
शिलांग/नई दिल्ली (राष्ट्र की परम्परा डेस्क)। मेघालय की राजनीति में बड़ा बदलाव सामने आया है। यूनाइटेड डेमोक्रेटिक पार्टी (UDP) के आठ विधायकों के भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) में शामिल होने के बाद विधानसभा में भाजपा की संख्या बढ़कर 10 हो गई है। इस घटनाक्रम के साथ भाजपा सदन में नेशनल पीपुल्स पार्टी (NPP) के बाद दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बन गई है।
एक साथ आठ विधायकों का भाजपा में जाना मेघालय की क्षेत्रीय राजनीति में महत्वपूर्ण घटनाक्रम माना जा रहा है। इसका असर केवल विधानसभा के मौजूदा संख्या समीकरण पर ही नहीं, बल्कि 2028 में होने वाले विधानसभा चुनाव की तैयारियों और राजनीतिक गठजोड़ पर भी पड़ सकता है।
क्षेत्रीय अस्मिता के मुद्दों पर भाजपा की नजर
मेघालय की राजनीति में खासी, जैंतिया और गारो समुदायों की क्षेत्रीय पहचान और स्थानीय मुद्दों की अहम भूमिका रहती है। जमीन, स्थानीय रोजगार, भाषा, सांस्कृतिक अधिकार और बाहरी लोगों से जुड़े सवाल लंबे समय से यहां राजनीतिक विमर्श का हिस्सा रहे हैं।
भाजपा में शामिल हुए विधायकों से जुड़े प्रमुख मुद्दों में खासी भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने, कोयला खनन से संबंधित नियमों में बदलाव, मेघालय निवासी सुरक्षा एवं सुरक्षा कानून में संशोधन तथा थेम इव मावलांग स्थित हरिजन कॉलोनी के पुनर्वास जैसे विषय शामिल बताए जा रहे हैं। खासी और गारो भाषाओं की मान्यता तथा स्थानीय हितों की सुरक्षा से जुड़े मुद्दे भी इस राजनीतिक घटनाक्रम में चर्चा में हैं।
इससे संकेत मिलता है कि भाजपा मेघालय में अपने विस्तार के लिए राष्ट्रीय मुद्दों के साथ-साथ स्थानीय और क्षेत्रीय विषयों को भी राजनीतिक रणनीति का हिस्सा बना रही है।
एनपीपी के साथ गठबंधन में बदलेगा समीकरण?
मेघालय में भाजपा पहले से ही एनपीपी के नेतृत्व वाली सरकार की सहयोगी है। मुख्यमंत्री कॉनराड संगमा ने घटनाक्रम के बाद सरकार को स्थिर बताया है। हालांकि, विधानसभा में भाजपा की संख्या दो से बढ़कर 10 होने से गठबंधन के भीतर उसका राजनीतिक प्रभाव पहले की तुलना में बढ़ा है।
फिलहाल भाजपा की ओर से मंत्रिमंडल में अतिरिक्त हिस्सेदारी की मांग सामने नहीं आई है, लेकिन विधायकों की संख्या में हुए इस बड़े बदलाव से भविष्य में सत्ता-साझेदारी और राजनीतिक प्राथमिकताओं को लेकर नए समीकरण बन सकते हैं।
2028 के चुनाव पर पड़ेगा असर
आगामी विधानसभा चुनाव के लिहाज से यह घटनाक्रम भाजपा के लिए महत्वपूर्ण है। आठ विधायकों के साथ आने से पार्टी को विधानसभा में संख्या बढ़ाने के साथ-साथ स्थानीय राजनीतिक चेहरों और क्षेत्रीय स्तर पर संगठन विस्तार का अवसर मिला है।
वहीं, खासी-जैंतिया क्षेत्र में प्रभाव रखने वाली क्षेत्रीय ताकतों की मौजूदगी भाजपा के लिए राजनीतिक चुनौती भी बनी रहेगी। ऐसे में आने वाले समय में भाजपा किस तरह स्थानीय मुद्दों और क्षेत्रीय अस्मिता के सवालों को अपने राजनीतिक एजेंडे में शामिल करती है, यह महत्वपूर्ण होगा।
UDP के सामने संगठन बचाने की चुनौती
आठ विधायकों के भाजपा में चले जाने के बाद UDP की विधानसभा में संख्या घटकर चार रह गई है। ऐसे में पार्टी के सामने अपने क्षेत्रीय राजनीतिक आधार और संगठन को मजबूत बनाए रखने की चुनौती बढ़ गई है।
दूसरी ओर, भाजपा ने एक ही घटनाक्रम में विधानसभा की संख्या, अनुभवी स्थानीय नेताओं और क्षेत्रीय मुद्दों पर अपनी राजनीतिक पहुंच—तीनों को विस्तार दिया है। हालांकि, इन विधायकों के साथ आने को स्थायी जनसमर्थन में बदलना पार्टी के लिए आगे की बड़ी चुनौती होगी।
मेघालय में हुए इस फेरबदल का प्रभाव राज्य की मौजूदा गठबंधन राजनीति से आगे बढ़कर 2028 के चुनावी समीकरणों पर भी दिखाई दे सकता है। आने वाले महीनों में यह स्पष्ट होगा कि भाजपा अपनी बढ़ी हुई विधानसभा संख्या को किस तरह संगठनात्मक विस्तार और व्यापक राजनीतिक आधार में बदलती है।
