वैश्विक खाद्य संकट की आहट! त्योहारों से पहले चीनी की जमाखोरी पर केंद्र का शिकंजा, 2027 में महंगी हो सकती है आम आदमी की थाली?
गोंदिया, महाराष्ट्र (राष्ट्र की परम्परा)। दुनिया की अर्थव्यवस्था के सामने खाद्य सुरक्षा को लेकर नई चुनौती उभरती दिखाई दे रही है। रूस-यूक्रेन युद्ध, पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष, उर्वरकों की आपूर्ति पर दबाव, ऊर्जा बाजार में अस्थिरता और संभावित एल नीनो जैसी परिस्थितियां आने वाले समय में खाद्य पदार्थों की कीमतों को प्रभावित कर सकती हैं। ऐसे माहौल में भारत सरकार ने त्योहारों से पहले चीनी की जमाखोरी और कृत्रिम किल्लत रोकने के लिए स्टॉक सीमा को और सख्त करने का फैसला किया है।
इसी बीच विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने 29 सितंबर 2026 को न्यूयॉर्क में एशिया सोसाइटी के एक कार्यक्रम में वैश्विक स्तर पर खाद्य और उर्वरक आपूर्ति को लेकर बढ़ती चुनौतियों पर चिंता जताई। उनका संकेत था कि युद्धों का असर केवल सैन्य मोर्चे तक सीमित नहीं रहता, बल्कि खाद्य, ऊर्जा, उर्वरक, व्यापार और विकासशील देशों की अर्थव्यवस्थाओं पर भी पड़ता है।
भारत सरकार ने 1 अक्टूबर 2026 को चीनी के व्यापारिक स्टॉक को लेकर संशोधित व्यवस्था घोषित की है। इसके तहत 15 अक्टूबर से 30 नवंबर 2026 तक व्यापारियों के लिए चीनी रखने की अधिकतम अवधि 15 दिन निर्धारित की गई है। सामान्य क्षेत्रों में स्टॉक सीमा 1,000 क्विंटल होगी, जबकि कोलकाता और उसके विस्तारित महानगरीय क्षेत्र तथा असम में यह सीमा 2,000 क्विंटल रखी गई है।
सरकार का यह कदम आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955 के तहत बाजार में उपलब्धता बनाए रखने, जमाखोरी पर अंकुश लगाने और त्योहारों के दौरान कृत्रिम किल्लत की संभावना कम करने के उद्देश्य से उठाया गया है। इससे पहले सितंबर में भी व्यापारियों की स्टॉक सीमा 4,000 क्विंटल से घटाकर 2,000 क्विंटल की गई थी। अब सामान्य क्षेत्रों में इसे फिर घटाकर 1,000 क्विंटल किया गया है।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार अगस्त की तुलना में चीनी की खुदरा कीमत में करीब 15 प्रतिशत और एक्स-मिल कीमत में लगभग 28 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई है। ऐसे में नई स्टॉक सीमा का उद्देश्य कीमतों पर अनावश्यक दबाव और बाजार में सट्टेबाजी जैसी गतिविधियों को नियंत्रित करना माना जा रहा है।
वैश्विक स्तर पर खाद्य संकट का खतरा केवल चीनी तक सीमित नहीं है। गेहूं, मक्का, खाद्य तेल, दालों और अन्य कृषि उत्पादों की कीमतें भी अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रम से प्रभावित हो सकती हैं। रूस और यूक्रेन वैश्विक कृषि व्यापार में महत्वपूर्ण भूमिका रखते हैं। काला सागर क्षेत्र में लंबे समय तक जारी अस्थिरता से अनाज और अन्य कृषि उत्पादों की आपूर्ति प्रभावित होने का जोखिम बना रहता है।
पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ने की स्थिति में ऊर्जा और समुद्री परिवहन लागत पर भी असर पड़ सकता है। ऊर्जा महंगी होने पर सिंचाई, परिवहन, भंडारण और खाद्य प्रसंस्करण की लागत बढ़ती है। वहीं उर्वरकों की कीमत या उपलब्धता प्रभावित होने पर किसानों की उत्पादन लागत बढ़ सकती है। इसका असर अंततः बाजार और उपभोक्ता कीमतों पर पड़ सकता है।
जलवायु परिवर्तन से जुड़ा एल नीनो भी वैश्विक खाद्य सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण कारक है। विश्व खाद्य कार्यक्रम के आकलन के मुताबिक 2026-27 के दौरान एल नीनो की स्थिति संवेदनशील देशों में खाद्य असुरक्षा को बढ़ा सकती है। उपलब्ध अनुमान के अनुसार 45 खाद्य-असुरक्षित देशों में 2027 के अंत तक करीब 27.4 करोड़ लोग तीव्र खाद्य असुरक्षा की स्थिति में पहुंच सकते हैं, जो मौजूदा अनुमान की तुलना में लगभग 4.9 करोड़ अधिक है।
हालांकि, इस आंकड़े को भारत में अतिरिक्त 4.9 करोड़ लोगों के खाद्य संकट से जोड़ना सही नहीं होगा। भारत पर किसी संभावित वैश्विक खाद्य संकट का प्रभाव देश के घरेलू कृषि उत्पादन, मानसून, सरकारी भंडार, आयात जरूरतों, अंतरराष्ट्रीय कीमतों और नीतिगत फैसलों पर निर्भर करेगा।
भारत के लिए चिंता का एक संकेत घरेलू खाद्य महंगाई में बढ़ोतरी भी है। अगस्त 2026 में खाद्य महंगाई 5.95 प्रतिशत दर्ज की गई, जबकि जुलाई में यह 5.52 प्रतिशत थी। इसी अवधि में खुदरा महंगाई 4.82 प्रतिशत रही। हालांकि यह आंकड़ा अपने आप में देशव्यापी खाद्य संकट का प्रमाण नहीं है, लेकिन यह बताता है कि खाद्य कीमतों पर दबाव को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
भारत की सबसे बड़ी ताकत उसका व्यापक कृषि उत्पादन आधार और खाद्य सुरक्षा तंत्र है। सार्वजनिक खाद्यान्न भंडार, न्यूनतम समर्थन मूल्य, सार्वजनिक वितरण प्रणाली और आवश्यक वस्तुओं पर सरकारी निगरानी जैसी व्यवस्थाएं किसी बड़े बाहरी झटके के प्रभाव को कम करने में मदद कर सकती हैं।
फिर भी आने वाले समय में कई मोर्चों पर सावधानी जरूरी होगी। यदि उर्वरक महंगे होते हैं, ऊर्जा और डीजल की कीमत बढ़ती है, परिवहन लागत बढ़ती है और मौसम फसल उत्पादन को प्रभावित करता है, तो किसानों की लागत के साथ-साथ उपभोक्ताओं का घरेलू बजट भी दबाव में आ सकता है।
ऐसे में यह कहना जल्दबाजी होगी कि 2027 में भारत में भोजन निश्चित रूप से बहुत महंगा हो जाएगा। खाद्य कीमतों का वास्तविक रुख मानसून, घरेलू उत्पादन, वैश्विक युद्धों की अवधि, ऊर्जा कीमतों, अंतरराष्ट्रीय व्यापार और सरकार की आयात-निर्यात नीतियों पर निर्भर करेगा। लेकिन संभावित जोखिमों को देखते हुए तैयारी मजबूत रखना आवश्यक है।
भारत सरकार के लिए चीनी की तरह अन्य आवश्यक खाद्य वस्तुओं की भी नियमित स्टॉक निगरानी महत्वपूर्ण होगी। इसके साथ उर्वरकों की उपलब्धता, खाद्यान्न भंडार, कृषि आपूर्ति श्रृंखला, आयात-निर्यात नीति और सार्वजनिक वितरण प्रणाली को मजबूत रखना जरूरी है। राज्यों को भी जमाखोरी, कालाबाजारी और कृत्रिम किल्लत के खिलाफ निगरानी बढ़ानी होगी।
खाद्य सुरक्षा अब केवल कृषि उत्पादन का विषय नहीं रह गई है। यह राष्ट्रीय आर्थिक सुरक्षा, ऊर्जा सुरक्षा, जलवायु नीति और विदेश नीति से भी जुड़ा हुआ प्रश्न बन चुकी है। दुनिया के किसी एक हिस्से में युद्ध, सूखा, बाढ़ या आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान दूसरे हिस्से के बाजारों और घरेलू रसोई तक असर पहुंचा सकता है।
त्योहारों से पहले चीनी स्टॉक सीमा को और कम करने का फैसला इसी व्यापक चुनौती के बीच घरेलू बाजार को स्थिर रखने की कोशिश के रूप में देखा जा सकता है। वहीं वैश्विक खाद्य सुरक्षा को लेकर सामने आ रहे अंतरराष्ट्रीय आकलन यह संकेत देते हैं कि आने वाले वर्षों में सरकारों के सामने केवल पर्याप्त भोजन उपलब्ध कराने की चुनौती नहीं होगी, बल्कि उसे आम नागरिक की पहुंच में उचित कीमत पर बनाए रखना भी उतना ही महत्वपूर्ण होगा।
विकसित भारत @2047 की दिशा में खाद्य सुरक्षा को राष्ट्रीय प्राथमिकता बनाए रखना इसलिए जरूरी है, क्योंकि किसी अर्थव्यवस्था की मजबूती का असर अंततः आम परिवार की रसोई तक दिखाई देता है। सुरक्षित आपूर्ति, नियंत्रित महंगाई और किसानों की मजबूत उत्पादन क्षमता ही लंबे समय में खाद्य सुरक्षा की स्थायी नींव तैयार कर सकती है।
विशेषज्ञ स्तंभकार, साहित्यकार, अंतरराष्ट्रीय लेखक, चिंतक, कवि एवं अधिवक्ता किशन सनमुखदास भावनानी, गोंदिया, महाराष्ट्र