तंत्र सोता रहा…!
जर्जर इमारतें गिरती रहीं, तंत्र सोता रहा,दीवारों की दरारें खूब चीखती रहीं,हमेशा शहर खामोश होता रहा।किसी छत ने पहले ही कहा था—“अब मुझमें दम नहीं है,”किसी खंभे ने भी काँपकर…
निष्पक्ष खबर, सशक्त विचार
जर्जर इमारतें गिरती रहीं, तंत्र सोता रहा,दीवारों की दरारें खूब चीखती रहीं,हमेशा शहर खामोश होता रहा।किसी छत ने पहले ही कहा था—“अब मुझमें दम नहीं है,”किसी खंभे ने भी काँपकर…