
लोकतंत्र एक ‘नारा’ नहीं, जनता का परम अधिकार है
सत्ता का अहंकार और जनता की ताकत पर
कवि संजय एम. तराणेकर की बेबाक कविता
लोकतंत्र, सत्ता और जन-अधिकार
कभी व्यवस्था पर प्रश्न उठाते,
कभी संविधान की बात सुनाते।
लेकिन जब ‘अवसर’ मिलता है,
वे तभी वादों को भूल भी जाते।
अब सत्ता पक्ष को भी ध्यान रहे,
अहंकार की कोई सीमा होती है।
जनता जब कभी करवट लेती है,
तब हर एक कुर्सी हिलती रहती है।
लोकतंत्र केवल एक ‘नारा’ नहीं,
ये जनता का परम अधिकार है।
वह सत्ताधारी हो या विपक्ष यहाँ,
इन सभी का एक ही आधार है।
रोटी जले तो तुरंत ‘आँच’ बदलो,
नहीं है चूल्हा बदलने की जरूरत।
भोली-भाली जनता को सपने नहीं,
काम व विकास दिखाओ झटपट।
क्योंकि लोकतंत्र में आखिरकार,
जन-जन की ही होती सरकार है।
कुर्सी आती-जाती रहती हर बार,
यहाँ जनता ही असली दरबार है!
रचनाकार का परिचय
संजय एम. तराणेकर
कवि, लेखक एवं समीक्षक
इन्दौर-452011, मध्य प्रदेश
कविता का संदेश: लोकतंत्र में सत्ता स्थायी नहीं होती। जनता ही सर्वोपरि है और जनप्रतिनिधियों का वास्तविक दायित्व वादों से आगे बढ़कर जनहित, विकास और जवाबदेही सुनिश्चित करना है।
