जब रावण के अत्याचारों से कराह उठी धरती, तब भगवान श्रीराम ने लिया अवतार का संकल्प

लेखक: पंडित जय प्रकाश पाण्डेय
रावण का बढ़ता अहंकार और धर्म पर संकट
सनातन धर्म की पावन परंपरा में भगवान श्रीराम का अवतार केवल एक राजा के जन्म की कथा नहीं, बल्कि धर्म की रक्षा, अधर्म के विनाश और मर्यादा की स्थापना का दिव्य संदेश है। गोस्वामी तुलसीदासजी द्वारा रचित श्रीरामचरितमानस में वर्णित श्रीराम अवतार की पृष्ठभूमि हमें बताती है कि जब अत्याचार अपनी सीमाएँ लाँघने लगता है, तब ईश्वर की कृपा से धर्म की पुनर्स्थापना का मार्ग प्रशस्त होता है।
रावण ने अपनी शक्ति और सामर्थ्य के बल पर संसार को जीतने का संकल्प लिया, जबकि विभीषण ने भगवान के चरणों में अटूट भक्ति माँगी। समय बीतने के साथ रावण का बल, वैभव और प्रभाव बढ़ता गया। लेकिन शक्ति के साथ उसके भीतर अहंकार भी बढ़ने लगा।
तुलसीदासजी लिखते हैं—
भुजबल बिस्व बस्य करि राखेसि कोउ न सुतंत्र।
मंडलीक मनि रावन राज करइ निज मंत्र॥
अर्थात् रावण ने अपने बाहुबल से संसार को अपने अधीन कर लिया था। अनेक राजा उसके प्रभाव में थे और स्वतंत्र रूप से शासन करने का साहस नहीं कर पाते थे।
रावण की सबसे बड़ी भूल यही थी कि उसने शक्ति को सेवा का साधन बनाने के बजाय अत्याचार का हथियार बना लिया। ऋषियों के यज्ञ बाधित होने लगे, तपस्वियों को सताया जाने लगा और धर्म-कर्म में विघ्न डालना राक्षसों की प्रवृत्ति बन गई।
जब धर्म की जड़ें हिलाने लगे राक्षस
रामचरितमानस में तुलसीदासजी राक्षसों के अत्याचारों का वर्णन करते हुए लिखते हैं—
जेहि बिधि होइ धर्म निर्मूला।
सो सब करहिं बेद प्रतिकूला॥
राक्षस ऐसे कार्य करते थे, जिनसे धर्म और सदाचार का नाश हो। वेदों के प्रतिकूल आचरण करके धार्मिक परंपराओं को बाधित करते थे। साधु-संतों के आश्रमों में भय का वातावरण था और यज्ञ-तपस्या करने वालों को तरह-तरह से परेशान किया जाता था।
तुलसीदासजी आगे लिखते हैं—
सुभ आचरन कतहुँ नहिं होई।
देव बिप्र गुरु मान न कोई॥
नहिं हरिभगति जग्य तप ग्याना।
सपनेहुँ सुनिअ न बेद पुराना॥
अर्थात् शुभ आचरण का अभाव होने लगा। देवताओं, गुरुजनों और धर्माचार्यों के प्रति सम्मान घटने लगा तथा हरिभक्ति, यज्ञ, तपस्या और ज्ञान की चर्चा भी दुर्लभ हो गई।
यहाँ एक गहरा संदेश छिपा है। किसी समाज का पतन केवल बाहरी संकटों से नहीं होता, बल्कि तब भी होता है जब उसके भीतर से सत्य, सदाचार, करुणा और कर्तव्यबोध समाप्त होने लगते हैं।
गौ का रूप धारण कर पृथ्वी ने लगाई गुहार
जब रावण के अत्याचार असहनीय हो गए, तब पृथ्वी व्याकुल हो उठी। तुलसीदासजी पृथ्वी की पीड़ा को अत्यंत मार्मिक रूप में प्रस्तुत करते हैं।
पृथ्वी समस्त प्राणियों को धारण करने वाली माता है। पर्वत, नदियाँ, समुद्र और जीव-जगत उसके ऊपर स्थित हैं, लेकिन अधर्म और अत्याचार का बढ़ता बोझ उसके लिए असहनीय हो गया।
अंततः पृथ्वी ने गौ का रूप धारण किया और देवताओं तथा मुनियों के पास जाकर अपनी व्यथा सुनाई।
धेनु रूप धरि हृदयँ बिचारी।
गई तहाँ जहँ सुर मुनि झारी॥
निज संताप सुनाएसि रोई।
काहू तें कछु काज न होई॥
अर्थात् पृथ्वी गौ का रूप धारण करके देवताओं और मुनियों के पास पहुँची। उसने रोते हुए अपना दुःख सुनाया, लेकिन तत्काल कोई समाधान नहीं निकल सका।
सनातन परंपरा में गौ को करुणा, पोषण और मातृत्व का प्रतीक माना गया है। पृथ्वी का गौ के रूप में प्रकट होना उसकी असहायता और समस्त जीव-जगत के प्रति उसकी ममता को दर्शाता है।
इस प्रसंग से हमें सीख मिलती है कि जब अन्याय के सामने पीड़ित की आवाज दबने लगे, तब समाज के समर्थ और विवेकशील लोगों का दायित्व है कि वे उसकी सहायता के लिए आगे आएँ।
ब्रह्माजी के सामने पहुँचे देवता और मुनि
पृथ्वी की करुण पुकार सुनकर देवता, मुनि और गंधर्व ब्रह्माजी के लोक में पहुँचे। सभी रावण के अत्याचारों से चिंतित थे। वे जानते थे कि रावण को प्राप्त वरदानों के कारण उसका अंत करना साधारण उपायों से संभव नहीं था।
ब्रह्माजी ने सभी की व्यथा सुनी और उन्हें धैर्य रखने का संदेश दिया। उन्होंने भगवान के चरणों का स्मरण करने की प्रेरणा दी।
तुलसीदासजी लिखते हैं—
धरनि धरहि मन धीर कह बिरंचि हरिपद सुमिरु।
जानत जन की पीर प्रभु भंजिहि दारुन बिपति॥
अर्थात् ब्रह्माजी ने पृथ्वी को धैर्य रखने और भगवान का स्मरण करने के लिए कहा। भगवान अपने भक्तों की पीड़ा जानते हैं और उनकी कठिन विपत्तियों को दूर करने में समर्थ हैं।
यह संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है। संकट के समय धैर्य, विवेक और ईश्वर के प्रति विश्वास मनुष्य को निराशा से उबारने की प्रेरणा देते हैं। हालांकि, आस्था के साथ अन्याय के विरुद्ध उचित प्रयास करना भी हमारा कर्तव्य है।
आकाशवाणी ने दिया श्रीराम अवतार का संदेश
देवताओं के सामने अब सबसे बड़ा प्रश्न था कि भगवान विष्णु से सहायता कैसे प्राप्त की जाए। सभी उनकी शरण में जाना चाहते थे। तभी दिव्य आकाशवाणी हुई, जिसने उनके मन से भय और चिंता दूर कर दी।
भगवान ने आश्वासन दिया कि वे देवताओं के कल्याण और पृथ्वी का भार कम करने के लिए मनुष्य रूप में अवतार लेंगे।
जनि डरपहु मुनि सिद्ध सुरेसा।
तुम्हहि लागि धरिहउँ नर बेसा॥
अंसन्ह सहित मनुज अवतारा।
लेहउँ दिनकर बंस उदारा॥
अर्थात् हे मुनियों, सिद्धों और देवताओं! भय मत करो। तुम्हारे हित के लिए मैं मनुष्य का रूप धारण करूँगा और अपने अंशों सहित महान सूर्यवंश में अवतार लूँगा।
यह घोषणा श्रीराम अवतार की पृष्ठभूमि का सबसे महत्वपूर्ण क्षण है। भगवान सर्वशक्तिमान होते हुए भी मनुष्य रूप में जन्म लेकर मानव जीवन के आदर्श प्रस्तुत करेंगे। वे अपने आचरण से बताएँगे कि सत्य, त्याग, कर्तव्य और मर्यादा के मार्ग पर चलकर जीवन को महान कैसे बनाया जा सकता है।
राजा दशरथ और माता कौशल्या के घर होगा दिव्य अवतार
भगवान ने देवताओं को बताया कि पूर्वकाल में कश्यप और अदिति की तपस्या से प्रसन्न होकर उन्होंने उन्हें वरदान दिया था। रामचरितमानस की कथा के अनुसार, वही कश्यप और अदिति अयोध्या के राजा दशरथ और रानी कौशल्या के रूप में प्रकट हुए हैं।
भगवान ने कहा—
तिन्ह कें गृह अवतरिहउँ जाई।
रघुकुल तिलक सो चारिउ भाई॥
अर्थात् भगवान राजा दशरथ के घर अवतार लेंगे और चारों भाई रघुकुल की कीर्ति बढ़ाएँगे।
इस प्रकार अयोध्या में भगवान श्रीराम के प्राकट्य का मार्ग प्रशस्त हुआ। देवताओं की प्रार्थना, पृथ्वी की करुण पुकार और भगवान का आश्वासन एक ही दिव्य उद्देश्य से जुड़े थे—धर्म की रक्षा और अधर्म का अंत।
भगवान ने देवताओं को दिया सहयोग का निर्देश
भगवान के अवतार का आश्वासन मिलने के बाद देवताओं के हृदय में आनंद और विश्वास जाग उठा। ब्रह्माजी ने उन्हें निर्देश दिया कि वे वानर रूप में पृथ्वी पर जन्म लें, जिससे भगवान श्रीराम के कार्य में सहायता कर सकें।
आगे चलकर यही वानर समुदाय श्रीराम की लंका विजय में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। हनुमानजी की भक्ति, सुग्रीव का सहयोग, जामवंत का मार्गदर्शन और वानर सेना का पराक्रम इस दिव्य योजना को साकार करने में सहायक होंगे।
इस प्रसंग से स्पष्ट होता है कि धर्म की स्थापना केवल एक व्यक्ति के प्रयास से नहीं, बल्कि अनेक सहयोगियों के समर्पण, साहस और निष्ठा से भी होती है।
इस कथा से क्या शिक्षा मिलती है?
पहली शिक्षा—अहंकार का अंत निश्चित है। रावण के पास बल, वैभव और वरदान थे, लेकिन अहंकार ने उसकी विवेकशक्ति को ढक दिया। शक्ति तभी कल्याणकारी होती है, जब उसका उपयोग न्याय और लोकहित के लिए किया जाए।
दूसरी शिक्षा—अन्याय के सामने मौन रहना उचित नहीं। पृथ्वी की करुण पुकार हमें सिखाती है कि पीड़ित की सहायता करना समाज का नैतिक दायित्व है।
तीसरी शिक्षा—संकट में धैर्य और विश्वास बनाए रखें। ब्रह्माजी का संदेश बताता है कि निराशा के क्षणों में भी विवेक और आशा का साथ नहीं छोड़ना चाहिए।
चौथी शिक्षा—धर्म केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं। सत्य बोलना, दूसरों का सम्मान करना, कमजोरों की सहायता करना और अपने कर्तव्यों का पालन करना भी धर्म के महत्वपूर्ण अंग हैं।
पाँचवीं शिक्षा—ईश्वर की भक्ति के साथ सद्कर्म आवश्यक हैं। भगवान श्रीराम का जीवन आदर्श आचरण, सेवा, त्याग और मर्यादा की प्रेरणा देता है।
घर में कैसे करें श्रीराम की श्रद्धापूर्वक पूजा?
इस कथा का पाठ करने वाले श्रद्धालु घर में भगवान श्रीराम की सामान्य पूजा-विधि अपना सकते हैं। इसके लिए किसी विशेष या जटिल अनुष्ठान की अनिवार्यता नहीं है।
पूजन की सरल विधि:
स्थान की स्वच्छता: पूजा स्थल को साफ करें और भगवान श्रीराम, माता सीता, लक्ष्मणजी तथा हनुमानजी के चित्र या विग्रह को श्रद्धापूर्वक स्थापित करें।
स्वयं की शुद्धता: स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें। इसके बाद शांत मन से पूजा का संकल्प लें।
दीप प्रज्वलन: दीपक जलाएँ और भगवान का ध्यान करते हुए पुष्प, अक्षत तथा उपलब्ध फल या नैवेद्य अर्पित करें।
मंत्र-जप: श्रद्धानुसार “श्रीराम जय राम जय जय राम” या “ॐ श्रीरामाय नमः” मंत्र का जप करें।
रामचरितमानस पाठ: इस प्रसंग का पाठ करें या श्रीरामचरितमानस की चौपाइयों का श्रद्धापूर्वक श्रवण करें।
आरती और प्रार्थना: भगवान श्रीराम की आरती करें तथा परिवार की सुख-शांति, सद्बुद्धि और कल्याण की प्रार्थना करें।
प्रसाद वितरण: पूजा के बाद प्रसाद परिवार के सदस्यों में बाँटें और जरूरतमंदों की यथाशक्ति सहायता करें।
ध्यान रखें: यह सामान्य घरेलू पूजन-विधि है, किसी विशेष वैदिक यज्ञ या अनुष्ठान का विधान नहीं। पूजा में स्वच्छता, श्रद्धा, संयम और सदाचार को प्राथमिकता दें। परिवार की परंपरा के अनुसार विधि में अंतर हो सकता है।
समापन: जब धरती की पुकार बनी श्रीराम अवतार का आधार
रावण को अपनी शक्ति और वरदानों पर इतना गर्व था कि वह स्वयं को अजेय समझने लगा। उसे यह आभास नहीं था कि उसका अहंकार ही उसके विनाश का कारण बनेगा। जिस मनुष्य को उसने अपने भय से बाहर रखा था, उसी मनुष्य रूप में भगवान श्रीराम अवतरित होने वाले थे।
पृथ्वी की करुण पुकार से आरंभ हुई यह कथा हमें बताती है कि अधर्म चाहे कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो, वह स्थायी नहीं हो सकता। सत्य, न्याय और धर्म की स्थापना के लिए संघर्ष आवश्यक है और भगवान श्रीराम का चरित्र उसी संघर्ष में मर्यादा तथा सदाचार का प्रकाश दिखाता है।
अब अयोध्या में राजा दशरथ और माता कौशल्या के घर उस दिव्य अवतार का समय निकट आ रहा था, जिसकी प्रतीक्षा देवता, मुनि और स्वयं पृथ्वी कर रहे थे।
जय श्रीराम!
लेखक: पंडित जय प्रकाश पाण्डेय
