BRICS शिखर सम्मेलन 2026: नई दिल्ली से वैश्विक आर्थिक शक्ति संतुलन की नई पटकथा

दुनिया की आर्थिक और कूटनीतिक व्यवस्था ऐसे दौर से गुजर रही है, जहां किसी राष्ट्र की शक्ति केवल सैन्य क्षमता या सकल घरेलू उत्पाद से तय नहीं होती। पूंजी, तकनीक, ऊर्जा सुरक्षा, डिजिटल इन्फ्रास्ट्रक्चर, विदेशी मुद्रा, सप्लाई चेन, बाजार और वैश्विक संस्थाओं पर प्रभाव—इन सभी का सम्मिलित प्रभाव किसी देश की वास्तविक वैश्विक ताकत निर्धारित करता है। इसी बदलते शक्ति-संतुलन के बीच भारत की 2026 BRICS अध्यक्षता विशेष महत्व रखती है।
भारत ने अपनी अध्यक्षता के लिए “Building for Resilience, Innovation, Cooperation and Sustainability” यानी लचीलेपन, नवाचार, सहयोग और सततता पर आधारित दृष्टिकोण रखा है। विदेश मंत्रालय के अनुसार 2026 में BRICS की 20वीं वर्षगांठ भी महत्वपूर्ण पड़ाव है। भारत ने वर्ष की शुरुआत में अपनी अध्यक्षता का लोगो और थीम जारी करते हुए समावेशिता, संवाद और साझा विकास पर जोर दिया था।
ऐसे में सितंबर में प्रस्तावित नई दिल्ली शिखर बैठक को केवल एक कूटनीतिक आयोजन मानना पर्याप्त नहीं होगा। यह पूरे वर्ष चलने वाली भारतीय BRICS अध्यक्षता के राजनीतिक और रणनीतिक परिणामों को सामने लाने वाला महत्वपूर्ण मंच बन सकती है।
G7 बनाम BRICS का सवाल कितना महत्वपूर्ण?
आज सबसे अधिक चर्चा इस बात की होती है कि क्या BRICS भविष्य में G7 को चुनौती दे सकता है। लेकिन वास्तविक प्रश्न केवल यह नहीं है कि कौन-सा समूह अधिक शक्तिशाली है। असली सवाल यह है कि वैश्विक आर्थिक नियमों, व्यापारिक नेटवर्क, तकनीकी मानकों, ऊर्जा व्यवस्था और विकास की प्राथमिकताओं को प्रभावित करने की क्षमता किसके पास अधिक होगी?
G7 विकसित औद्योगिक अर्थव्यवस्थाओं का प्रभावशाली समूह है। दूसरी ओर BRICS का विस्तार इसे उभरती और विकासशील अर्थव्यवस्थाओं के व्यापक मंच में बदल रहा है। दोनों की प्रकृति, उद्देश्य और संस्थागत संरचना अलग हैं। इसलिए आने वाली दुनिया को केवल “G7 बनाम BRICS” के चश्मे से देखना वास्तविकता को अत्यधिक सरल बना देना होगा।
भारत के लिए बेहतर रणनीति किसी एक समूह को हराने की नहीं, बल्कि दोनों के साथ अपने राष्ट्रीय हितों के अनुरूप संबंधों को संतुलित करने की है।
ग्लोबल साउथ की आवाज और भारत की भूमिका
BRICS की सबसे बड़ी रणनीतिक ताकत उसका Global South dimension है। विकासशील देशों की लंबे समय से मांग रही है कि वैश्विक शासन संस्थाओं में उनकी जनसंख्या, आर्थिक योगदान और विकास संबंधी आवश्यकताओं के अनुरूप प्रतिनिधित्व होना चाहिए।
भारत इसी मुद्दे को BRICS के माध्यम से आगे बढ़ाने की कोशिश कर रहा है। मई 2026 में नई दिल्ली में हुई BRICS विदेश मंत्रियों की बैठक में वैश्विक शासन व्यवस्था में सुधार और बहुपक्षीय प्रणाली पर चर्चा हुई। भारत ने BRICS को अधिक प्रतिनिधित्वपूर्ण और प्रभावी बहुपक्षीय व्यवस्था से जोड़ने पर जोर दिया।
यही भारत की कूटनीतिक विशेषता है। नई दिल्ली BRICS को पश्चिम-विरोधी गठबंधन बनाने के बजाय बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था के एक मंच के रूप में देखना चाहती है।
डिजिटल अर्थव्यवस्था और तकनीक का नया मोर्चा
21वीं सदी की अगली आर्थिक लड़ाई केवल तेल, स्टील और विनिर्माण तक सीमित नहीं रहेगी। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, सेमीकंडक्टर, साइबर सुरक्षा, डिजिटल भुगतान, डिजिटल पब्लिक इन्फ्रास्ट्रक्चर, डेटा और भविष्य की संचार तकनीक वैश्विक शक्ति के नए आधार बन रहे हैं।
यहां भारत के पास महत्वपूर्ण बढ़त है। डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना, स्टार्टअप पारिस्थितिकी, डिजिटल भुगतान और तकनीकी प्रतिभा के अनुभव को BRICS देशों के साथ साझा करके भारत एक नया सहयोग मॉडल प्रस्तुत कर सकता है।
यदि BRICS तकनीकी सहयोग को केवल घोषणाओं से आगे ले जाकर साझा मानकों, डिजिटल कनेक्टिविटी, साइबर सुरक्षा, AI सहयोग और कौशल विकास तक पहुंचा पाता है, तो इसका प्रभाव आर्थिक क्षेत्र से कहीं आगे जा सकता है।
वित्तीय सहयोग और डॉलर की चुनौती
BRICS के सामने दूसरा बड़ा प्रश्न वित्तीय व्यवस्था का है। अंतरराष्ट्रीय व्यापार और वित्त में अमेरिकी डॉलर की भूमिका अभी भी अत्यंत मजबूत है। ऐसे में स्थानीय मुद्राओं में व्यापार, भुगतान प्रणालियों के बेहतर जुड़ाव, विकास वित्त और निवेश सहयोग पर चर्चा स्वाभाविक रूप से महत्वपूर्ण है।
लेकिन यहां सावधानी भी जरूरी है। BRICS के सदस्य देशों की आर्थिक संरचनाएं और राजनीतिक प्राथमिकताएं एक जैसी नहीं हैं। इसलिए किसी वैकल्पिक वैश्विक मुद्रा या डॉलर को तत्काल चुनौती देने जैसे दावों की जगह व्यावहारिक वित्तीय सहयोग पर ध्यान अधिक प्रभावी होगा।
भारत के लिए स्थानीय मुद्रा आधारित व्यापार और बेहतर भुगतान तंत्र का महत्व ऊर्जा आयात, विदेशी मुद्रा प्रबंधन और व्यापार लागत से भी जुड़ता है।
Vision 2047 और भारत का वैश्विक आर्थिक लक्ष्य
भारत यदि 2047 तक विकसित अर्थव्यवस्था बनने का लक्ष्य हासिल करना चाहता है तो घरेलू आर्थिक वृद्धि के साथ वैश्विक आर्थिक नेटवर्क में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाना भी आवश्यक होगा।
भारत को वैश्विक पूंजी आकर्षित करनी होगी, उच्च तकनीक में अपनी क्षमता बढ़ानी होगी, अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था को विस्तारित करना होगा, विदेशी मुद्रा की मजबूती बनाए रखनी होगी और वैश्विक सप्लाई चेन में अपनी भूमिका बढ़ानी होगी।
BRICS इस दिशा में भारत को अतिरिक्त बाजार, निवेश, ऊर्जा सहयोग और कूटनीतिक नेटवर्क उपलब्ध करा सकता है। ऊर्जा सुरक्षा और तकनीकी सहयोग जैसे विषय BRICS एजेंडे में पहले से महत्वपूर्ण रहे हैं।
भारत-चीन और भारत-रूस समीकरण
नई दिल्ली सम्मेलन की सबसे बड़ी कूटनीतिक चुनौतियों में भारत-चीन संबंध भी शामिल होंगे। चीन भारत का महत्वपूर्ण आर्थिक प्रतिस्पर्धी है, लेकिन साथ ही BRICS जैसे मंच पर दोनों देशों को सहयोग भी करना पड़ता है। यही भारत की रणनीतिक स्वायत्तता की परीक्षा है।
रूस के साथ भारत के ऊर्जा, रक्षा, अंतरिक्ष और रणनीतिक संबंध भी BRICS के व्यापक संदर्भ में महत्वपूर्ण हैं। इसलिए भारत को पश्चिमी देशों के साथ तकनीकी और व्यापारिक सहयोग, रूस के साथ रणनीतिक संबंध तथा चीन के साथ प्रतिस्पर्धा और संवाद—तीनों को एक साथ साधना होगा।
यही संतुलन भारत की विदेश नीति को विशिष्ट बनाता है।
नई दिल्ली की मेजबानी भी बनेगी सॉफ्ट पावर का प्रदर्शन
किसी बड़े अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन की सफलता केवल वार्ता कक्ष में लिए गए निर्णयों से नहीं मापी जाती। आयोजन क्षमता, सुरक्षा, यातायात प्रबंधन, डिजिटल व्यवस्था और राजधानी की प्रस्तुति भी देश की सॉफ्ट पावर का हिस्सा होती है।
2023 के G20 के बाद एक बार फिर नई दिल्ली को दुनिया के प्रमुख नेताओं और प्रतिनिधिमंडलों की मेजबानी का अवसर मिलना भारत की आयोजन क्षमता को प्रदर्शित करने का अवसर है।
भारत की असली जीत क्या होगी?
12-13 सितंबर 2026 का प्रस्तावित BRICS शिखर सम्मेलन यह तय करने वाला मुकाबला नहीं है कि G7 जीता या BRICS। इसकी वास्तविक अहमियत इससे कहीं अधिक व्यापक है।
21वीं सदी की वैश्विक व्यवस्था क्या कुछ विकसित शक्तियों के केंद्रीकृत प्रभाव से संचालित होगी या अनेक आर्थिक केंद्रों वाली बहुध्रुवीय व्यवस्था आकार लेगी—यह बड़ा प्रश्न है।
भारत के लिए सबसे महत्वपूर्ण लक्ष्य BRICS को किसी के विरुद्ध खड़ा करना नहीं, बल्कि उसे अपने राष्ट्रीय हितों और Global South की प्राथमिकताओं के लिए प्रभावी मंच बनाना है।
यदि भारत पूंजी, तकनीक, डिजिटल अर्थव्यवस्था, अंतरिक्ष, ऊर्जा, विदेशी मुद्रा, सप्लाई चेन और कूटनीति—इन सभी क्षेत्रों को एक समन्वित रणनीति में बदल पाता है, तो BRICS 2026 की अध्यक्षता केवल एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन की मेजबानी नहीं रह जाएगी।
यह Vision 2047 के लिए भारत की वैश्विक आर्थिक और रणनीतिक नींव मजबूत करने वाली महत्वपूर्ण छलांग बन सकती है।
— एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी
विशेषज्ञ स्तंभकार, साहित्यकार, अंतरराष्ट्रीय लेखक, चिंतक, कवि, संगीत-माध्यम विशेषज्ञ, सीए (एटीसी), एडवोकेट
गोंदिया, महाराष्ट्र