Tuesday, July 28, 2026
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काँटा काँटे से निकलता है

आग इतनी लगी है यहाँ कि,
इन्सान इन्सान से जलता है,
पूजा तो भगवान की करता हूँ,
क़त्ल सुंदर फूलों का होता है।

जाता हूँ मंदिर में पुण्य कमाने,
पर पाप करके ही तो आता हूँ,
गुनाह की क्षमा प्रभु से माँगता हूँ,
पर दूसरा गुनाह करके आता हूँ।

जीवन एक नाटक बन गया है,
जहाँ रंग मंच का कलाकार हूँ,
बिना ख़ुद कोई ख़ुशी पाये ही मैं,
औरों को ख़ुशी के लिये हँसाता हूँ।

कभी कभी ऐसा भी तो होता है कि
हँसने मुस्कुराने का मन नहीं होता है,
फिर भी मुस्कुराकर कहना पड़ता है,
ठीक हूँ और सब कुछ ठीक ठाक है।

मुझे विश्वास है कि मेरा कर्म
मेरे जीवन भर सदा मेरे साथ है,
फिर भी चिंता इस बात की है कि,
कई अन्य लोग मेरे ख़िलाफ़ हैं।

एक अनुभव की बात बतलाता हूँ,
जैसे लोहे से लोहा काटा जाता है,
आदित्य पैर में काँटा चुभ जाता है,
तो काँटा काँटे से निकाला जाता है।

  • डा. कर्नल आदि शंकर मिश्र, ‘आदित्य’ ‘विद्यावाचस्पति’
    लखनऊ
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