31 दिसंबर 2029 तक नशामुक्त भारत का लक्ष्य; NDPS एक्ट, PIT-NDPS कानून और PMLA के प्रभावी इस्तेमाल से तस्करी के नेटवर्क पर वार की उम्मीद

क्या जवाबदेही और जनभागीदारी से सुरक्षित होगा देश का भविष्य?

लेखक: एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी, गोंदिया, महाराष्ट्र



गोंदिया (महाराष्ट्र)। भारत में नशे की समस्या अब केवल कानून-व्यवस्था या स्वास्थ्य तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि यह देश की युवा पीढ़ी के भविष्य, परिवारों की खुशहाली, आर्थिक उत्पादकता, आंतरिक सुरक्षा और राष्ट्रीय विकास से जुड़ी गंभीर चुनौती बन चुकी है। मादक पदार्थों का अवैध कारोबार समाज की जड़ों को कमजोर करता है, संगठित अपराध को आर्थिक ताकत देता है और कुछ मामलों में आतंकवाद तथा अन्य राष्ट्रविरोधी गतिविधियों की फंडिंग का माध्यम भी बन सकता है। ऐसे में नशामुक्त भारत का लक्ष्य केवल सरकारी घोषणा नहीं, बल्कि शासन-प्रशासन, पुलिस, न्यायपालिका, स्वास्थ्य तंत्र और समाज की सामूहिक परीक्षा है।
21 अक्टूबर 2026 को नई दिल्ली स्थित राष्ट्रीय पुलिस स्मारक पर पुलिस स्मृति दिवस के अवसर पर केंद्रीय गृह मंत्री ने 31 दिसंबर 2029 तक भारत को नशामुक्त बनाने के लक्ष्य को लेकर देशभर के पुलिस बलों से मिलकर काम करने का आह्वान किया। उन्होंने मादक पदार्थों के सेवन को भावी पीढ़ियों के लिए खतरा बताते हुए इस बात पर जोर दिया कि नशे का अवैध कारोबार राष्ट्रविरोधी गतिविधियों में शामिल संगठनों को वित्तीय सहायता भी पहुंचा सकता है।
इस संकल्प के बीच सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या भारत निर्धारित समयसीमा तक नशे के अवैध कारोबार पर ऐसा निर्णायक प्रहार कर पाएगा, जिससे आने वाली पीढ़ियों को सुरक्षित भविष्य मिल सके? क्या पुलिस थानों से लेकर केंद्रीय जांच एजेंसियों तक जवाबदेही सुनिश्चित करके नशे की पूरी आपूर्ति शृंखला को तोड़ा जा सकता है? और क्या नशे की मांग, लत तथा पुनर्वास की समस्या का समाधान किए बिना वास्तविक नशामुक्ति संभव है? इन सवालों के जवाब ही इस महाअभियान की वास्तविक सफलता तय करेंगे।
पुलिस स्मृति दिवस से राष्ट्रीय संकल्प तक: 31 दिसंबर 2029 की समयसीमा क्यों अहम?
21 अक्टूबर 2026 को राष्ट्रीय पुलिस स्मारक पर पुलिस स्मृति दिवस के अवसर पर केंद्रीय गृह मंत्री ने देशभर के पुलिस बलों से नशे के विरुद्ध एकजुट होकर काम करने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि मादक पदार्थों का दुरुपयोग भावी पीढ़ियों को खोखला करता है, अर्थव्यवस्था पर अनावश्यक बोझ डालता है और राष्ट्रविरोधी गतिविधियों में शामिल संगठनों को आर्थिक सहायता पहुंचा सकता है।
सरकार ने देश को नशे की समस्या से मुक्त करने के लिए 31 दिसंबर 2029 की समयसीमा निर्धारित की है। शेष 2026 के साथ 2027, 2028 और 2029 को इस लड़ाई के लिए समर्पित करने का संदेश पुलिस व्यवस्था के हर स्तर तक पहुंचता है।
पुलिस स्मृति दिवस उन पुलिसकर्मियों के बलिदान को याद करने का अवसर है, जिन्होंने देश की सुरक्षा के लिए अपना जीवन समर्पित किया। इसी मंच से नशे के विरुद्ध अभियान को राष्ट्रीय प्राथमिकता बनाना पुलिस बलों के सामने एक बड़ी जिम्मेदारी रखता है।
अब आवश्यकता केवल छापेमारी, गिरफ्तारियों और जब्ती के आंकड़े बढ़ाने की नहीं, बल्कि नशे के कारोबार के पूरे नेटवर्क को तोड़ने, दोषियों को सजा दिलाने और नशे की गिरफ्त में आए लोगों को उपचार तथा पुनर्वास उपलब्ध कराने की है।
इस अभियान की सफलता का आकलन केवल इस आधार पर नहीं होना चाहिए कि कितने मादक पदार्थ पकड़े गए, बल्कि यह भी देखना होगा कि अवैध आपूर्ति कितनी घटी, युवाओं को नशे से बचाने में कितनी सफलता मिली और प्रभावित परिवारों तक कितनी प्रभावी सहायता पहुंची।
पारंपरिक तस्करी से डिजिटल नेटवर्क तक: बदलते अपराध जगत की चुनौती
पहले अवैध मादक पदार्थों का कारोबार मुख्यतः गुप्त संपर्कों, व्यक्तिगत नेटवर्क, सीमावर्ती तस्करी, अवैध भंडारण और स्थानीय वितरकों के माध्यम से संचालित होता था। आज पारंपरिक तरीकों के साथ डिजिटल संचार, ऑनलाइन संपर्क, छद्म पहचान, इंटरनेट आधारित वित्तीय लेनदेन और अंतरराज्यीय नेटवर्क जैसी चुनौतियां भी जुड़ गई हैं।
सोशल मीडिया तथा संदेश भेजने वाले डिजिटल मंचों का दुरुपयोग संपर्क स्थापित करने के लिए किया जा सकता है। डार्कनेट पर अवैध बाजार संचालित हो सकते हैं, जबकि क्रिप्टोकरेंसी सहित डिजिटल वित्तीय लेनदेन की जांच अपराध से जुड़े आर्थिक संबंधों को उजागर करने में मदद कर सकती है।
इसके साथ सिंथेटिक मादक पदार्थों और उनके निर्माण में इस्तेमाल होने वाले रसायनों की निगरानी भी बड़ी चुनौती है। अपराधी अपने तौर-तरीके बदलते रहते हैं। इसलिए जांच एजेंसियों को तकनीकी दक्षता, डिजिटल साक्ष्य, वित्तीय जांच और अंतरराज्यीय तथा अंतरराष्ट्रीय सहयोग को मजबूत करना होगा।
केवल अंतिम विक्रेता को गिरफ्तार कर लेना पर्याप्त नहीं है। अवैध कारोबार के पीछे मौजूद आर्थिक लाभ, आपूर्ति नेटवर्क और संगठित अपराध की कड़ियों तक पहुंचना आवश्यक है। प्रशिक्षित साइबर जांच दल, वैज्ञानिक जांच, वैधानिक निगरानी और एजेंसियों के बीच सूचना साझा करने की प्रभावी व्यवस्था इस लड़ाई में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
हालांकि, डिजिटल तकनीक का उपयोग कानून के दायरे में, नागरिकों की निजता की रक्षा करते हुए और निष्पक्ष जांच के सिद्धांतों के अनुरूप किया जाना चाहिए।
भारत के कानूनी हथियार: NDPS, PIT-NDPS और PMLA की भूमिका
भारत में मादक पदार्थों के अवैध कारोबार पर अंकुश लगाने के लिए पहले से कई महत्वपूर्ण कानून मौजूद हैं। इनमें तीन कानूनों की भूमिका विशेष रूप से महत्वपूर्ण है।

  1. स्वापक औषधि और मनः प्रभावी पदार्थ अधिनियम, 1985 (NDPS Act)
    यह कानून प्रतिबंधित मादक पदार्थों के उत्पादन, कब्जे, बिक्री, खरीद, परिवहन और अन्य संबंधित गतिविधियों को नियंत्रित करता है। अपराध की प्रकृति, संबंधित पदार्थ और उसकी मात्रा के आधार पर कठोर दंड का प्रावधान है।
    वाणिज्यिक मात्रा से जुड़े अनेक गंभीर अपराधों में 10 से 20 वर्ष तक का कठोर कारावास और जुर्माना हो सकता है। कुछ विशिष्ट परिस्थितियों में पूर्व दोषसिद्धि के बाद दोबारा गंभीर अपराध करने पर मृत्युदंड का वैधानिक प्रावधान भी है। हालांकि, यह प्रत्येक नशा तस्करी के मामले में लागू नहीं होता।
  2. PIT-NDPS अधिनियम, 1988
    इस कानून का उद्देश्य अवैध मादक पदार्थों के कारोबार को रोकने के लिए निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के तहत निवारक निरोध की व्यवस्था करना है। इसका इस्तेमाल संबंधित वैधानिक शर्तों और मामले की परिस्थितियों के अनुसार किया जा सकता है।
  3. धनशोधन निवारण अधिनियम, 2002 (PMLA)
    जहां मादक पदार्थों से जुड़े अपराधों से अर्जित धन को वैध बनाने की गतिविधियां कानून के दायरे में आती हैं, वहां धनशोधन निवारण अधिनियम महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। इसके माध्यम से अपराध से अर्जित संपत्ति और धन के स्रोत की जांच की जा सकती है तथा कानून के अनुसार कार्रवाई की जा सकती है।
    इन कानूनों का वास्तविक प्रभाव तभी दिखाई देगा, जब पुलिस, नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो, सीमा सुरक्षा एजेंसियों, औषधि नियंत्रण विभाग और वित्तीय जांच एजेंसियों के बीच बेहतर तालमेल स्थापित हो।
    विशेष अदालतों में मामलों का समयबद्ध निपटारा, गुणवत्तापूर्ण अभियोजन और साक्ष्यों की विश्वसनीयता बढ़ाना भी आवश्यक है। केवल कानून की कठोरता नहीं, बल्कि निष्पक्ष जांच और प्रभावी दोषसिद्धि अपराधियों पर वास्तविक दबाव बनाती है।
    NCORD, NIDAAN और MANAS: समन्वय से जनभागीदारी तक
    नशे के विरुद्ध प्रयासों को प्रभावी बनाने के लिए सरकार ने विभिन्न संस्थागत और डिजिटल व्यवस्थाएं विकसित की हैं।
    NCORD यानी नार्को-कोऑर्डिनेशन सेंटर का उद्देश्य मादक पदार्थों से संबंधित कार्रवाई में विभिन्न एजेंसियों के बीच समन्वय बढ़ाना है।
    NIDAAN पोर्टल का उपयोग मादक पदार्थों से जुड़े अपराधियों की जानकारी साझा करने और जांच एजेंसियों के बीच सूचनात्मक सहयोग बढ़ाने के लिए किया जाता है।
    MANAS हेल्पलाइन 1933 नागरिकों की भागीदारी को प्रोत्साहित करने वाली एक महत्वपूर्ण व्यवस्था है। भारत सरकार के अनुसार, इसे 18 जुलाई 2024 को शुरू किया गया था। इसके माध्यम से नागरिक मादक पदार्थों की तस्करी, अवैध खेती और संबंधित गतिविधियों की सूचना दे सकते हैं। यह मंच परामर्श तथा पुनर्वास संबंधी सहायता तक पहुंच बनाने में भी मदद करता है।
    इन व्यवस्थाओं की उपयोगिता तभी सिद्ध होगी, जब प्राप्त शिकायतों पर समयबद्ध कार्रवाई हो, सूचनादाताओं की गोपनीयता सुरक्षित रहे और संबंधित एजेंसियां आवश्यक जानकारी एक-दूसरे के साथ साझा करें।
    जिलों में नशे की समस्या का नियमित आकलन, संवेदनशील क्षेत्रों की पहचान और कार्रवाई के परिणामों की समीक्षा भी जरूरी है। आम नागरिकों को यह भरोसा होना चाहिए कि नशे के कारोबार की जानकारी देने पर उनकी शिकायत गंभीरता से ली जाएगी।
    क्या छह महीने में समाप्त हो सकता है अवैध नशे का कारोबार?
    यह मानना उचित है कि मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति, ईमानदार पुलिसिंग, केंद्रीय और राज्य एजेंसियों के बेहतर समन्वय तथा भ्रष्टाचार पर प्रभावी कार्रवाई से अवैध आपूर्ति नेटवर्क को काफी हद तक कमजोर किया जा सकता है।
    किसी जिले में संगठित तस्करी के विरुद्ध छह महीने का केंद्रित अभियान महत्वपूर्ण परिणाम दे सकता है। लेकिन पूरे देश में छह महीने के भीतर अवैध कारोबार को पूरी तरह समाप्त कर देना एक बड़ा दावा होगा, जिसके लिए ठोस प्रमाण और वास्तविक परिस्थितियों का आकलन आवश्यक है।
    इसका कारण स्पष्ट है। नशे की समस्या में केवल आपूर्ति नहीं, बल्कि मांग भी शामिल है। जब तक नशे की लत से जूझ रहे लोगों को उपचार, परामर्श, परिवार का सहयोग और पुनर्वास नहीं मिलेगा, तब तक अवैध बाजार दोबारा उभरने का जोखिम बना रहेगा।
    इसलिए रोकथाम, उपचार और कानून का क्रियान्वयन एक-दूसरे के पूरक होने चाहिए। यदि प्रत्येक पुलिस थाने के क्षेत्र में अवैध बिक्री की शिकायतों पर गंभीरता से कार्रवाई हो, संबंधित दवाओं की बिक्री और मेडिकल स्टोरों की नियमानुसार जांच की जाए, युवाओं को जागरूक किया जाए तथा नशे से प्रभावित लोगों को सहायता मिले, तो 2028 तक उल्लेखनीय प्रगति की संभावना मजबूत हो सकती है।
    हालांकि, समयसीमा से पहले पूर्ण सफलता का दावा करने के बजाय पारदर्शी आंकड़ों और स्वतंत्र मूल्यांकन से प्रगति मापना अधिक विश्वसनीय होगा।
    नक्सलवाद के विरुद्ध अभियान का उदाहरण देते हुए गृह मंत्री ने अपने संबोधन में 31 मार्च 2026 तक नक्सलवाद की चुनौती से मुक्ति हासिल करने की बात कही। इस उदाहरण के संदर्भ में भी जरूरी है कि नशामुक्ति अभियान की प्रगति का आकलन स्पष्ट मानकों और सत्यापित परिणामों के आधार पर किया जाए।
    क्या नशामुक्त भारत का लक्ष्य पंजाब चुनाव 2027 से भी जुड़ा है?
    नशामुक्त भारत की समयसीमा का राजनीतिक प्रभाव क्या होगा, विशेषकर पंजाब में 2027 के विधानसभा चुनावों से पहले, यह प्रश्न सार्वजनिक विमर्श का हिस्सा बन सकता है। पंजाब में नशे का मुद्दा लंबे समय से सामाजिक और राजनीतिक बहस का विषय रहा है।
    लेकिन केवल समयसीमा और चुनाव की निकटता के आधार पर यह निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा कि राष्ट्रीय अभियान का उद्देश्य केवल चुनावी लाभ हासिल करना है। इसकी वास्तविक मंशा और प्रभाव का मूल्यांकन ठोस परिणामों से होना चाहिए।
    क्या अवैध कारोबार के बड़े नेटवर्क टूटते हैं? क्या युवाओं तक नशे की पहुंच घटती है? क्या नशे के विरुद्ध आवाज उठाने वाले नागरिकों की सुरक्षा बढ़ती है? क्या दोषियों के विरुद्ध निष्पक्ष कार्रवाई होती है? क्या नशे की लत से प्रभावित लोगों को पर्याप्त उपचार उपलब्ध होता है?
    इन सवालों के जवाब किसी भी राजनीतिक दावे से अधिक महत्वपूर्ण होंगे। लोकतंत्र में सरकार की घोषणाओं पर सवाल उठाना जनता का अधिकार है, लेकिन अंतिम निष्कर्ष तथ्यों, आंकड़ों और जमीन पर दिखाई देने वाले बदलावों के आधार पर ही निकाला जाना चाहिए।
    हर पुलिस थाने की जवाबदेही तय करना क्यों जरूरी?
    नशे के विरुद्ध राष्ट्रीय अभियान की सफलता के लिए पुलिस थानों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है। प्रत्येक थाना क्षेत्र में नशे की अवैध बिक्री, तस्करी के मार्ग, संदिग्ध गतिविधियों और प्रभावित इलाकों का नियमित आकलन किया जाना चाहिए।
    पुलिसकर्मियों की जवाबदेही तय करने का अर्थ केवल गिरफ्तारियों की संख्या बढ़ाना नहीं होना चाहिए। यह भी देखा जाना चाहिए कि शिकायतों पर कितनी तेजी से कार्रवाई हुई, बड़े तस्करों तक जांच पहुंची या नहीं, वित्तीय नेटवर्क की पहचान हुई या नहीं और अभियोजन के लिए पर्याप्त साक्ष्य जुटाए गए या नहीं।
    यदि किसी क्षेत्र में बार-बार नशे की अवैध बिक्री की शिकायतें सामने आती हैं, तो उनकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। जहां भ्रष्टाचार या मिलीभगत के आरोप हों, वहां तथ्यों के आधार पर कार्रवाई जरूरी है।
    साथ ही, नशे की लत से प्रभावित व्यक्तियों को केवल अपराधी के रूप में देखने के बजाय उनकी परिस्थितियों के अनुरूप उपचार और पुनर्वास की व्यवस्था भी सुनिश्चित करनी होगी। इससे पुलिस और समाज के बीच विश्वास बढ़ेगा तथा नशे के कारोबार के विरुद्ध जनभागीदारी मजबूत होगी।
    नशामुक्त भारत के लिए सरकार और समाज को क्या करना होगा?
    31 दिसंबर 2029 के लक्ष्य को प्रभावी बनाने के लिए बहुआयामी रणनीति की आवश्यकता है।
    पुलिस और जांच एजेंसियां: स्थानीय विक्रेताओं से लेकर बड़े तस्करी नेटवर्क तक निष्पक्ष और साक्ष्य-आधारित कार्रवाई करें।
    वित्तीय जांच: अवैध कमाई, संदिग्ध संपत्तियों और धनशोधन की जांच कानून के अनुसार की जाए।
    न्यायिक व्यवस्था: गुणवत्तापूर्ण जांच, मजबूत अभियोजन और समयबद्ध सुनवाई पर ध्यान दिया जाए।
    स्वास्थ्य विभाग: नशे की लत से प्रभावित लोगों के लिए उपचार, परामर्श और पुनर्वास की सुविधाएं बढ़ाई जाएं।
    शैक्षणिक संस्थान: बच्चों और युवाओं में नशे के दुष्परिणामों को लेकर जागरूकता अभियान चलाए जाएं।
    परिवार और नागरिक समाज: प्रभावित लोगों को सहयोग दिया जाए और नशे के अवैध कारोबार के विरुद्ध जिम्मेदार जनभागीदारी बढ़ाई जाए।
    सरकारी जवाबदेही: नियमित आंकड़े जारी हों और अभियान की सफलता का मूल्यांकन केवल जब्ती या गिरफ्तारी के आंकड़ों से नहीं, बल्कि नशे की उपलब्धता में कमी और उपचार की पहुंच जैसे परिणामों से भी किया जाए।
    31 दिसंबर 2029 केवल समयसीमा नहीं, भावी पीढ़ी से किया गया वादा
    भारत के सामने नशामुक्ति का लक्ष्य कठिन अवश्य है, लेकिन इसे असंभव मानकर छोड़ देना भी उचित नहीं होगा। यदि केंद्र सरकार, राज्य सरकारें, पुलिस, जांच एजेंसियां, न्यायपालिका, स्वास्थ्य विभाग, शैक्षणिक संस्थान और नागरिक समाज एक साझा रणनीति के तहत काम करें, तो देश नशे के अवैध कारोबार और उसके सामाजिक दुष्परिणामों को गंभीर रूप से कम कर सकता है।
    इसके लिए पुलिस थानों में जवाबदेही, भ्रष्टाचार के आरोपों की निष्पक्ष जांच, डिजिटल अपराधों की पहचान, अवैध कमाई पर कानूनी कार्रवाई, तेज न्यायिक प्रक्रिया और नशे की लत से प्रभावित लोगों के पुनर्वास को समान महत्व देना होगा। नशे के विरुद्ध आवाज उठाने वाले नागरिकों की सुरक्षा भी इस अभियान का अभिन्न हिस्सा होनी चाहिए।
    भारत की सांस्कृतिक कल्पना में कलियुग से सतयुग की ओर बढ़ने का अर्थ अन्याय, लोभ और बुराइयों पर सदाचार, सेवा और सत्य की विजय है। नशामुक्त भारत का संकल्प भी इसी व्यापक सामाजिक परिवर्तन की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम हो सकता है।
    नशामुक्त भारत केवल सरकार का लक्ष्य नहीं, बल्कि भावी पीढ़ियों के प्रति पूरे राष्ट्र की जिम्मेदारी है। 31 दिसंबर 2029 की समयसीमा तभी सार्थक होगी, जब देश नशे के अवैध कारोबार पर प्रभावी नियंत्रण के साथ-साथ युवाओं को सुरक्षित वातावरण, प्रभावित परिवारों को सहायता और नशे की लत से जूझ रहे लोगों को सम्मानजनक जीवन का अवसर दे सके।
    लेखक परिचय: एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी, विशेषज्ञ स्तंभकार, साहित्यकार, अंतरराष्ट्रीय लेखक, चिंतक, कवि, संगीत माध्यमा एवं सीए (एटीसी), गोंदिया, महाराष्ट्र।