
BRICS Summit 2026: मोदी-शी मुलाकात पर दुनिया की नजर, भारत के सामने कूटनीति से आगे परिणाम देने की चुनौती
नई दिल्ली (राष्ट्र की परम्परा डेस्क) 12 सितंबर 2026। बदलती वैश्विक राजनीति के बीच नई दिल्ली में 18वें BRICS शिखर सम्मेलन की शुरुआत हो रही है। 12 और 13 सितंबर को होने वाले इस सम्मेलन में वैश्विक शासन में सुधार, व्यापार, निवेश, तकनीक, ऊर्जा, खाद्य सुरक्षा और ग्लोबल साउथ की प्राथमिकताओं जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा होगी। BRICS के विस्तार के बाद यह समूह अब दुनिया की बड़ी आबादी और वैश्विक अर्थव्यवस्था के महत्वपूर्ण हिस्से का प्रतिनिधित्व करता है।
सम्मेलन ऐसे समय हो रहा है जब पश्चिम एशिया में संघर्ष, अमेरिका-चीन प्रतिद्वंद्विता, वैश्विक व्यापार में अस्थिरता और विकासशील देशों की बढ़ती वित्तीय जरूरतों ने अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के सामने नई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं। ऐसे में भारत की अध्यक्षता के सामने सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या BRICS को केवल राजनीतिक संवाद के मंच से आगे बढ़ाकर व्यावहारिक और परिणाम देने वाली साझेदारी में बदला जा सकता है।
मोदी-शी मुलाकात पर टिकी दुनिया की नजर
शिखर सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की संभावित द्विपक्षीय बैठक पर विशेष नजर रहेगी। शी जिनपिंग करीब सात वर्ष बाद भारत दौरे पर आ रहे हैं। 2019 के मामल्लपुरम शिखर सम्मेलन के बाद यह उनकी पहली भारत यात्रा है।
2020 में गलवान घाटी की हिंसक झड़प के बाद भारत-चीन संबंधों में लंबे समय तक तनाव रहा। हालांकि पिछले कुछ वर्षों में दोनों देशों के बीच संवाद और संबंधों को सामान्य बनाने की प्रक्रिया आगे बढ़ी है। रूस के कजान में 2024 के BRICS सम्मेलन और 2025 में तियानजिन में SCO सम्मेलन के दौरान मोदी और शी की मुलाकात हो चुकी है। नई दिल्ली की बैठक को इसी कूटनीतिक प्रक्रिया की अगली महत्वपूर्ण कड़ी माना जा रहा है।
चीन के रुख में दिखे सकारात्मक संकेत
मोदी-शी बैठक से पहले भारत में चीन के राजदूत शू फेइहॉन्ग की ओर से सकारात्मक संदेश सामने आया है। उन्होंने कहा है कि चीन दोनों नेताओं के रणनीतिक मार्गदर्शन को लागू करने, बातचीत और सहयोग बढ़ाने तथा मतभेदों को उचित तरीके से सुलझाने के लिए भारत के साथ काम करना चाहता है।
हालांकि दोनों देशों के बीच सबसे बड़ी चुनौती आपसी भरोसे की बहाली है। इसलिए बैठक में केवल कूटनीतिक गर्मजोशी ही नहीं, बल्कि सीमा और व्यापार जैसे संवेदनशील मुद्दों पर वास्तविक प्रगति की संभावनाएं भी महत्वपूर्ण रहेंगी।
LAC से व्यापार तक, किन मुद्दों पर हो सकती है चर्चा?
मोदी-शी बातचीत में वास्तविक नियंत्रण रेखा यानी LAC से जुड़े मुद्दे प्रमुख रह सकते हैं। गलवान के बाद सीमा पर तनाव कम करने के लिए सैन्य और राजनयिक स्तर पर कई दौर की बातचीत हुई है, लेकिन दोनों देशों के बीच पूरी तरह पुराना भरोसा बहाल होना अभी भी चुनौती बना हुआ है।
व्यापार और आर्थिक संबंध भी बातचीत का महत्वपूर्ण हिस्सा हो सकते हैं। चीन भारत के प्रमुख कारोबारी साझेदारों में शामिल है, लेकिन भारत लंबे समय से चीन के साथ व्यापार घाटे को लेकर चिंता जताता रहा है। ऐसे में निवेश, बाजार पहुंच, व्यापार संतुलन और आर्थिक सहयोग के रास्तों पर चर्चा की संभावना महत्वपूर्ण है।
BRICS में भारत के सामने बड़ी कूटनीतिक परीक्षा
BRICS का विस्तार समूह की ताकत बढ़ाने के साथ उसकी चुनौती भी बढ़ाता है। अलग-अलग राजनीतिक व्यवस्थाओं, आर्थिक हितों और क्षेत्रीय प्राथमिकताओं वाले देशों के बीच सहमति बनाना आसान नहीं है। पश्चिम एशिया के मौजूदा संघर्ष ने सदस्य देशों के बीच मौजूद मतभेदों को भी अधिक स्पष्ट किया है।
BRICS की चर्चा अक्सर साझा मुद्रा और डॉलर के विकल्प के संदर्भ में होती है। हालांकि साझा BRICS मुद्रा, स्थानीय मुद्राओं में व्यापार और डिजिटल भुगतान प्रणालियों को जोड़ना अलग-अलग अवधारणाएं हैं। भारत के लिए फिलहाल अधिक व्यावहारिक रास्ता ऐसी सीमा-पार भुगतान व्यवस्था को बढ़ावा देना हो सकता है, जिससे लेनदेन आसान हो और डॉलर पर अत्यधिक निर्भरता कुछ हद तक कम हो।
इसका अर्थ डॉलर को अचानक समाप्त करना नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय व्यापार में भुगतान के अधिक विकल्प विकसित करना है।
डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर में भारत का अनुभव बन सकता है मॉडल
BRICS में भारत की एक विशिष्ट ताकत उसका Digital Public Infrastructure और बड़े पैमाने पर डिजिटल भुगतान का अनुभव है। भारत इस अनुभव को विकासशील देशों के साथ साझा कर डिजिटल सेवाओं, वित्तीय समावेशन और सीमा-पार भुगतान सहयोग को आगे बढ़ा सकता है।
इसके अलावा न्यू डेवलपमेंट बैंक के माध्यम से विकास वित्त, स्थानीय मुद्रा में वित्तपोषण और बुनियादी ढांचे के लिए सस्ती पूंजी उपलब्ध कराने जैसे मुद्दे भी भारत की प्राथमिकताओं में रह सकते हैं। जलवायु परिवर्तन और विकासशील देशों की वित्तीय जरूरतों को देखते हुए यह सहयोग ग्लोबल साउथ के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है।
सम्मेलन की सफलता का असली पैमाना क्या होगा?
भारत की BRICS अध्यक्षता की सफलता केवल शिखर सम्मेलन में जारी होने वाले घोषणापत्र से तय नहीं होगी। असली परीक्षा सम्मेलन के बाद होगी।
क्या विकास वित्त से सदस्य देशों को वास्तविक लाभ मिलेगा? क्या डिजिटल और भुगतान सहयोग जमीन पर लागू होगा? क्या व्यापार और तकनीकी सहयोग में ठोस प्रगति होगी? और सबसे महत्वपूर्ण, क्या अलग-अलग हितों वाले सदस्य देशों के बीच मतभेदों के बावजूद सहयोग की निरंतरता बनी रहेगी?
नई दिल्ली में शी जिनपिंग और व्लादिमीर पुतिन जैसे प्रमुख नेताओं की मौजूदगी भारत की कूटनीतिक क्षमता को जरूर रेखांकित करेगी। लेकिन भारत की वास्तविक सफलता तब मानी जाएगी, जब BRICS से निकली घोषणाएं आने वाले वर्षों में ठोस संस्थागत और आर्थिक परिणामों में दिखाई दें।
मोदी-शी मुलाकात इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसका प्रभाव केवल भारत-चीन संबंधों तक सीमित नहीं रहेगा। एशिया की दो बड़ी शक्तियों के बीच संवाद की दिशा बदलती वैश्विक राजनीति, क्षेत्रीय स्थिरता और ग्लोबल साउथ के भविष्य को लेकर भी महत्वपूर्ण संकेत दे सकती है।
फिलहाल दुनिया की निगाह नई दिल्ली पर है—क्या BRICS केवल संवाद का मंच बना रहेगा या भारत की अध्यक्षता में परिणाम देने वाली साझेदारी की दिशा में निर्णायक कदम उठाएगा?
