हिरासत के पहले क्षण से शुरू होगी 24 घंटे की संवैधानिक घड़ी, पुलिसिया मनमानी पर लगेगी लगाम?

गिरफ्तारी के कागजों में दर्ज समय नहीं, वास्तविक हिरासत होगी निर्णायक; मजिस्ट्रेट को दर्ज करना होगा हिरासत का सही समय
लेखक: एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी, गोंदिया, महाराष्ट्र
प्रस्तावना: नागरिक स्वतंत्रता की रक्षा का मजबूत संदेश
गोंदिया (महाराष्ट्र)। लोकतंत्र में कानून का शासन केवल अपराधियों को दंडित करने तक सीमित नहीं है, बल्कि निर्दोष व्यक्ति की स्वतंत्रता, सम्मान और संवैधानिक अधिकारों की रक्षा करना भी उसकी बुनियादी जिम्मेदारी है। इसी दिशा में सुप्रीम कोर्ट ने 5 नवंबर 2026 को सुजीत दास एवं अन्य बनाम भारत संघ मामले में गिरफ्तारी और हिरासत से जुड़े 24 घंटे के संवैधानिक नियम की महत्वपूर्ण व्याख्या की। इस निर्णय का केंद्रीय संदेश स्पष्ट है कि किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता वास्तव में जिस समय बाधित होती है, उसी समय से संवैधानिक समय-सीमा की गणना का प्रश्न उठता है। पुलिस के दस्तावेजों में बाद में दर्ज किया गया गिरफ्तारी का समय अपने आप में निर्णायक नहीं हो सकता।
यह निर्णय केवल एक आपराधिक मामले तक सीमित नहीं है। यह पुलिस, जांच एजेंसियों, न्यायिक मजिस्ट्रेटों और आम नागरिकों को संवैधानिक अधिकारों तथा कानूनी जवाबदेही का महत्व समझाने वाला फैसला है।
1. क्या था पूरा मामला?
सुप्रीम कोर्ट में सुजीत दास और अन्य याचिकाकर्ताओं का मामला एनडीपीएस अधिनियम के अंतर्गत मादक पदार्थों की बरामदगी से संबंधित था। मामले के अभिलेखों के अनुसार, चार व्यक्तियों को 29 सितंबर 2025 को लगभग दोपहर 2:30 बजे रोका गया था। तलाशी और जब्ती की कार्रवाई के दौरान मादक पदार्थों की बरामदगी हुई। इसके बाद उनकी औपचारिक गिरफ्तारी 30 सितंबर 2025 को सुबह लगभग 11 बजे और 11:15 बजे दर्ज की गई।
तलाशी एवं जब्ती की प्रक्रिया समाप्त होने और औपचारिक गिरफ्तारी के बीच लगभग 18 घंटे का अंतर था। अभियोजन पक्ष ने इस अवधि को वैधानिक प्रक्रिया पूरी करने से संबंधित बताया, जबकि याचिकाकर्ताओं की ओर से दलील दी गई कि उनकी स्वतंत्रता पहले ही बाधित हो चुकी थी। ऐसे में गिरफ्तारी का समय बाद में दर्ज करके संवैधानिक सुरक्षा को सीमित नहीं किया जा सकता।
न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुइयां और न्यायमूर्ति अतुल एस. चांदुरकर की पीठ ने इस प्रश्न पर विचार करते हुए त्रिपुरा हाईकोर्ट के 29 अप्रैल 2026 के आदेश को निरस्त कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने संबंधित व्यक्तियों को अधिकतम सात दिनों के भीतर सक्षम विशेष अदालत के समक्ष पेश करने और उसके बाद निर्धारित शर्तों पर जमानत पर रिहा करने का निर्देश दिया। इस प्रकार मामले में न्यायालय ने केवल औपचारिक गिरफ्तारी के समय पर निर्भर रहने वाली व्याख्या को स्वीकार नहीं किया।
2. अनुच्छेद 22(2): 24 घंटे का नियम क्यों है महत्वपूर्ण?
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 22(2) कहता है कि गिरफ्तार और हिरासत में रखे गए व्यक्ति को गिरफ्तारी के 24 घंटे के भीतर निकटतम मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किया जाना चाहिए। इसमें गिरफ्तारी स्थल से मजिस्ट्रेट की अदालत तक पहुंचने के लिए आवश्यक यात्रा का समय शामिल नहीं किया जाता। इसके अतिरिक्त हिरासत जारी रखने के लिए निर्धारित कानूनी प्रक्रिया का पालन आवश्यक है।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि संविधान में यात्रा के आवश्यक समय के अतिरिक्त किसी दूसरी अवधि को सामान्य रूप से घटाने की अनुमति नहीं है। जांच, पूछताछ, तलाशी अथवा जब्ती की प्रक्रिया के नाम पर किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता बाधित हो और फिर उस अवधि को संवैधानिक गणना से बाहर रखने का प्रयास किया जाए, तो ऐसी व्यवस्था संविधान की सुरक्षा को निष्प्रभावी कर सकती है।
उदाहरण के लिए, यदि किसी व्यक्ति को सुबह 8 बजे इस तरह पुलिस के नियंत्रण में ले लिया जाता है कि वह अपनी इच्छा से वहां से जा नहीं सकता, तो केवल दोपहर 2 बजे गिरफ्तारी मेमो तैयार कर देने से संवैधानिक घड़ी दोपहर 2 बजे से शुरू नहीं मानी जा सकती। वास्तविक परिस्थितियों और स्वतंत्रता पर लगी रोक का समय महत्वपूर्ण होगा।
3. भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धाराएं 57 और 58
इस मामले में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 57 और 58 का विशेष महत्व है। धारा 57 गिरफ्तार व्यक्ति को अनावश्यक देरी के बिना सक्षम मजिस्ट्रेट या संबंधित अधिकारी के समक्ष ले जाने से संबंधित है। धारा 58 मजिस्ट्रेट के विशेष आदेश के बिना निर्धारित सीमा से अधिक हिरासत में रखने पर रोक लगाती है।
धारा 58 के अंतर्गत 24 घंटे की सीमा के साथ यह भी महत्वपूर्ण है कि हिरासत परिस्थितियों के अनुसार उचित अवधि से अधिक न हो। इसका अर्थ है कि 24 घंटे पूरे होने तक पुलिस को मनमानी करने की खुली छूट नहीं मिल जाती। यदि मजिस्ट्रेट को लगता है कि हिरासत अनावश्यक रूप से लंबी थी, तो वह रिमांड देने से इनकार कर सकता है।
यहां एक आवश्यक अंतर समझना चाहिए: हर पूछताछ अपने आप में गिरफ्तारी नहीं होती। लेकिन यदि परिस्थितियों में व्यक्ति की स्वतंत्रता वास्तव में बाधित हो चुकी है, तो केवल कार्रवाई को पूछताछ या जांच का नाम देने से संवैधानिक सुरक्षा समाप्त नहीं हो जाती।
4. क्या पुलिसिया मनमानी और हिरासत में हिंसा पर लगेगी लगाम?
पुलिस और जांच एजेंसियां कानून-व्यवस्था बनाए रखने तथा अपराधों की जांच करने के लिए आवश्यक संस्थाएं हैं। लेकिन उनकी शक्तियां असीमित नहीं हैं। समस्या तब उत्पन्न होती है जब किसी व्यक्ति को पूछताछ के नाम पर घंटों रोककर रखा जाता है, परिवार को उसकी स्थिति की जानकारी नहीं मिलती या गिरफ्तारी के दस्तावेज बाद में तैयार किए जाते हैं।
ऐसी अपारदर्शी प्रक्रिया व्यक्ति और उसके परिवार को मानसिक तनाव तथा आर्थिक कठिनाइयों में डाल सकती है। कुछ परिस्थितियों में इससे अनुचित दबाव, अवैध वसूली या हिरासत में हिंसा की आशंका भी बढ़ सकती है। हालांकि किसी एक घटना के आधार पर सभी पुलिसकर्मियों को दोषी ठहराना उचित नहीं होगा।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने निर्णय में हिरासत के दौरान हिंसा और अधिकारों के दुरुपयोग की समस्या को रेखांकित किया। वास्तविक हिरासत के समय को दर्ज करना और न्यायिक जांच के दायरे में लाना इस तरह के संभावित दुरुपयोग पर अंकुश लगाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। फिर भी यह मान लेना उचित नहीं होगा कि केवल इस फैसले से पुलिसिया मनमानी या थर्ड डिग्री की घटनाएं पूरी तरह समाप्त हो जाएंगी। इसके लिए निष्पक्ष जांच, जवाबदेही और कानून के प्रभावी क्रियान्वयन की भी जरूरत होगी।
5. मजिस्ट्रेट की जिम्मेदारी अब और महत्वपूर्ण
गिरफ्तार व्यक्ति को अदालत में पेश किए जाने पर मजिस्ट्रेट की भूमिका केवल पुलिस के दस्तावेजों पर हस्ताक्षर करने तक सीमित नहीं है। न्यायिक अधिकारी को यह देखना होगा कि व्यक्ति की स्वतंत्रता वास्तव में कब बाधित हुई, उसे कब पुलिस के नियंत्रण में लिया गया और अदालत में पेश करने में कितना समय लगा।
सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि मजिस्ट्रेट हिरासत की वास्तविक तारीख और समय दर्ज करे तथा 24 घंटे की संवैधानिक सीमा के पालन की जांच करे। यदि समय-सीमा का उल्लंघन सामने आता है, तो न्यायालय ने तत्काल रिहाई का निर्देश दिया है। इसके अलावा, 24 घंटे की सीमा के भीतर भी हिरासत अनुचित रूप से लंबी होने पर मजिस्ट्रेट रिमांड देने से इनकार कर सकता है।
यह व्यवस्था न्यायिक निगरानी को अधिक प्रभावी बनाने और पुलिस की कार्रवाई को कानून के दायरे में रखने के लिए महत्वपूर्ण है।
6. कठोर कानून भी मौलिक अधिकारों से ऊपर नहीं
एनडीपीएस अधिनियम जैसे विशेष कानूनों में जमानत की कठोर शर्तें हैं। इसके बावजूद संविधान के अनुच्छेद 21 और 22 के तहत प्राप्त अधिकार समाप्त नहीं हो जाते। गंभीर आरोपों की जांच करना आवश्यक है, लेकिन जांच एजेंसी को संवैधानिक प्रक्रिया का पालन भी करना होगा।
इस फैसले का महत्व उन मामलों में भी है, जहां कठोर दंडात्मक कानून लागू होते हैं। हालांकि इसे यूएपीए, पीएमएलए या एनडीपीएस के प्रत्येक मामले में स्वतः जमानत मिलने का आदेश नहीं समझना चाहिए। प्रत्येक मामले में लागू कानून, तथ्य और न्यायालय के निर्देश महत्वपूर्ण रहेंगे।
7. आम नागरिक अपने अधिकारों की रक्षा कैसे करें?
यदि किसी व्यक्ति को पुलिस पूछताछ के लिए ले जाती है, तो परिवार को यह पता करने का प्रयास करना चाहिए कि उसे किस थाने या एजेंसी के कार्यालय में ले जाया गया है और किस अधिकारी ने कार्रवाई की है। घटनास्थल के सीसीटीवी फुटेज, उपलब्ध संदेश, गवाहों के विवरण और अन्य प्रासंगिक साक्ष्य सुरक्षित रखना उपयोगी हो सकता है।
गिरफ्तारी होने पर गिरफ्तारी मेमो, दर्ज समय, गिरफ्तारी के आधार और संबंधित थाने की जानकारी प्राप्त करने का प्रयास करें। आवश्यकता पड़ने पर अधिवक्ता की सहायता लेकर वास्तविक हिरासत की अवधि और संवैधानिक सुरक्षा के उल्लंघन का मुद्दा मजिस्ट्रेट के समक्ष उठाया जा सकता है। परिस्थितियों के अनुसार उच्च न्यायालय में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका सहित उचित कानूनी उपाय भी उपलब्ध हो सकते हैं।
नागरिकों को ध्यान रखना चाहिए कि केवल पूछताछ के लिए बुलाया जाना और किसी व्यक्ति को उसकी इच्छा के विरुद्ध प्रभावी रूप से रोककर रखना अलग परिस्थितियां हैं। कानूनी स्थिति का निर्धारण तथ्यों और परिस्थितियों के आधार पर होगा।
निष्कर्ष: संविधान की शक्ति और संस्थागत जवाबदेही
सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय नागरिक स्वतंत्रता, पुलिस की जवाबदेही और न्यायिक निगरानी के बीच संतुलन को मजबूत करने वाला महत्वपूर्ण कदम है। इसका संदेश साफ है कि गिरफ्तारी की प्रक्रिया को केवल कागजी औपचारिकताओं से नियंत्रित नहीं किया जा सकता। जब किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता पर वास्तविक रोक लगती है, तब संवैधानिक सुरक्षा की अनदेखी नहीं की जा सकती।
लोकतंत्र में पुलिस की भूमिका महत्वपूर्ण है, लेकिन उसकी शक्ति कानून और संविधान की सीमाओं के भीतर ही वैध है। वास्तविक हिरासत का समय दर्ज करना, मजिस्ट्रेट द्वारा उसकी स्वतंत्र जांच करना और उल्लंघन पर प्रभावी न्यायिक कार्रवाई करना नागरिकों के अधिकारों की रक्षा के लिए जरूरी है।
अंततः कानून की असली ताकत इसी में है कि वह अपराध की जांच करने वाली संस्थाओं को भी संवैधानिक मर्यादाओं का पालन करने के लिए बाध्य करे। यही विधि के शासन का सार है और यही नागरिक स्वतंत्रता की वास्तविक सुरक्षा।
लेखक परिचय: एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी,
गोंदिया, महाराष्ट्र। विशेषज्ञ स्तंभकार, साहित्यकार, अंतरराष्ट्रीय लेखक, चिंतक, कवि एवं संगीत माध्यमा; सीए (एटीसी), अधिवक्ता।
