परिचय
अपने ही देश में बेघर दर्द झेलना और शरणार्थी जैसा जीवन जीना आज की सबसे बड़ी विडंबना बनता जा रहा है। प्रस्तुत विडंबना कविता समाज के उस सच को सामने लाती है, जहां अन्याय और भय आम आदमी की ज़िंदगी को प्रभावित कर रहे हैं।
✍️ अपनी बात कहना कोई गुनाह नहीं,
मैं भी यह “गुनाह” करता हूँ।
जब अन्याय की आँधी उठती है,
मैं बहती हवाओं को शब्द देता हूँ।
मैं उन तूफानों का सच लिखता हूँ,
जो अन्याय की कहानी कहते हैं,
जब बेबस लोगों के आशियाने उजड़ते हैं,
और उन्हें अपने ही घर से बेघर करते हैं।
मैं भी उन्हीं में से एक हूँ,
जो बेघर होने का दर्द समझता है,
इसी डर और सच्चाई के बीच,
हर पीड़ा को शब्दों में बुनता है।
विडंबना नहीं तो और क्या है—
कि अपने ही देश में हम,
शरणार्थी सा जीवन जीते हैं,
और जरूरत में अपनों का मुंह ताकते हैं।
अन्याय की उस बेकाबू आँधी ने,
सैनिकों तक को नहीं बख्शा,
जिस त्रासदी से जूझ रहा हूँ मैं,
उस हर षड्यंत्र को लिखा।
यह पीड़ा, यह त्रासदी,
हमें भीतर तक जकड़ चुकी है,
जो बचे हैं, वे भी आज
त्राहि माम, पाहि माम पुकारते हैं।
इतनी कठोरता इस धरा पर,
मानवता को शर्मिंदा करती है,
और इंसानियत का हर सवाल,
हमसे जवाब मांगता है।
शहीदों की चिताओं पर
राजनीति का लेप न लगाओ,
अगर दिल में इंसानियत है,
तो उसे कर्मों में दिखलाओ।
✍️ डा० कर्नल आदिशंकर मिश्र ‘आदित्य’
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