Tag: Hindi Poetry

छपकर बिकते थे कभी, सच के थे अख़बार,अब तो बिककर छप रहे, कलम है शर्मसार॥

✍️ डॉ. प्रियंका सौरभ सच की कीमत लग गई, बोली लगे बाज़ार,ख़बरों के भी दाम हैं, बिकता हर विचार।इश्तहारों के तले, दबे जन सरोकार—छपकर बिकते थे कभी, सच के थे…

अच्छा पेड़–अच्छा फल

✍️ डा० कर्नल आदि शंकर मिश्र ‘आदित्य’ ‘विद्या वाचस्पति’ जीवन सफ़र उनके लिए सुहावना है,जो इस सफ़र का आनंद उठाते हैं।कठिन वही बना लेते हैं राहों को,जो तुलना में अपना…