सच है, सत्य मानो जैसे पाताल में खो गया हो,
अब तो झूठ ही जगत पर छाया हुआ प्रतीत होता है।
पुरानी कहावत भी आज सच लगती है—
“दो टके की पगड़ी, छ: टके में बिक जाती है।”
ढलते सूरज की तरह ही यह जीवन सफ़र है,
धीरे-धीरे संध्या की ओर बढ़ता हुआ।
उम्र की यह शाम संकेत देती है—
कि कहीं न कहीं एक और घर हमारा इंतज़ार कर रहा है।
जब मंज़िल का बुलावा आएगा,
तो उन राहों पर चलना ही पड़ेगा।
किस पल सांसों की डोर थम जाए,
और आत्मा परमात्मा से जा मिले—कहना कठिन है।
जन्म लिया है तो मृत्यु निश्चित है,
जीवन नश्वर है, मृत्यु ही अंतिम सत्य है।
यह शरीर क्षणभंगुर है, पर आत्मा अमर है,
ईश्वर का अंश—यह जीव सदा अविनाशी है।
लोग हमें जानते तो बहुत होंगे,
पर समझने वाले कम ही मिलते हैं।
समझदारी और सूझ-बूझ से ही
जीवन का क्रम आगे बढ़ाना पड़ता है।
— डॉ. कर्नल आदिशंकर मिश्र ‘आदित्य’
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