ईश्वर ने सोचा एक दिन,
कि बनाऊँ ऐसी रचना,
जिसमें प्रेम हो, दया हो,
और धर्म-कर्म की संरचना।
फिर इंसान बनाया उसने,
हृदय में प्रेम भर दिया,
हाथों को कर्म दिया,
माथे पर धर्म लिख दिया।
धन बनाया दासी उसकी,
कहा “ये तेरे काम आएगी,
भूख मिटेगी, प्यास बुझेगी,
जीवन की राह सज जाएगी।”
पर वक्त ने कैसी करवट ली,
सब कुछ उल्टा हो गया,
मालिक बना धन अब यहाँ,
और इंसान दास हो गया।
अब इंसान बिकता बाज़ार में,
और रिश्ते तौले जाते हैं,
प्रेम की बोली लगती है,
इंसान इस्तेमाल होते हैं।
आदमी धन से प्यार करता है,
इंसान का इस्तेमाल करता है,
ऊपर बैठा ईश्वर देख कर,
बस हैरान-परेशान रहता है।
आदित्य ईश्वर सोचता है,
क्या यही मेरी कल्पना थी?
मैंने धन बनाया था इंसान के लिए,
इंसान बनाया था इंसान के लिए।
- डॉ. कर्नल आदिशंकर मिश्र ‘आदित्य’