मथुरा(राष्ट्र की परम्परा)
निधिवन की लताओं में,
बसते हैं श्याम मेरे l
इसकी रज को माथे पर लगा,
बन जाते बिगड़े काम मेरे।
कदम रखते ही इस धरा पर-
पैरों की थिरकन बढ़ जाती है l
देख रहे मुझे कृष्ण मुरारी,
सोच दिल की धड़कन बढ़ जाती हैI
कैसा रूप श्रृंगार करूं मैं ,
मुझ पर भी रीझे श्याम मेरे।
स्मरण मात्र से ही,
बन जाते बिगड़े काम मेरे l
निधिवन की सारी लताएं ,
श्याम श्याम पुकारती हैं l
वह लता नहीं गोपिया है,
जो श्री कृष्ण को बुलाती हैं l
रास मंडल में गोपियों के साथ,
रास रचाते हैं श्याम मेरे l
रज को माथे पर लगाकर ,
बन जाते हैं बिगड़े काम मेरे-
बन जाते बिगड़े काम मेरे l
चारु मित्तल
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