सुन कर मन की व्यथा धरा की ,
आकाश को रोना पड़ेगा
एक दिन ऐसा आएगा
जब क्षितिज को खोना पड़ेगा

सूर्य को मनोरोग हुआ है
उसका धूप से वियोग हुआ है
छल करके उजाले से
सदा उसका उपभोग हुआ है

झाड़ लालच के हटाकर
बीज संतोष का बोना पड़ेगा
एक दिन ऐसा आएगा
जब क्षितिज को खोना पड़ेगा

व्यर्थ में जल को बहाना
समतुल्य है रक्तपात के
उत्त्तर कैसे मिलेगें आखिर
इंसानो के कुठाराघात के

अश्रु में लिपटी सरिताओं को
श्रृंगार कर संजोना पड़ेगा
एक दिन ऐसा आएगा
जब क्षितिज को खोना पड़ेगा

रात और दिन की वेदना को
सांझ भी समझने लगी है
बिना चहकती चिड़ियों के
स्वंय से ही कटने लगी है

कलरव के बिखरे गीतों को
संगीत से भिगोना पड़ेगा
एक दिन ऐसा आएगा
जब क्षितिज को खोना पड़ेगा

प्रकृति के संबंधों से
मानव ने विच्छेद किया है
किरण और हवा के
ह्रदय तक में छेद किया है

हो चुकी मैली गंगा ,लेकिन
ये पाप तो धोना ही पड़ेगा
एक दिन ऐसा आएगा
जब क्षितिज को खोना पड़ेगा
विजय गुंजन