क्या सभी जीवनरक्षक दवाओं पर लगेगी मुनाफे की लगाम?
औषधि (मूल्य नियंत्रण) आदेश, 2013 और आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955 की असली परीक्षा; कैंसर के बाद हार्ट स्टेंट, एंटीबायोटिक और दूसरी दवाओं की कीमतों पर भी उठे सवाल

लेखक: एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी, गोंदिया, महाराष्ट्र
गोंदिया (राष्ट्र की परम्परा)। कानून की किताब में नियम, बाजार में कीमतों का खेल और मरीज की जेब पर सबसे बड़ा बोझ—भारत में दवाओं की कीमतों को लेकर यह सवाल लगातार महत्वपूर्ण होता जा रहा है। किसी भी सभ्य समाज में कानून का उद्देश्य केवल व्यवस्था बनाए रखना नहीं, बल्कि नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करना, शोषण रोकना और न्याय सुनिश्चित करना भी होता है। इसके बावजूद जब जीवनरक्षक दवाओं की कीमतें मरीजों और उनके परिवारों के लिए भारी आर्थिक बोझ बन जाती हैं, तो कानून के प्रभावी क्रियान्वयन और मूल्य नियंत्रण की व्यवस्था पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
भारत सहित दुनिया के विभिन्न देशों में आर्थिक गतिविधियों, व्यापार, स्वास्थ्य सेवाओं, औषधि निर्माण और वितरण को नियंत्रित करने के लिए समय-समय पर कानून, नियम, विनियम और अधिनियम बनाए जाते हैं। बदलती परिस्थितियों के अनुसार इनमें संशोधन भी किए जाते हैं, लेकिन इसके बावजूद कानूनी व्यवस्थाओं में ऐसी कमियां रह सकती हैं, जिनका लाभ उठाकर कुछ कारोबारी या संस्थाएं नियमों की सीमाओं के भीतर रहते हुए भी अनुचित आर्थिक लाभ अर्जित कर सकती हैं।
मैं, एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी, गोंदिया, महाराष्ट्र, यह बताना चाहूंगा कि कई बार समस्या कानून के अभाव की नहीं, बल्कि उसके दायरे, व्याख्या, निगरानी और प्रभावी क्रियान्वयन की होती है। जब किसी श्रेणी पर नियंत्रण हो, लेकिन दूसरी समान रूप से महत्वपूर्ण श्रेणी को अपेक्षाकृत अधिक स्वतंत्रता मिल जाए, तब नियमों का उद्देश्य और वास्तविक परिणाम एक-दूसरे से अलग दिखाई देने लगते हैं।
दवा बाजार में यह चुनौती विशेष रूप से गंभीर है, क्योंकि यहां किसी वस्तु की कीमत का सवाल केवल व्यापारिक लाभ-हानि तक सीमित नहीं रहता, बल्कि मरीज के जीवन, इलाज की निरंतरता और परिवार की आर्थिक सुरक्षा से सीधे जुड़ जाता है। कैंसर जैसी गंभीर बीमारी में महंगी दवाओं का खर्च अनेक परिवारों को अपनी बचत समाप्त करने, कर्ज लेने अथवा संपत्ति बेचने तक की स्थिति में पहुंचा सकता है। ऐसे में दवाओं की कीमत निर्धारित करने की व्यवस्था में मौजूद संभावित कमियों की जांच और सुधार केवल आर्थिक सुधार नहीं, बल्कि जनहित, स्वास्थ्य संबंधी अधिकारों और सामाजिक न्याय का महत्वपूर्ण प्रश्न है।
सुप्रीम कोर्ट के सवालों से क्यों बढ़ी दवा मूल्य नियंत्रण पर चर्चा?
इस पूरे विषय को समझने के लिए दवा मूल्य निर्धारण से जुड़ी न्यायिक कार्यवाही और सरकारी कदमों पर ध्यान देना आवश्यक है। उपलब्ध कराए गए विवरण और संबंधित मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, 22 सितंबर तथा उसके बाद हुई सुनवाइयों के संदर्भ में कैंसर की एक दवा का उदाहरण सामने आया, जिसकी कीमत लगभग 2,700 रुपये बताई गई, जबकि उसके लिए 27,000 रुपये तक वसूले जाने का दावा किया गया।
इसी व्यापक संदर्भ में 12 अक्टूबर 2026 को सुप्रीम कोर्ट में हुई सुनवाई से संबंधित विवरण में किशन चंद जैन बनाम एथिक्स एंड मेडिकल रजिस्ट्रेशन बोर्ड एवं अन्य मामले का उल्लेख किया गया है। याचिका संख्या डब्ल्यूपी (सी) 794/2023 बताई गई है। इस मामले से संबंधित रिपोर्टों में दवा मूल्य नियंत्रण, निजी अस्पतालों की फार्मेसी में दवाओं की बिक्री और चिकित्सा उपकरणों की कीमतों से जुड़े प्रश्नों पर चर्चा का उल्लेख है।
हालांकि, मामले की तारीख, पीठ, न्यायालय के आदेशों और सरकार की ओर से प्रस्तुत हलफनामे से संबंधित सभी विवरणों की आधिकारिक पुष्टि आवश्यक है। इसलिए इन घटनाक्रमों को अंतिम न्यायिक निष्कर्ष के रूप में प्रस्तुत करने के बजाय उपलब्ध रिपोर्टों के संदर्भ में समझना उचित होगा।
इस बहस का मूल प्रश्न यही है कि जब सरकार के पास दवाओं की कीमतों को नियंत्रित करने के लिए कानूनी प्रावधान मौजूद हैं, तो फिर मरीजों को महंगी दवाओं से राहत दिलाने के लिए इन प्रावधानों का दायरा और प्रभावशीलता कैसे बढ़ाई जा सकती है?
डीपीसीओ 2013: कानून मौजूद, लेकिन क्या हर दवा की कीमत नियंत्रित है?
भारत में दवाओं की कीमतों को नियंत्रित करने का प्रमुख कानूनी ढांचा आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955 के अंतर्गत जारी औषधि (मूल्य नियंत्रण) आदेश, 2013 यानी डीपीसीओ 2013 है। दवाओं की कीमतों की निगरानी और संबंधित नियामकीय कार्रवाई में राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण यानी एनपीपीए की महत्वपूर्ण भूमिका है।
इस व्यवस्था का उद्देश्य आवश्यक दवाओं को उचित कीमत पर उपलब्ध कराना, निर्धारित मूल्य से अधिक वसूली पर कार्रवाई करना और दवाओं की उपलब्धता बनाए रखना है। हालांकि, इस व्यवस्था में अनुसूचित और गैर-अनुसूचित दवाओं के बीच अंतर महत्वपूर्ण है।
राष्ट्रीय आवश्यक औषधि सूची में शामिल अनुसूचित दवाओं के लिए निर्धारित नियमों के अनुसार अधिकतम कीमत तय की जाती है। दूसरी ओर, गैर-अनुसूचित दवाओं की शुरुआती कीमत तय करने में कंपनियों को अपेक्षाकृत अधिक स्वतंत्रता प्राप्त होती है।
डीपीसीओ 2013 के पैरा 20 के अंतर्गत गैर-अनुसूचित दवाओं के अधिकतम खुदरा मूल्य में किसी भी 12 महीने की अवधि में 10 प्रतिशत से अधिक वृद्धि नहीं की जा सकती। लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना आवश्यक है—सालाना मूल्य वृद्धि पर सीमा और किसी दवा की शुरुआती कीमत पर नियंत्रण, दोनों अलग-अलग विषय हैं।
यदि किसी दवा की शुरुआती कीमत ही बहुत अधिक रखी जाती है, तो उस पर सालाना वृद्धि की सीमा अपने आप मरीज को सस्ती दवा उपलब्ध नहीं करा देती। यही वह कानूनी और नीतिगत अंतर है, जिस पर दवा मूल्य नियंत्रण की मौजूदा बहस में विशेष ध्यान देने की जरूरत है।
कैंसर की दवाओं पर 30 प्रतिशत ट्रेड मार्जिन की प्रस्तावित व्यवस्था
12 अक्टूबर 2026 की सुनवाई से संबंधित मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने न्यायालय को गैर-अनुसूचित कैंसर रोधी दवाओं के ट्रेड मार्जिन को अधिकतम 30 प्रतिशत तक सीमित करने की प्रस्तावित व्यवस्था की जानकारी दी।
रिपोर्टों में एनपीपीए की 8 अक्टूबर 2026 की बैठक और इस विषय पर विचार के लिए विशेषज्ञ समिति गठित किए जाने का भी उल्लेख है। बताया गया कि समिति निर्धारित समय के भीतर उन कैंसर रोधी दवाओं की सूची तैयार करेगी, जिन पर यह व्यवस्था लागू हो सकती है। बाजार की परिस्थितियों और सार्वजनिक स्वास्थ्य की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए सूची को समय-समय पर अद्यतन करने की बात भी सामने आई है।
इस प्रस्ताव का उद्देश्य उन दवाओं की कीमतों में अत्यधिक वृद्धि को रोकना है, जिन पर अनुसूचित दवाओं जैसा प्रत्यक्ष मूल्य नियंत्रण लागू नहीं था।
हालांकि, ट्रेड मार्जिन और अधिकतम खुदरा मूल्य यानी एमआरपी एक ही चीज नहीं हैं। ट्रेड मार्जिन वितरण श्रृंखला में खरीद मूल्य और बिक्री मूल्य के बीच अंतर से संबंधित होता है। इसे किस आधार पर, किन स्तरों पर और किन दवाओं पर लागू किया जाएगा, इसका वास्तविक प्रभाव अंतिम अधिसूचना, निर्धारित सूची और लागू नियमों पर निर्भर करेगा।
इसलिए यह निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा कि प्रस्तावित व्यवस्था लागू होते ही हर कैंसर दवा की कीमत निश्चित रूप से 70 प्रतिशत कम हो जाएगी।
मीडिया रिपोर्टों में कुछ दवाओं की कीमतों में 20 से 70 प्रतिशत तक संभावित कमी और मरीजों को सालाना लगभग 2,500 करोड़ रुपये की बचत होने का अनुमान भी बताया गया है। ये अनुमान हैं; वास्तविक बचत संबंधित दवा, उसकी मौजूदा कीमत, वितरण व्यवस्था और अंतिम नियामकीय प्रावधानों पर निर्भर करेगी।
क्या केवल कैंसर की दवाएं ही महंगी हैं? हार्ट स्टेंट और एंटीबायोटिक पर भी सवाल
इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि दवा मूल्य निर्धारण की समस्या केवल कैंसर के उपचार तक सीमित नहीं है। हृदय रोग, मधुमेह, संक्रमण और अन्य गंभीर बीमारियों में इस्तेमाल होने वाली दवाएं भी लाखों परिवारों के नियमित खर्च का हिस्सा हैं।
इसके अतिरिक्त, हार्ट स्टेंट, कैथेटर, सलाइन से जुड़ी उपभोग्य सामग्री और दूसरे चिकित्सा उपकरणों की कीमतें भी उपचार की कुल लागत को प्रभावित करती हैं।
याचिका से संबंधित रिपोर्टों में अस्पतालों और चिकित्सा सामग्री की बिक्री में अत्यधिक मूल्य-अंतर तथा मरीजों के पास खरीद के सीमित विकल्प जैसे मुद्दों का उल्लेख किया गया है।
12 अक्टूबर की सुनवाई पर प्रकाशित रिपोर्टों के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने व्यापक दवा मूल्य नियंत्रण व्यवस्था के संदर्भ में यह सवाल उठाया कि यदि कैंसर की दवाओं के ट्रेड मार्जिन को नियंत्रित करने के लिए कदम उठाए जा सकते हैं, तो अन्य जीवनरक्षक दवाओं और चिकित्सा उपकरणों के संबंध में भी प्रभावी व्यवस्था पर विचार क्यों नहीं किया जाना चाहिए।
यह प्रश्न इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि मरीज के लिए इलाज का खर्च केवल डॉक्टर की फीस या अस्पताल में भर्ती होने तक सीमित नहीं रहता। दवाओं, चिकित्सा उपकरणों, जांचों और उपचार में इस्तेमाल होने वाली सामग्री का खर्च भी परिवार की आर्थिक स्थिति को प्रभावित करता है।
रिपोर्टों के अनुसार, मामले को 27 अक्टूबर 2026 को अगली सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया गया है। इस सुनवाई में सरकार के रुख और आगे की नियामकीय दिशा पर अधिक स्पष्टता मिलने की संभावना पर नजर रहेगी।
यहां न्यायालय और सरकार की भूमिकाओं के बीच अंतर समझना भी जरूरी है। न्यायालय सरकार से नीतिगत कमियों पर विचार करने, उपलब्ध कानूनी शक्तियों का उपयोग करने और जनहित में समाधान तलाशने को कह सकता है। लेकिन किसी नई मूल्य सीमा का वास्तविक क्रियान्वयन संबंधित कानूनी प्रावधानों, सरकारी निर्णयों और आवश्यक अधिसूचनाओं के माध्यम से ही होगा।
इसीलिए सभी दवाओं पर 16 प्रतिशत का समान मार्जिन लागू किए जाने की चर्चा को अभी अंतिम सरकारी निर्णय नहीं माना जाना चाहिए। न्यायालय में उठाए गए प्रश्न, प्रस्तावित नीतिगत उपाय और बाध्यकारी अंतिम आदेश अलग-अलग विषय हैं।
अस्पतालों की फार्मेसी: क्या मरीज को सस्ती दवा खरीदने का विकल्प मिलता है?
निजी अस्पतालों के भीतर संचालित फार्मेसियों को लेकर उठी चिंताओं में मरीज की पसंद और मूल्य पारदर्शिता का प्रश्न महत्वपूर्ण है।
यदि अस्पताल में भर्ती मरीज को बाहर से दवा खरीदने का व्यावहारिक अवसर नहीं मिलता, तो वह अलग-अलग दुकानों पर कीमतों की तुलना करने की स्थिति में भी नहीं रहता। ऐसी परिस्थितियों में पारदर्शी बिलिंग, खरीद मूल्य और बिक्री मूल्य के बीच उचित अंतर, जेनेरिक विकल्पों की जानकारी तथा वैकल्पिक स्रोतों की स्पष्ट जानकारी महत्वपूर्ण हो जाती है।
हालांकि, सभी अस्पतालों या फार्मेसियों पर एक समान आरोप लगाना उचित नहीं होगा। किसी संस्था की वास्तविक व्यावसायिक प्रथाओं का आकलन उपलब्ध प्रमाणों और संबंधित नियमों के आधार पर किया जाना चाहिए।
इसी तरह, चिकित्सा उपकरणों पर 500 से 1,000 प्रतिशत तक मार्जिन होने के दावों की जांच भी संबंधित उत्पाद, उसकी खरीद लागत, तकनीकी गुणवत्ता, नियामकीय श्रेणी और अस्पताल के सेवा शुल्क को अलग-अलग करके की जानी चाहिए।
यदि किसी उपकरण की कीमत में अनुचित वृद्धि पाई जाती है, तो प्रभावी मूल्य नियंत्रण, लागत संबंधी जानकारी और शिकायत निवारण की व्यवस्था उपयोगी हो सकती है। लेकिन हर उपकरण पर एक ही सीमा लागू करना तभी व्यावहारिक होगा, जब उत्पादों की लागत, गुणवत्ता और आपूर्ति संबंधी परिस्थितियों का उचित आकलन किया जाए।
दवा मूल्य नियंत्रण की व्यवस्था में तीन प्रमुख संभावित कमियां
दवा बाजार से संबंधित मौजूदा बहस के आधार पर तीन महत्वपूर्ण नीतिगत क्षेत्रों पर ध्यान देना आवश्यक है।
पहली कमी: शुरुआती कीमत और वार्षिक वृद्धि के बीच अंतर। गैर-अनुसूचित दवाओं की कीमतों में वार्षिक वृद्धि पर सीमा होने के बावजूद शुरुआती कीमत का प्रश्न अलग बना रहता है। यदि शुरुआती मूल्य बहुत अधिक है, तो सीमित वार्षिक वृद्धि भी दवा को सस्ता नहीं बनाती।
दूसरी कमी: दवाओं की अलग-अलग श्रेणियों के लिए अलग नियंत्रण व्यवस्था। अनुसूचित और गैर-अनुसूचित दवाओं के बीच नियामकीय अंतर के कारण सभी दवाओं पर एक समान प्रकार का मूल्य नियंत्रण लागू नहीं होता। ऐसे में आवश्यक दवाओं की सूची और मूल्य निर्धारण के मानकों की समय-समय पर समीक्षा महत्वपूर्ण है।
तीसरी कमी: वितरण श्रृंखला और अस्पतालों में मूल्य पारदर्शिता। दवा की कीमत केवल निर्माता के स्तर पर निर्धारित नहीं होती; वितरण, खुदरा बिक्री और अस्पताल की फार्मेसी भी मरीज की अंतिम लागत को प्रभावित कर सकती है। इसलिए खरीद मूल्य, बिक्री मूल्य, लागू मार्जिन और बिलिंग की पारदर्शिता पर प्रभावी निगरानी आवश्यक है।
इन संभावित कमियों का अर्थ यह नहीं है कि प्रत्येक दवा या प्रत्येक अस्पताल में अनियमितता हो रही है। वास्तविक समस्या की पहचान के लिए आंकड़ों, नियामकीय जांच और संबंधित नियमों के अनुपालन का मूल्यांकन आवश्यक है।
भारत के लिए अंतरराष्ट्रीय संदेश: सस्ता इलाज, पारदर्शी बाजार और मजबूत कानून
दवाओं की कीमतों का प्रश्न केवल भारत तक सीमित नहीं है। दुनिया के अनेक देशों में पेटेंट अधिकार, अनुसंधान की लागत, दवा कंपनियों की प्रतिस्पर्धा, सरकारी स्वास्थ्य बीमा और सार्वजनिक खरीद के बीच संतुलन बनाने की चुनौती मौजूद है।
कुछ देशों में सामूहिक खरीद और मूल्य वार्ता के माध्यम से लागत घटाने का प्रयास किया जाता है, जबकि अन्य देशों में बीमा योजनाओं और नियामकीय निगरानी की मदद ली जाती है।
भारत के लिए भी ऐसा ढांचा उपयोगी हो सकता है, जिसमें आवश्यक दवाओं की उपलब्धता, उचित कीमत, गुणवत्तापूर्ण निर्माण और नवाचार के लिए प्रोत्साहन एक साथ सुनिश्चित किए जाएं।
सिर्फ मूल्य सीमा घोषित करना पर्याप्त नहीं होगा। सरकार को यह भी देखना होगा कि कम कीमत के कारण किसी आवश्यक दवा का उत्पादन बंद न हो, बाजार में कृत्रिम कमी पैदा न हो और मरीज को निर्धारित दवा समय पर मिलती रहे।
इसके लिए लागत संबंधी आंकड़ों का नियमित विश्लेषण, थोक और खुदरा कीमतों की निगरानी, अस्पतालों की बिलिंग में पारदर्शिता, उल्लंघन पर समयबद्ध कार्रवाई और मरीजों के लिए सुलभ शिकायत प्रणाली जरूरी हैं।
इसके साथ ही, आवश्यक दवाओं की उपलब्धता, जेनेरिक विकल्पों के प्रति जागरूकता और मूल्य संबंधी नियमों के अनुपालन की निगरानी को भी मजबूत करना होगा। यही वह बिंदु है, जहां कानून के शब्दों को वास्तविक जनहित में बदलने की परीक्षा होती है।
27 अक्टूबर की सुनवाई पर टिकी निगाहें: क्या मरीजों को मिलेगी राहत?
दवा मूल्य नियंत्रण से जुड़ी इस बहस ने एक बार फिर यह प्रश्न सामने रखा है कि क्या मौजूदा कानूनी व्यवस्था जीवनरक्षक दवाओं को उचित कीमत पर उपलब्ध कराने के उद्देश्य को प्रभावी ढंग से पूरा कर रही है।
कैंसर की दवाओं पर 30 प्रतिशत ट्रेड मार्जिन की प्रस्तावित व्यवस्था एक महत्वपूर्ण नीतिगत कदम हो सकती है, लेकिन इसकी सफलता अंतिम नियमों, वास्तविक कीमतों में कमी और मरीजों तक पहुंचने वाले लाभ से तय होगी।
अगला बड़ा सवाल यह है कि क्या सरकार अन्य जीवनरक्षक दवाओं, हार्ट स्टेंट, एंटीबायोटिक, चिकित्सा उपकरणों और अस्पतालों की फार्मेसी में मूल्य पारदर्शिता के लिए भी व्यापक सुधार करेगी।
27 अक्टूबर 2026 की प्रस्तावित अगली सुनवाई इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे सरकार के व्यापक रुख और आगे की नियामकीय दिशा के बारे में अधिक स्पष्टता मिलने की उम्मीद की जा सकती है। हालांकि, सुनवाई से पहले किसी अंतिम निर्णय या सभी दवाओं पर समान मूल्य सीमा लागू होने का निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा।
कानून की असली सफलता इस बात में नहीं है कि उसके पन्नों पर कितने नियम लिखे हैं, बल्कि इसमें है कि उसकी कमियों का लाभ उठाकर आम नागरिक के अधिकारों का हनन न हो। दवा उद्योग को उचित लाभ कमाने का अधिकार है, लेकिन गंभीर बीमारी से जूझ रहे मरीज की विवशता को असीमित मूल्य वृद्धि का आधार नहीं बनाया जाना चाहिए।
अंतिम कसौटी यही रहेगी—क्या मरीज को गुणवत्तापूर्ण जीवनरक्षक दवा उचित कीमत पर मिलती है, क्या बाजार में प्रतिस्पर्धा और पारदर्शिता बढ़ती है और क्या कानून अपने मूल उद्देश्य, अर्थात जनहित की रक्षा, को प्रभावी रूप से पूरा कर पाता है?
लेखक परिचय: किशन सनमुखदास भावनानी, विशेषज्ञ स्तंभकार, साहित्यकार, अंतरराष्ट्रीय लेखक, चिंतक, कवि, संगीत माध्यमा, सीए (एटीसी), एडवोकेट, गोंदिया, महाराष्ट्र।
