नदियाँ अपना रौद्र रूप धरती हैं,

तो सिर्फ़ घर नहीं बहते-

बह जाते हैं सपने भी,

किसी माँ की उम्मीद,

किसी पिता की प्रतीक्षा,

बच्चों की आँखों में पलता कल भी।

देखों नेपाल की घाटियों में

आज पानी से ज्यादा

उन आँखों में नमी है,

हर आँकड़ा अपने भीतर

एक पूरा परिवार लिए खड़ा है।

कहीं कोई अपनों को खोज रहा,

कहीं कोई लौट आने की राह तक रहा,

और कहीं राहत की नाव,

यहाँ उजड़ गए हैं गाँव,

इंसानियत का हाथ बढ़ा रही है।

भले आँकड़े बढ़ते जाएँ,

इंसानियत के दर खुलते जाएँ,

पर संवेदनाएँ छोटी न हो;

लापता हर इंसान के लिए

उम्मीद की लौ बुझी न हो।

जो मिल गए, उन्हें घर मिले,

जो बिछुड़ गए, उनका पता मिले,

हर बेबस चेहरे को सहारा,

लाशों को अंतिम सम्मान मिलें,

हर घायल मन को दुआ मिले।

(संदर्भ – नेपाल हादसा : मौतों के बढ़ते आँकड़ों के बीच)

संजय एम तराणेकर

(कवि, लेखक व समीक्षक)

इन्दौर-452011 (मध्य प्रदेश)