ज़नाब, जूते न गंदे हो जाएँ युवा साहब के,
देखो इंसानियत को कीचड़ में बहा दिया।
इस उम्र में उन्हें लाठी का सहारा देना था,
उस उम्र में बुजुर्ग को ही घोड़ा बना दिया।
कुर्सी का नशा आँखों पर इस कदर छाया,
सफ़ेद बालों और झुर्रियों का सम्मान भूल गए।
सीधी की माटी गवाह है इस शर्मनाक दृश्य की,
जहाँ हाकिम अपनी ही पहचान भूल गए।
वो रीढ़, जो झुक चुकी थी वक्त के थपेड़ों से,
उस पर व्यवस्था का बेदर्द बोझ लाद दिया।
नाले का पानी तो फिर भी साफ़ हो जाएगा,
इस आचरण ने हर इंसान को रुला दिया।
सत्ता की हनक में मत भूलो, ओ पटवारीजी,
कि ये बुजुर्ग ही हमारे देश की बुनियाद हैं।
जो आज अपनी पीठ पर भी तुम्हें ढो रहे हैं,
हद है बदतमीज़ी की—हम अपनी पीढ़ी खो रहे हैं।
संदर्भ
एक युवा पटवारी द्वारा नाला पार करने के लिए करीब 65 वर्षीय बुजुर्ग की पीठ पर बैठने की घटना ने संवेदनशीलता, प्रशासनिक मर्यादा और बुजुर्गों के सम्मान पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। इसी पीड़ा और सामाजिक विडंबना को यह कविता स्वर देती है।
लेखक परिचय:
संजय एम. तराणेकर कवि, लेखक एवं समीक्षक