लखनऊ (राष्ट्र की परम्परा)। पिछले 50 वर्षों में पुस्तकालय एवं सूचना विज्ञान के शोध का फोकस कैसे बदला, इस पर बीबीएयू के शोध ने महत्वपूर्ण तस्वीर सामने रखी है। मशीन लर्निंग आधारित विश्लेषण में डिजिटल संरक्षण सबसे प्रमुख शोध-विषय बनकर उभरा है, जबकि डिजिटल पुस्तकालय सेवाएं, बिब्लियोमेट्रिक अनुसंधान और ऑनलाइन शिक्षण भी शोध के प्रमुख केंद्र रहे हैं।
बाबासाहेब भीमराव अम्बेडकर विश्वविद्यालय (बीबीएयू), लखनऊ के पुस्तकालय एवं सूचना विज्ञान विभाग के शोधछात्र विक्रांत दुबे और सूचना विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी संकाय की संकायाध्यक्ष प्रो. शिल्पी वर्मा का शोध पत्र डेसिडॉक जर्नल ऑफ लाइब्रेरी एंड इंफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी के सितंबर 2026 अंक में प्रकाशित हुआ है। शोध पत्र में 1974 से 2024 तक पुस्तकालय एवं सूचना विज्ञान से जुड़े शोध प्रकाशनों का मशीन लर्निंग के जरिए विश्लेषण किया गया है।
शोधकर्ताओं ने 50 वर्षों के दौरान प्रकाशित 279 स्कोपस-अनुक्रमित शोध प्रकाशनों पर लेटेंट डिरिशले एलोकेशन (एलडीए) तकनीक का इस्तेमाल किया। विश्लेषण में पांच प्रमुख विषय-समूह सामने आए। इनमें डिजिटल संरक्षण एवं पुस्तकालय सूचना विज्ञान से संबंधित शोध की हिस्सेदारी करीब 30 प्रतिशत रही।
वहीं बिब्लियोमेट्रिक अनुसंधान, डिजिटल पुस्तकालय सेवाएं और ऑनलाइन शिक्षण से जुड़े विषयों की हिस्सेदारी करीब 20-20 प्रतिशत रही। शेष करीब 10 प्रतिशत शोध उभरती तकनीकों और नए रुझानों से संबंधित पाया गया।
शोध के मुताबिक 1995 से पहले इस क्षेत्र में प्रकाशन गतिविधि सीमित थी। वर्ष 2000 के बाद शोध प्रकाशनों में तेजी आई और 2015 से 2020 के बीच यह गतिविधि अपने उच्चतम स्तर पर पहुंची। शोधकर्ताओं ने इस दौर को एनडीएलआई और ई-शोधसिंधु जैसी डिजिटल पहलों के विस्तार से भी जोड़ा है।
अध्ययन में डिजिटल संरक्षण को लेकर भारतीय पुस्तकालयों के सामने मौजूद चुनौतियों और संभावनाओं पर भी जोर दिया गया है। शोधकर्ताओं का कहना है कि पुस्तकालयों को ओएआईएस और प्रीमिस जैसे अंतरराष्ट्रीय मानकों को अपनाने के साथ डिजिटल बुनियादी ढांचे को मजबूत करना होगा। बेहतर मेटाडेटा, वितरित डिजिटल संरक्षण व्यवस्था और दीर्घकालिक अभिलेखीय रणनीति भी समय की जरूरत है।
शोध में यह भी सामने आया कि बिब्लियोमेट्रिक्स और डिजिटल सेवाओं का महत्व लगातार बढ़ रहा है। ऐसे में पुस्तकालय एवं सूचना विज्ञान के विद्यार्थियों और पेशेवरों के लिए डेटा एनालिटिक्स, टेक्स्ट माइनिंग और डेटा विजुअलाइजेशन जैसे क्षेत्रों में दक्षता विकसित करना जरूरी होगा।
अंतरराष्ट्रीय और भारतीय परिदृश्य की तुलना में शोधकर्ताओं ने पाया कि विदेशों में डिजिटल संरक्षण के लिए लॉकस जैसी सहयोगी परियोजनाओं, ओएआईएस आधारित मानकों और प्लान एस जैसी पहलों का इस्तेमाल हो रहा है। फाइल क्षरण की भविष्यवाणी, स्वचालित मेटाडेटा निर्माण और अन्य एआई आधारित तकनीकों का प्रयोग भी तेजी से बढ़ रहा है।
भारत में एनडीएलआई की डिजिटलीकरण परियोजनाओं, इनफ्लिबनेट के शोधगंगा जैसे संस्थागत भंडारों और सुरक्षित अभिलेखीय व्यवस्थाओं के जरिए महत्वपूर्ण प्रगति हुई है। हालांकि एआई आधारित डिजिटल संरक्षण, स्वचालन और उन्नत डेटा विश्लेषण अभी शुरुआती दौर में हैं।
शोध में यह भी रेखांकित किया गया है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ऑल्टमेट्रिक्स, नेटवर्क विजुअलाइजेशन और एल्गोरिदमिक मैपिंग जैसे आधुनिक तरीकों का इस्तेमाल बढ़ रहा है, जबकि भारतीय शोध अभी काफी हद तक वर्णनात्मक स्वरूप में है। इसी तरह स्वयं और ई-शोधसिंधु जैसे डिजिटल मंच उपलब्ध होने के बावजूद लर्निंग एनालिटिक्स का इस्तेमाल सीमित है।
भविष्य के उभरते क्षेत्रों में ब्लॉकचेन आधारित डिजिटल अधिकार प्रबंधन, एआई की मदद से सूचीकरण, एआर/वीआर तकनीक और स्मार्ट पुस्तकालय अवसंरचना को प्रमुखता दी गई है। शोधकर्ताओं के अनुसार राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सहयोग इन क्षेत्रों में मुक्त पहुंच प्रकाशन, डिजिटल संरक्षण और तकनीक आधारित पुस्तकालय सेवाओं को नई दिशा दे सकता है।
शोध पत्र डेसिडॉक जर्नल ऑफ लाइब्रेरी एंड इंफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी के खंड 46, अंक 5 में पृष्ठ 569 से 576 तक प्रकाशित हुआ है। पत्रिका स्कोपस/स्किमागो सूची में पुस्तकालय एवं सूचना विज्ञान श्रेणी की क्यू2 पत्रिका है और विभिन्न अंतरराष्ट्रीय शोध सूचकांकों में अनुक्रमित है।
इस उपलब्धि पर विभाग के शिक्षकों, शोधार्थियों और विद्यार्थियों ने विक्रांत दुबे और प्रो. शिल्पी वर्मा को बधाई दी।