के सिगरा स्थित रुद्राक्ष अंतरराष्ट्रीय सहयोग एवं सम्मेलन केंद्र में तीन दिवसीय संस्कृति संसद-2026 का भव्य शुभारंभ हुआ। उद्घाटन सत्र में देशभर से आए संतों, महामंडलेश्वरों, आचार्यों और विभिन्न पंथों के प्रतिनिधियों ने भारतीय संस्कृति के संरक्षण, गोमाता की रक्षा, गुरुकुल परंपरा के पुनरुत्थान तथा युवा पीढ़ी की सामाजिक भूमिका जैसे विषयों पर अपने विचार रखे।
उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता ज्योतिषपीठाधीश्वर जगद्गुरु स्वामी वासुदेवानन्द सरस्वती जी महाराज ने की। उन्होंने कहा कि सनातन धर्म और भारतीय संस्कृति के संरक्षण के लिए संस्कृति संसद जैसे आयोजन आवश्यक हैं। वहीं, अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष श्री रविंद्रपुरी जी महाराज ने संत समाज की एकजुटता पर बल देते हुए कहा कि संतों ने सदैव भारतीय संस्कृति और धर्म की रक्षा की है और आगे भी इस दायित्व का निर्वहन करते रहेंगे।
गोमाता की रक्षा के लिए कानून बनाने की मांग
जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी वासुदेवानन्द सरस्वती जी महाराज ने अपने अध्यक्षीय संबोधन में कहा कि संस्कृति संसद में संतों और विद्वानों द्वारा प्रस्तुत विचारों पर अमल किया जाना चाहिए। उनके अनुसार, सनातन धर्म और भारतीय संस्कृति के संरक्षण के लिए समाज को जागरूक करने के साथ ही आवश्यक कानूनी कदम उठाना भी जरूरी है।
उन्होंने कहा कि भारतीय संस्कृति में गो, गंगा और गीता का विशेष महत्व है। गाय भारतीय संस्कृति की आधारशिला है, इसलिए गोमाता की रक्षा के लिए प्रभावी कानून बनाया जाना चाहिए। उन्होंने वर्ष 1962 में स्वामी करपात्री जी महाराज के नेतृत्व में हुए गो-रक्षा आंदोलन का उल्लेख करते हुए समाज और सरकार से इस दिशा में ठोस पहल करने का आग्रह किया।
शंकराचार्य ने कहा कि भारतीय समाज और संस्कृति के संरक्षण के लिए धार्मिक परंपराओं के प्रति सम्मान तथा उनके अनुरूप सकारात्मक सामाजिक वातावरण तैयार करना आवश्यक है।
सनातन धर्म की रक्षा के लिए संत समाज एकजुट : रविंद्रपुरी महाराज
अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष श्री रविंद्रपुरी जी महाराज ने कहा कि अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद और अखिल भारतीय संत समिति का प्रयास है कि देशभर का संत समाज एक मंच पर आकर भारतीय संस्कृति की रक्षा में योगदान दे।
उन्होंने कहा कि संस्कृति संसद के माध्यम से विभिन्न पंथों के संतों और धर्माचार्यों को एक साथ आने का अवसर मिला है। संत समाज ने इतिहास में भारतीय संस्कृति के संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है और वर्तमान समय में भी वह इस जिम्मेदारी को निभाने के लिए प्रतिबद्ध है।
उन्होंने कहा कि सनातन धर्म और भारतीय संस्कृति के सामने आने वाली चुनौतियों का सामना करने के लिए संतों की एकजुटता, सामाजिक जागरूकता और सक्रिय भागीदारी आवश्यक है।
स्वामी जितेन्द्रानन्द सरस्वती ने युवाओं से राष्ट्र निर्माण में योगदान की अपील की
अखिल भारतीय संत समिति एवं गंगा महासभा के राष्ट्रीय महामंत्री स्वामी जितेन्द्रानन्द सरस्वती जी महाराज ने कहा कि वर्तमान समय में भारतीय संस्कृति और सनातन धर्म को लेकर अनेक प्रकार की वैचारिक चुनौतियां सामने आ रही हैं। उन्होंने दिल्ली में चल रही राजनीतिक और सामाजिक गतिविधियों का उल्लेख करते हुए संत समाज से इन परिस्थितियों को समझने तथा संस्कृति के संरक्षण के लिए सक्रिय भूमिका निभाने का आह्वान किया।
उन्होंने कहा कि जेन जी के नाम पर युवाओं को बांटने के बजाय उनकी ऊर्जा को समाज और राष्ट्र के विकास में लगाया जाना चाहिए। युवाओं को सकारात्मक दिशा देना और उनकी चिंताओं को समझना समय की आवश्यकता है।
कानूनों में बदलाव की आवश्यकता पर भी चर्चा
विश्व हिंदू परिषद के अंतरराष्ट्रीय संरक्षक दिनेश जी ने अपने संबोधन में विभिन्न कानूनों और सामाजिक व्यवस्थाओं पर सवाल उठाए। उन्होंने यूजीसी से जुड़े प्रावधानों, जातिगत विभाजन, लिव-इन रिलेशनशिप तथा पिता की संपत्ति में बेटियों की हिस्सेदारी से जुड़े पारिवारिक विवादों का उल्लेख करते हुए कहा कि इन विषयों पर व्यापक सामाजिक विमर्श होना चाहिए।
उन्होंने कहा कि जिन कानूनों को समाज और परिवार की व्यवस्था के लिए उचित नहीं माना जाता, उनमें बदलाव की मांग को लेकर संगठन अपनी भूमिका निभाएगा और सरकार के समक्ष अपना पक्ष रखेगा।
विश्व हिंदू परिषद के अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष आलोक जी ने हिंदू समाज की जनसंख्या, धर्मांतरण और धार्मिक आस्थाओं से जुड़े मुद्दों पर चिंता व्यक्त की। उन्होंने संत समाज से लोकजागरण के माध्यम से भारतीय संस्कृति और सनातन परंपराओं के प्रति जागरूकता बढ़ाने की अपील की।
गुरुकुल और संस्कार केंद्रों की स्थापना पर जोर
कथावाचक आचार्य सुधांशु जी महाराज ने कहा कि सनातन धर्म और भारतीय संस्कृति की रक्षा के लिए शिक्षा तथा संस्कारों पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है। उन्होंने गुरुकुल परंपरा को मजबूत करने और संस्कार केंद्रों की स्थापना पर बल दिया।
उन्होंने कहा कि संत समाज को इस दिशा में सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए, ताकि नई पीढ़ी भारतीय ज्ञान परंपरा, संस्कृति और नैतिक मूल्यों से जुड़ सके।
जेन जी के संदर्भ में उन्होंने युवाओं के असंतोष को समझने की आवश्यकता बताई। उनके अनुसार, युवाओं के विरोध को केवल नकारात्मक दृष्टि से देखने के बजाय उनकी समस्याओं और अपेक्षाओं को समझकर समाधान की दिशा में काम किया जाना चाहिए।
संस्कृति संसद की प्रासंगिकता पर सुनील देवधर ने रखे विचार
आयोजन समिति के अध्यक्ष श्री सुनील देवधर जी ने संस्कृति संसद की पृष्ठभूमि पर प्रकाश डालते हुए कहा कि काशी में भारतीय संस्कृति और राष्ट्र से जुड़े वैचारिक विमर्श को आगे बढ़ाने के उद्देश्य से इस आयोजन की शुरुआत हुई थी। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में संस्कृति और धर्म से जुड़े विषयों पर संवाद तथा जनजागरण की आवश्यकता और बढ़ गई है।
उन्होंने युवाओं से भ्रमित हुए बिना राष्ट्र के विकास में अपनी भूमिका निभाने की अपील की।
उद्घाटन समारोह का शुभारंभ दीप प्रज्ज्वलन के साथ हुआ। मंचासीन संतों का माल्यार्पण कर श्री सुनील देवधर, प्रो. अरविंद जोशी और प्रो. ओमप्रकाश सिंह ने स्वागत किया। कार्यक्रम का संचालन संत समिति के कोषाध्यक्ष जनार्दन हरि जी ने किया।
इस अवसर पर भारतीय संत समिति के अध्यक्ष एवं कैवल्य पीठाधीश्वर जगद्गुरु अविचलदेवाचार्य जी महाराज, विश्व हिंदू परिषद के अंतरराष्ट्रीय उपाध्यक्ष श्री चंपत राय जी, महामंडलेश्वर मनमोहन दास ‘राधे-राधे बाबा’, काशी विद्वत परिषद के अध्यक्ष प्रो. वशिष्ठ त्रिपाठी, कार्यकारी अध्यक्ष प्रो. रामचंद्र पांडेय और महामंत्री डॉ. रामनारायण द्विवेदी सहित अनेक गणमान्य लोग उपस्थित रहे।
आयोजकों के अनुसार, संस्कृति संसद में पश्चिम बंगाल, ओडिशा, झारखंड, बिहार, उत्तराखंड, राजस्थान, गुजरात, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, कर्नाटक, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, गोवा, जम्मू-कश्मीर, पंजाब, हरियाणा, दिल्ली और उत्तर प्रदेश सहित विभिन्न राज्यों से लगभग 1,500 संत, महामंडलेश्वर और आचार्य शामिल हुए। सत्र के अंत में संस्कृति पर्व पत्रिका का लोकार्पण किया गया।
देश-विदेश के कलाकारों की कलाकृतियां बनीं आकर्षण का केंद्र
संस्कृति संसद के दौरान आयोजित कला एवं छायाचित्र प्रदर्शनी में देश-विदेश के कलाकारों की कलाकृतियां दर्शकों के आकर्षण का केंद्र बनी हुई हैं। प्रदर्शनी में पद्मश्री दुलारी देवी की मधुबनी पेंटिंग और पद्मश्री श्याम शर्मा की हनुमान जी पर आधारित पेंटिंग विशेष रूप से सराही जा रही हैं।
प्रदर्शनी में काशी के घाटों, महादेव के विभिन्न स्वरूपों, शहर की धार्मिक और आध्यात्मिक विरासत तथा महाकुंभ से संबंधित कलाकृतियों को प्रदर्शित किया गया है। काशी के दृश्यों पर आधारित सात पेंटिंग, घाटों पर केंद्रित तीन पेंटिंग, महाकुंभ से जुड़ी तीन कलाकृतियां और मिथिला कला का नमूना भी प्रदर्शनी में शामिल हैं। अशोक सिंघल का चित्र कलाकार अंचल चौधरी ने बनाया है।
छायाचित्र प्रदर्शनी में हिंदू धर्म, भारतीय संस्कृति और सामाजिक जीवन से जुड़े विषयों को स्थान दिया गया है। इसमें थाईलैंड के रुबेन तस्मार, अमेरिका के डॉ. वेनिडेक्टो रियार्स और एरिन ब्रिडेन ब्रिक तथा तुर्की की देरेया अजार अस्ता सेवर के छायाचित्र शामिल हैं।
रुद्राक्ष कन्वेंशन सेंटर के प्रवेश द्वार और प्रमुख स्थानों पर आकर्षक रंगोलियों के माध्यम से भारतीय संस्कृति और परंपराओं को प्रस्तुत किया गया है। इन रंगोलियों के निर्माण में निहारिका, श्रुति, आरती, पलक, नंदिनी, खुशी, प्रियांशी, नीतू, दिशा, अंशिका, अंकिता, अनामिका, इशिका, जया, कविता और मानवेंद्र ने योगदान दिया।
जेन जी कॉन्क्लेव में युवाओं की भूमिका पर मंथन
संस्कृति संसद-2026 के अंतर्गत आयोजित जेन जी कॉन्क्लेव में युवाओं की सामाजिक भूमिका, भारतीय सांस्कृतिक दृष्टिकोण और सोशल मीडिया के प्रभाव पर चर्चा हुई। कार्यक्रम में वक्ताओं ने जेन जी की अवधारणा को लेकर अपने विचार रखे। कुछ वक्ताओं ने इसे पश्चिमी दृष्टिकोण से विकसित अवधारणा बताते हुए कहा कि भारतीय युवाओं की सामाजिक भूमिका को केवल पीढ़ियों के वर्गीकरण के आधार पर नहीं समझा जा सकता।
वक्ताओं ने भारतीय दर्शन के ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ के विचार का उल्लेख करते हुए कहा कि भारतीय संस्कृति संपूर्ण विश्व को एक परिवार के रूप में देखने की प्रेरणा देती है।
भारतीय युवा आंदोलनों में भी अहिंसक भूमिका निभा रहे : डॉ. दीपक प्रधान
कॉन्क्लेव के प्रथम सत्र में जेन जी की छवि और युवाओं की सामाजिक भूमिका पर विचार रखते हुए डॉ. दीपक प्रधान ने कहा कि सोशल मीडिया के विस्तार से भारतीय युवाओं के व्यवहार और संवाद के तरीकों में बदलाव आया है। पेपर लीक तथा प्रतियोगी परीक्षाओं से जुड़े आंदोलनों में युवाओं की भागीदारी इसका उदाहरण है।
उन्होंने कहा कि विरोध दर्ज कराने के दौरान भारतीय युवाओं ने कई अवसरों पर अहिंसक तरीका अपनाया है। उनके अनुसार, यह भारतीय संस्कृति और सामाजिक परंपराओं के प्रभाव को दर्शाता है।
बनारस घराने के कथक नृत्यकार विशाल कृष्ण ने कहा कि भारत में गुरु-शिष्य परंपरा के कारण कलाएं जीवित हैं। उन्होंने कहा कि अनुशासन और सांस्कृतिक मूल्यों के साथ युवा कलाकार अपनी भावनाओं को अभिव्यक्त कर सकते हैं।
दिल्ली सेंट्रल यूनिवर्सिटी की इशू मौर्य ने सोशल मीडिया के दौर में युवाओं को सावधानी बरतने की सलाह दी। उन्होंने कहा कि प्रत्येक घटना पर तत्काल प्रतिक्रिया देने के बजाय विश्वसनीय सूचनाओं के आधार पर विचार बनाना और प्रतिक्रिया देना जरूरी है।
सरकार और समाज युवाओं की समस्याओं को समझें
युवा वक्ता भागेश जी ने कहा कि युवाओं में असीमित क्षमता है, जिसका उपयोग सामाजिक निर्माण और राष्ट्र की उन्नति के लिए किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि छोटी-छोटी समस्याओं के कारण अपनी ऊर्जा नष्ट करने के बजाय उनके समाधान पर ध्यान देना चाहिए।
उन्होंने सरकार और समाज से युवाओं की समस्याओं, अपेक्षाओं और असंतोष पर गंभीरता से विचार करने की अपील की। उनके अनुसार, युवाओं की चिंताओं का समय रहते समाधान होने से सामाजिक असंतोष कम करने में मदद मिल सकती है।
भाजपा युवा मोर्चा के पूर्व अध्यक्ष किसलय तिवारी ने कहा कि भारतीय युवाओं के आदर्श पश्चिमी समाज की अवधारणाओं से अलग अपनी सांस्कृतिक परंपराओं में भी मौजूद हैं। उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण, लव-कुश, नचिकेता और ध्रुव जैसे पात्रों का उल्लेख करते हुए कहा कि भारतीय परंपरा में साहस, ज्ञान, अनुशासन और संकल्प के अनेक उदाहरण मिलते हैं।
उन्होंने कहा कि भारतीय युवाओं को समझने के लिए देश की सांस्कृतिक और सामाजिक पृष्ठभूमि को ध्यान में रखना चाहिए।
कॉन्क्लेव के प्रथम सत्र की शुरुआत संस्कृति संसद के मुख्य गीत ‘हम हैं शाश्वत सत्य सनातन…’ से हुई। इसमें एल-वन कोचिंग, आर्य महिला इंटर कॉलेज, एमपी इंस्टीट्यूट ऑफ कंप्यूटर एप्लीकेशन सहित वाराणसी के विभिन्न विद्यालयों और संस्थानों के छात्र-छात्राओं ने भाग लिया। कार्यक्रम के विभिन्न सत्रों का संचालन कौस्तुभ त्रिपाठी और वागेश ओझा ने किया।
संस्कृति और युवा विमर्श का साझा मंच बनी काशी
संस्कृति संसद-2026 के उद्घाटन सत्र, कला प्रदर्शनी और जेन जी कॉन्क्लेव के माध्यम से काशी में भारतीय संस्कृति, धार्मिक परंपराओं, शिक्षा, सामाजिक चुनौतियों और युवा पीढ़ी की भूमिका से जुड़े विभिन्न विषयों पर विमर्श हुआ। आयोजन में संतों और वक्ताओं ने संस्कृति संरक्षण, गुरुकुलों के विस्तार, युवाओं की समस्याओं के समाधान तथा सामाजिक जागरूकता पर बल दिया।
काशी में आयोजित यह तीन दिवसीय कार्यक्रम धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं के साथ समकालीन सामाजिक प्रश्नों को चर्चा के केंद्र में लाने का प्रयास है।
लेखक: यतीन्द्र मिश्र
