उन दीवारों से पूछो वो ‘रातें’ कैसी थीं,
जब ‘रोटी’ भी छुप-छुप के खाती थी।
उनके आँसू भी ‘आवाज़’ न करें कहीं,
इस डर से हर ‘पीड़ा’ दबाई जाती थी।
नन्ही-सी उम्र में सपने देखें थे कोमल,
लेकिन किस्मत ने यूं बोझ थमा दिया।
अपनों के मध्य में ही ‘पराया’ बनाकर,
ज़िन्दगी जीना जैसे ‘सज़ा’ बना दिया।
हर एक चोट ने दिल को ‘तोड़ा’ जरूर,
पर स्वयं की हिम्मत को तोड़ ना पाई।
यहाँ ‘अंधेरों’ ने भी लाख कोशिशे की,
पर एक आशा की किरण बुझ न पाई।
एक दिन जब हद से ही गुज़र गया दर्द,
और साँसें भी ज्यादा भारी लगने लगीं।
तबसे ‘भीतर’ की एक छोटी-सी उम्मीद,
अंदर ही हौले-हौले से फिर जगने लगी।
कहा—”तू खत्म होने के लिए नहीं बनी,
तू तो एक नवद कहानी है बदलाव की।
जो राख से भी उठकर जल उठेगी फिर,
एक नई उजली होके निकले आग सी।”
आँसू को ताकत बना डर को छोड़ दिया,
जो रोटी छुपके खाती रिश्ता तोड़ दिया।
ये वही चेहरा जिसने अंधेरों को हराया है,
ये कहती—”तू उठ, तेरा भी वक्त आया है।”
(संदर्भ – मप्र की आईएएस सविता प्रधान की कहानी)
रचयिता:
✍️ संजय एम तराणेकर
(कवि, लेखक व समीक्षक)
इन्दौर-452011 (मध्य प्रदेश)
फोटो ai निर्मित नई दिल्ली (राष्ट्र की परम्परा डेस्क)। अंकिता भंडारी हत्याकांड में कथित ‘वीआईपी’…
भारत की संस्कृति का दुनिया में बज रहा डंका! पीएम मोदी ने बताया कैसे संगीत,…
दुकान के अंदर खूनी वारदात! 32 वर्षीय वसीम की गोली मारकर हत्या, हमलावरों की तलाश…
नोएडा से दिल्ली जाने वालों के लिए बड़ी खबर! रविवार सुबह 3:30 बजे से दौड़ेगी…
15 अक्टूबर का इतिहास: जानिए आज के दिन की प्रमुख घटनाएं, महान व्यक्तित्वों के जन्म…
आज का राशिफल 15 अक्टूबर 2026: सौभाग्य योग में किस राशि की चमकेगी किस्मत? जानें…