विश्व पोलियो दिवस 2026: एक बूंद से जिंदगी सुरक्षित! पोलियो मुक्त दुनिया का सपना कब होगा पूरा?

विशेष रिपोर्ट: डाक्टर गिरिजेश मिश्र

24 अक्टूबर | विश्व पोलियो दिवस विशेष

किसी बच्चे के चेहरे पर खिलती मुस्कान, उसके कदमों में दौड़ने की आजादी और सपनों को पूरा करने का हौसला—ये किसी भी समाज की सबसे बड़ी पूंजी हैं। लेकिन पोलियो जैसी बीमारी कभी लाखों बच्चों के भविष्य पर सवाल बनकर खड़ी थी। एक ऐसा वायरस, जो जिंदगी भर के लिए किसी बच्चे के हाथ-पैरों को कमजोर या लकवाग्रस्त कर सकता है। आज विज्ञान, टीकाकरण और दुनिया भर के साझा प्रयासों ने इस बीमारी के खिलाफ ऐतिहासिक सफलता हासिल की है। फिर भी जंग पूरी तरह खत्म नहीं हुई है।
इसी संकल्प को मजबूत करने के लिए हर साल 24 अक्टूबर को विश्व पोलियो दिवस मनाया जाता है। यह दिन केवल एक बीमारी के प्रति जागरूकता फैलाने का अवसर नहीं, बल्कि हर बच्चे को पोलियो से सुरक्षित रखने की सामूहिक जिम्मेदारी याद दिलाने का दिन भी है।
आखिर 24 अक्टूबर को ही क्यों मनाया जाता है विश्व पोलियो दिवस?
विश्व पोलियो दिवस की शुरुआत रोटरी इंटरनेशनल ने पोलियो वैक्सीन विकसित करने वाली पहली टीम का नेतृत्व करने वाले अमेरिकी चिकित्सक एवं वैज्ञानिक डॉ. जोनास साल्क के जन्मदिवस के सम्मान में की थी। उनका जन्म 28 अक्टूबर 1914 को हुआ था। बाद में 24 अक्टूबर को इस वैश्विक जागरूकता दिवस के रूप में निर्धारित किया गया।
इस दिवस का उद्देश्य पोलियो उन्मूलन के लिए किए जा रहे प्रयासों को गति देना, टीकाकरण के प्रति जागरूकता बढ़ाना और दुनिया के प्रत्येक बच्चे तक सुरक्षा पहुंचाना है। रोटरी इंटरनेशनल, विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO), यूनिसेफ और अन्य सहयोगी संस्थाएं इस अभियान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती रही हैं।
पोलियो क्या है और बच्चों के लिए कितना खतरनाक है?
पोलियोमाइलाइटिस एक संक्रामक बीमारी है, जो पोलियोवायरस के कारण होती है। यह मुख्य रूप से छोटे बच्चों को प्रभावित करती है, हालांकि किसी भी उम्र का बिना टीकाकरण वाला व्यक्ति इसकी चपेट में आ सकता है। वायरस शरीर में प्रवेश करने के बाद तंत्रिका तंत्र को नुकसान पहुंचा सकता है। गंभीर मामलों में इससे स्थायी लकवा हो सकता है और सांस लेने वाली मांसपेशियां प्रभावित होने पर जान का खतरा भी पैदा हो सकता है।
इस बीमारी की सबसे चिंताजनक बात यह है कि संक्रमित व्यक्ति में शुरुआत में स्पष्ट लक्षण दिखाई नहीं दे सकते, फिर भी वायरस का प्रसार हो सकता है। पोलियो का कोई विशिष्ट इलाज नहीं है, लेकिन सुरक्षित और प्रभावी टीकाकरण से इसे रोका जा सकता है।
यही कारण है कि पोलियो के खिलाफ लड़ाई में सावधानी, जागरूकता और समय पर टीकाकरण सबसे बड़े हथियार हैं।
दो वैज्ञानिकों के प्रयासों ने बदल दी दुनिया की तस्वीर
पोलियो के खिलाफ लड़ाई में डॉ. जोनास साल्क और डॉ. अल्बर्ट सबिन का योगदान ऐतिहासिक रहा है। साल्क ने निष्क्रिय पोलियो वैक्सीन विकसित की, जिसका व्यापक उपयोग 1950 के दशक में शुरू हुआ। इसके बाद डॉ. अल्बर्ट सबिन ने मौखिक पोलियो वैक्सीन विकसित की, जिसे मुंह के जरिए दिया जा सकता है।
इन टीकों ने पोलियो की रोकथाम को बड़े पैमाने पर संभव बनाया। आगे चलकर नियमित टीकाकरण और व्यापक जन-जागरूकता अभियानों ने इस बीमारी के प्रसार को कम करने में अहम भूमिका निभाई।
वर्ष 1988 में वैश्विक पोलियो उन्मूलन पहल (Global Polio Eradication Initiative—GPEI) शुरू की गई। विश्व स्वास्थ्य संगठन, रोटरी इंटरनेशनल, यूनिसेफ और अन्य साझेदारों के सहयोग से चल रहे इस अभियान का लक्ष्य दुनिया को पोलियो से पूरी तरह मुक्त करना है।
इस वैश्विक प्रयास के परिणामस्वरूप जंगली पोलियोवायरस के मामलों में 1988 के मुकाबले 99 प्रतिशत से अधिक की कमी आई है। यह सार्वजनिक स्वास्थ्य के इतिहास की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक है।
भारत की ऐतिहासिक जीत, लेकिन सतर्कता अब भी जरूरी
भारत में पोलियो उन्मूलन अभियान ने एक समय पर असंभव माने जाने वाले लक्ष्य को हासिल किया। देश में अंतिम बार जंगली पोलियोवायरस का मामला जनवरी 2011 में सामने आया था। इसके बाद विश्व स्वास्थ्य संगठन के दक्षिण-पूर्व एशिया क्षेत्र के अंतर्गत भारत को 2014 में पोलियो-मुक्त प्रमाणित किया गया।
इस सफलता के पीछे सरकार, स्वास्थ्यकर्मियों, आशा कार्यकर्ताओं, आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं, स्वयंसेवकों और अभिभावकों की वर्षों की मेहनत रही। घर-घर जाकर बच्चों को पोलियो की खुराक पिलाना, नियमित टीकाकरण सुनिश्चित करना और दूरदराज के इलाकों तक पहुंचना इस अभियान की महत्वपूर्ण कड़ियां थीं।
हालांकि, पोलियो-मुक्त प्रमाणन का अर्थ यह नहीं है कि खतरा हमेशा के लिए समाप्त हो गया। जब तक दुनिया के किसी भी हिस्से में पोलियोवायरस मौजूद है, तब तक इसके दोबारा फैलने का जोखिम बना रह सकता है। इसलिए भारत में भी निगरानी, नियमित टीकाकरण और पल्स पोलियो अभियान की आवश्यकता बनी हुई है।
पोलियो मुक्त दुनिया के लिए आम नागरिक क्या करें?
पोलियो उन्मूलन केवल सरकार या स्वास्थ्य विभाग की जिम्मेदारी नहीं है। इसमें प्रत्येक परिवार और नागरिक की भागीदारी जरूरी है।
हर बच्चे का टीकाकरण कराएं: स्वास्थ्य विभाग के निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार बच्चे को पोलियो की सभी आवश्यक खुराक दिलाएं।
पल्स पोलियो अभियान में सहयोग करें: अभियान के दौरान पात्र बच्चों को निर्धारित दिशा-निर्देशों के अनुसार पोलियो की खुराक जरूर पिलाएं।
अफवाहों से बचें: टीकाकरण के बारे में किसी भी भ्रम या गलत जानकारी पर भरोसा करने के बजाय डॉक्टर या स्वास्थ्यकर्मी से सलाह लें।
स्वच्छता का ध्यान रखें: साफ पानी, स्वच्छ भोजन और हाथ धोने जैसी आदतें संक्रमण के प्रसार को कम करने में सहायक हैं।
दूसरों को जागरूक करें: परिवार, पड़ोस और समुदाय में टीकाकरण का महत्व समझाएं, ताकि कोई भी बच्चा सुरक्षा से वंचित न रहे।
ध्यान रहे, पोलियो की खुराक बच्चे को पहले दी जा चुकी हो, तब भी स्वास्थ्य विभाग के निर्देशों के अनुसार अभियान की खुराक दिलाना महत्वपूर्ण हो सकता है।
2026 में विश्व पोलियो दिवस का सबसे बड़ा संदेश
आज दुनिया ने पोलियो के खिलाफ लंबा सफर तय किया है। जिस बीमारी से बचाव कभी बड़ी चुनौती था, उसे टीकाकरण के बल पर लगभग समाप्ति के करीब पहुंचा दिया गया है। लेकिन अंतिम चरण अक्सर सबसे कठिन होता है। जब मामले बहुत कम रह जाते हैं, तब भी हर बच्चे तक टीका पहुंचाना, वायरस की निगरानी करना और किसी भी संभावित संक्रमण पर तुरंत कार्रवाई करना जरूरी रहता है।
विश्व पोलियो दिवस हमें याद दिलाता है कि स्वास्थ्य के क्षेत्र में हासिल की गई उपलब्धियों को बनाए रखने के लिए निरंतर प्रयास आवश्यक हैं। एक भी बच्चा टीकाकरण से छूटता है, तो पूरी दुनिया का पोलियो उन्मूलन का लक्ष्य प्रभावित हो सकता है।
निष्कर्ष: हर बच्चे की सुरक्षा, हम सबकी जिम्मेदारी
विश्व पोलियो दिवस का संदेश स्पष्ट है—पोलियो को इतिहास का हिस्सा बनाने के लिए हमें अपनी जिम्मेदारी निभाते रहना होगा। विज्ञान ने टीका दिया, स्वास्थ्यकर्मियों ने घर-घर पहुंचकर अभियान चलाया और समाज ने सहयोग करके इस लड़ाई को मजबूती दी। अब जरूरत है कि यह संकल्प कमजोर न पड़े।
आइए, इस विश्व पोलियो दिवस पर हम प्रण लें कि किसी भी बच्चे को टीकाकरण से वंचित नहीं रहने देंगे। क्योंकि पोलियो मुक्त दुनिया केवल एक वैश्विक लक्ष्य नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को स्वस्थ, सुरक्षित और आत्मनिर्भर भविष्य देने का वादा है।
एक बूंद सुरक्षा की, हर बच्चे के बेहतर भविष्य की।
लेखक: डाक्टर गिरिजेश मिश्र

You missed