डिजिटल अर्थव्यवस्था में बढ़ते रोजगार के बीच श्रमिकों को बीमा, स्वास्थ्य सुविधा, मातृत्व लाभ और वृद्धावस्था पेंशन उपलब्ध कराना जरूरी
लेखक: डॉ. सत्यवान सौरभ

AI निर्मित

बदलती अर्थव्यवस्था में रोजगार के स्वरूप तेजी से बदल रहे हैं। डिजिटल तकनीक और इंटरनेट आधारित सेवाओं ने काम करने के पारंपरिक तरीकों को चुनौती दी है। आज कोई व्यक्ति मोबाइल एप के माध्यम से भोजन पहुँचाकर, ऑनलाइन टैक्सी चलाकर, सामान की डिलीवरी करके, घरेलू सेवाएँ उपलब्ध कराकर या स्वतंत्र डिजिटल कार्य करके अपनी आजीविका अर्जित कर सकता है। रोजगार का यह स्वरूप गिग इकोनॉमी कहलाता है और इसमें काम करने वाले लोग गिग वर्कर्स के रूप में पहचाने जाते हैं।
इन श्रमिकों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे अपनी सुविधा और उपलब्धता के अनुसार काम चुन सकते हैं, लेकिन इस लचीलेपन के साथ उनकी आजीविका में असुरक्षा भी जुड़ी हुई है। नियमित कर्मचारियों की तरह उन्हें वेतन, भविष्य निधि, पेंशन, चिकित्सा सुविधा और सवेतन अवकाश जैसी सुविधाएँ सामान्यतः उपलब्ध नहीं होतीं। इसलिए गिग वर्कर्स के लिए सामाजिक सुरक्षा अब केवल श्रम कल्याण का विषय नहीं, बल्कि समावेशी विकास और आर्थिक न्याय की अनिवार्य शर्त बन गई है।
भारत में तेजी से बढ़ रही गिग इकोनॉमी
भारत में डिजिटल अर्थव्यवस्था के विस्तार ने गिग रोजगार को नई गति दी है। नीति आयोग की रिपोर्ट के अनुसार, देश में गिग वर्कर्स की संख्या वर्ष 2029-30 तक लगभग 2.35 करोड़ होने का अनुमान है। यह संख्या बताती है कि आने वाले समय में रोजगार का यह क्षेत्र भारतीय अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा बनने वाला है।
भोजन की आपूर्ति, परिवहन, ई-कॉमर्स, घरेलू सेवाओं और विभिन्न डिजिटल मंचों पर काम करने वाले लाखों लोग शहरों की आर्थिक गतिविधियों को गति दे रहे हैं। इसके बावजूद उनकी सामाजिक और आर्थिक स्थिति अपेक्षाकृत कमजोर बनी हुई है। एक डिलीवरी कर्मी सड़क दुर्घटना का शिकार हो जाए तो उसकी आमदनी तत्काल बंद हो सकती है। बीमारी के कारण कई दिन काम न कर पाने पर परिवार का खर्च चलाना कठिन हो जाता है। महिलाओं के सामने मातृत्व अवकाश और आय की निरंतरता जैसी चुनौतियाँ हैं। वृद्धावस्था में नियमित पेंशन का अभाव उनकी चिंता को और बढ़ा देता है।
सामाजिक सुरक्षा क्यों है जरूरी?
सामाजिक सुरक्षा का मूल उद्देश्य श्रमिकों को जीवन की अनिश्चित परिस्थितियों में आर्थिक सहारा देना है। गिग वर्कर्स के संदर्भ में इसका महत्व और अधिक बढ़ जाता है, क्योंकि उनकी आय काम की उपलब्धता, ग्राहकों की माँग, मौसम, मंचों की नीतियों और प्रोत्साहन योजनाओं पर निर्भर करती है।
कई बार मंचों द्वारा भुगतान की दरों में बदलाव या प्रोत्साहन राशि में कटौती से उनकी वास्तविक आय प्रभावित होती है। ऐसे में दुर्घटना बीमा, जीवन बीमा, स्वास्थ्य सुरक्षा, मातृत्व लाभ और वृद्धावस्था पेंशन जैसी सुविधाएँ उन्हें आर्थिक संकट से बचा सकती हैं। सामाजिक सुरक्षा का लाभ केवल श्रमिक तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उसके पूरे परिवार को सुरक्षा प्रदान करता है। इससे गरीबी, असमानता और आर्थिक अस्थिरता को कम करने में भी सहायता मिलती है।
सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020 की भूमिका
इसी आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020 में गिग वर्कर्स और प्लेटफॉर्म वर्कर्स को अलग श्रेणी के रूप में मान्यता दी गई है। इस संहिता के अंतर्गत उनके लिए सामाजिक सुरक्षा योजनाएँ बनाने और लागू करने का प्रावधान किया गया है। राष्ट्रीय सामाजिक सुरक्षा बोर्ड जैसी संस्थागत व्यवस्थाओं का उद्देश्य श्रमिकों, एग्रीगेटर्स और सरकार के बीच समन्वय स्थापित करना तथा कल्याणकारी योजनाओं की दिशा तय करना है।
22 सदस्यीय राष्ट्रीय सामाजिक सुरक्षा बोर्ड में विभिन्न हितधारकों की भागीदारी का प्रावधान इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। ऐसे बोर्ड केवल योजनाओं की अनुशंसा करने वाली संस्थाएँ न बनें, बल्कि श्रमिकों की वास्तविक समस्याओं को समझकर उनके समाधान का प्रभावी माध्यम बनें, यह सुनिश्चित करना आवश्यक है।
सामाजिक सुरक्षा बोर्डों की जिम्मेदारी महत्वपूर्ण
इन बोर्डों की भूमिका कई स्तरों पर महत्वपूर्ण है। पहला, वे सामाजिक सुरक्षा योजनाओं के निर्माण और उनकी प्राथमिकताओं के निर्धारण में योगदान दे सकते हैं। दूसरा, वे जीवन बीमा, दुर्घटना बीमा, दिव्यांगता सहायता, मातृत्व लाभ और वृद्धावस्था सुरक्षा जैसी सुविधाओं के विस्तार की निगरानी कर सकते हैं।
तीसरा, योजनाओं पर होने वाले व्यय और उनके क्रियान्वयन की समीक्षा करके जवाबदेही सुनिश्चित कर सकते हैं। चौथा, वे यह व्यवस्था विकसित करने में मदद कर सकते हैं कि किसी श्रमिक को एक डिजिटल मंच से दूसरे मंच पर जाने या एक राज्य से दूसरे राज्य में काम करने पर उसके सामाजिक सुरक्षा लाभ समाप्त न हों।
ई-श्रम पोर्टल से मिल सकती है मदद
ई-श्रम पोर्टल इस दिशा में एक महत्वपूर्ण माध्यम बन सकता है। आधार से जुड़ा पंजीकरण श्रमिकों की पहचान और उनके कल्याणकारी लाभों की उपलब्धता को सुगम बना सकता है। हालांकि, केवल पंजीकरण कर देना पर्याप्त नहीं है। वास्तविक सफलता तब होगी, जब पंजीकृत श्रमिक को समय पर दुर्घटना सहायता, बीमा, स्वास्थ्य सेवाओं और अन्य निर्धारित लाभों का भुगतान भी मिले। इसके लिए डिजिटल व्यवस्था को सरल, पारदर्शी और श्रमिकों के अनुकूल बनाना होगा।
रोजगार संबंधों की अस्पष्टता सबसे बड़ी चुनौती
हालाँकि, इस व्यवस्था के सामने कई गंभीर चुनौतियाँ हैं। सबसे बड़ी समस्या रोजगार संबंधों की अस्पष्टता है। गिग वर्कर्स को अक्सर स्वतंत्र साझेदार या सेवा प्रदाता माना जाता है, जबकि उनके काम की शर्तें, भुगतान, कार्य आवंटन और प्रदर्शन का मूल्यांकन डिजिटल मंचों द्वारा नियंत्रित किया जाता है। ऐसे में यह तय करना कठिन हो जाता है कि सामाजिक सुरक्षा की जिम्मेदारी किसकी है।
दूसरी समस्या योजनाओं और वास्तविक लाभों के बीच अंतर है। कई श्रमिकों को योजनाओं की जानकारी नहीं होती, तो कुछ के लिए पंजीकरण और दावा प्रक्रिया जटिल होती है। तीसरी चुनौती श्रमिकों के प्रतिनिधित्व की है। यदि नीतिगत निर्णयों में उनकी वास्तविक भागीदारी नहीं होगी, तो योजनाएँ जमीनी जरूरतों के अनुरूप नहीं बन पाएँगी।
एग्रीगेटर्स के योगदान में पारदर्शिता जरूरी
वित्तीय संसाधनों की उपलब्धता भी एक बड़ा प्रश्न है। सामाजिक सुरक्षा संहिता में एग्रीगेटर्स के योगदान का प्रावधान किया गया है। इसके अंतर्गत उनके वार्षिक कारोबार के एक से दो प्रतिशत तक योगदान की व्यवस्था निर्धारित की गई है, जो श्रमिकों को किए गए भुगतान की कुल राशि के पाँच प्रतिशत से अधिक नहीं हो सकती। इस व्यवस्था का उद्देश्य सामाजिक सुरक्षा के लिए स्थायी वित्तीय आधार तैयार करना है।
लेकिन योगदान की गणना, संग्रह और उपयोग में पारदर्शिता आवश्यक है। यह भी सुनिश्चित करना होगा कि इसका आर्थिक बोझ किसी अप्रत्यक्ष तरीके से श्रमिकों की आय पर न डाला जाए।
गिग वर्कर्स की सुरक्षा के लिए क्या हो आगे की राह?
आगे की राह स्पष्ट है। केंद्र और राज्य सरकारों को मिलकर सामाजिक सुरक्षा योजनाओं का प्रभावी क्रियान्वयन सुनिश्चित करना होगा। प्रत्येक गिग वर्कर का सरल पंजीकरण, विभिन्न मंचों पर पोर्टेबल लाभ, नियमित सामाजिक सुरक्षा अंकेक्षण और शिकायत निवारण की प्रभावी व्यवस्था विकसित करनी होगी।
महिला श्रमिकों की विशेष आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए मातृत्व सहायता और सुरक्षित कार्य परिस्थितियों पर विशेष ध्यान देना चाहिए। साथ ही, सामाजिक सुरक्षा बोर्डों में श्रमिक प्रतिनिधियों की वास्तविक और पर्याप्त भागीदारी सुनिश्चित की जानी चाहिए।
आर्थिक विकास के साथ श्रमिकों का सम्मान भी जरूरी
गिग इकोनॉमी भारत की नई आर्थिक वास्तविकता है। इसे रोजगार सृजन और उद्यमशीलता के अवसरों के रूप में देखना चाहिए, लेकिन केवल रोजगार के अवसर बढ़ाना पर्याप्त नहीं है। विकास तभी सार्थक होगा, जब उस विकास को गति देने वाले श्रमिकों का जीवन भी सुरक्षित और सम्मानजनक बने।
तकनीक और बाजार की प्रगति का लाभ श्रमिकों तक पहुँचना चाहिए। सामाजिक सुरक्षा बोर्ड इस दिशा में महत्वपूर्ण सेतु बन सकते हैं। आवश्यकता है कि उनकी भूमिका कागजी अनुशंसाओं तक सीमित न रहे, बल्कि योजनाओं का लाभ अंतिम श्रमिक तक पहुँचे।
लचीला रोजगार श्रमिकों की स्वतंत्रता बढ़ा सकता है, लेकिन सामाजिक सुरक्षा के अभाव में यही स्वतंत्रता आर्थिक असुरक्षा में बदल जाती है। इसलिए गिग वर्कर्स को केवल डिजिटल अर्थव्यवस्था का हिस्सा नहीं, बल्कि अधिकारों और सम्मान वाले श्रमिक के रूप में स्वीकार करना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है।
लेखक परिचय: डॉ. सत्यवान सौरभ, पीएचडी (राजनीति विज्ञान),

कवि, सामाजिक विचारक एवं स्तंभकार हैं। वे आकाशवाणी एवं टीवी पैनलिस्ट भी हैं। उनका पता: 333, परी वाटिका, कौशल्या भवन, बड़वा (सिवानी), भिवानी, हरियाणा–127045।