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रहीमदास: नीति, भक्ति और मानवीय करुणा का शाश्वत स्वर

पुनीत मिश्र “जो रहीम उत्तम प्रकृति, का करी सकत कुसंग। चन्दन विष व्यापे नहीं, लिपटे रहत भुजंग॥”यह दोहा केवल काव्य-सौंदर्य नहीं, बल्कि मनुष्य के चरित्र का दार्शनिक उद्घोष है। चन्दन…