पैराशूट और दिशा नियंत्रण ने बढ़ाई विशेषज्ञों की चिंता!

इन-स्पेस नारायणी रॉकेट्री कप 2026 में छात्र टीमों की तकनीक की हुई कड़ी परीक्षा, इसरो-डीआरडीओ के विशेषज्ञों ने डिजाइन से लेकर सुरक्षित लैंडिंग तक परखी इंजीनियरिंग की ताकत

कुशीनगर (राष्ट्र की परम्परा)। रॉकेट का लॉन्च होना ही सफलता नहीं, बल्कि उसका सुरक्षित लौटना और तय लक्ष्य तक पहुंचना भी बड़ी चुनौती है। कुशीनगर में आयोजित इन-स्पेस नारायणी रॉकेट्री कप 2026 में छात्र टीमों को इसी कठिन कसौटी पर परखा गया। कहीं पैराशूट की विश्वसनीयता सवालों के घेरे में रही, तो कहीं रॉकेट और कैनसैट की दिशा नियंत्रित करने की तकनीक में सुधार की गुंजाइश दिखाई दी। विशेषज्ञों ने स्पष्ट किया कि अंतरिक्ष विज्ञान में केवल शानदार उड़ान नहीं, बल्कि डिजाइन, परीक्षण, नियंत्रण और सुरक्षित रिकवरी की पूरी प्रक्रिया मायने रखती है।
प्रतियोगिता में विद्यार्थियों द्वारा तैयार रॉकेट और कैनसैट का मूल्यांकन डिजाइन, निर्माण, तकनीकी नवाचार, इलेक्ट्रॉनिक प्रणालियों, लॉन्च प्रदर्शन और रिकवरी सहित कई स्तरों पर किया गया। मूल्यांकन समितियों में भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो), रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ), इन-स्पेस, राष्ट्रीय एयरोस्पेस प्रयोगशालाओं (एनएएल) और उद्योग जगत के विशेषज्ञ शामिल रहे।

पैराशूट खुलने से लेकर सुरक्षित वापसी तक पर नजर

मॉडल रॉकेट्री मूल्यांकन समिति के सदस्य और थ्रस्ट टेक इंडिया के विशेषज्ञ अद्वैत ने विद्यार्थियों के प्रयासों की सराहना करते हुए बताया कि टीमों ने रॉकेट निर्माण में कंपोजिट मटेरियल और उन्नत फाइबर जैसी तकनीकों में दिलचस्पी दिखाई। हालांकि, पैराशूट का सही समय पर खुलना और हर परिस्थिति में भरोसेमंद तरीके से काम करना अभी भी महत्वपूर्ण चुनौती है। इसके लिए अलग-अलग परिस्थितियों में जमीन पर पर्याप्त परीक्षण करना जरूरी है, ताकि उड़ान के दौरान किसी तकनीकी चूक की आशंका कम हो सके।
एनएएल-सीएसआईआर के डॉ. पीवी सत्यनारायण मूर्ति ने कहा कि विद्यार्थियों ने पैराशूट और रिकवरी सिस्टम में नए प्रयोग किए हैं। अब उन्हें रॉकेट या कैनसैट की गति और दिशा पर बेहतर नियंत्रण स्थापित करने के साथ निर्धारित लैंडिंग क्षेत्र तक पहुंचने की सटीकता बढ़ाने पर ध्यान देना होगा। विशेषज्ञों से मिलने वाला मार्गदर्शन इन कमियों को दूर करने में मददगार साबित हो सकता है।

सिर्फ लॉन्च नहीं, हर तकनीकी गलती से सीखना जरूरी

कैन-7यूसेट मूल्यांकन समिति के प्रमुख और इसरो के पूर्व एसोसिएट निदेशक डॉ. सुरेंद्र पाल ने बताया कि इस वर्ष अधिक संख्या में लॉन्च संभव हुए। इस दौरान विद्यार्थियों को संरचनात्मक डिजाइन, निर्माण और इलेक्ट्रॉनिक्स से जुड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ा। उन्होंने शिक्षण संस्थानों को सलाह दी कि प्रतियोगिता के अनुभवों, तकनीकी समस्याओं और उनके समाधान का व्यवस्थित दस्तावेजीकरण करें, ताकि भविष्य में आने वाली टीमों को इसका लाभ मिल सके।
मॉडल रॉकेट्री मूल्यांकन समिति के प्रमुख और इसरो के पूर्व एसोसिएट निदेशक रॉय एम. चेरियन ने कहा कि रॉकेट और उपग्रह प्रणालियों में गाइडेंस, संचार और नियंत्रण जैसी जटिल तकनीकों का एक साथ काम करना जरूरी है। विद्यार्थियों ने अपनी प्रतिभा और नए विचारों से संभावनाएं दिखाई हैं। प्रतियोगिता से मिले अनुभव उन्हें डिजाइन और परीक्षण की प्रक्रिया बेहतर बनाने में मदद करेंगे।

असली जीत तकनीक को बेहतर बनाने में

विशेषज्ञों का संदेश साफ रहा कि प्रतियोगिता की उपलब्धि केवल पुरस्कार या सफल लॉन्च तक सीमित नहीं है। पैराशूट की छोटी-सी चूक, दिशा नियंत्रण की कमी या इलेक्ट्रॉनिक प्रणाली की गड़बड़ी भी इंजीनियरिंग के लिए बड़ा सबक बन सकती है। यही अनुभव विद्यार्थियों को भविष्य के वैज्ञानिकों और एयरोस्पेस इंजीनियरों के रूप में आगे बढ़ने का अवसर देते हैं। नारायणी रॉकेट्री कप में छात्र टीमों ने अपनी क्षमता दिखाई, वहीं विशेषज्ञों की सलाह ने अगली उड़ान को अधिक सटीक, सुरक्षित और भरोसेमंद बनाने की राह भी दिखाई।