हमर मन के गली-खोर म हवय डेरा।
माँगे बर आए हवन तुंहर घर छेरछेरा।।
धान ह धरागे, पुस पुन्नी के दिन आगे।
टूरी-टूरा मन सुआ अउ डंडा नाच नाचे।।
हम लइका-पिचका मन घेरे हवन घेरा।
माँगे बर आए हवन तुंहर घर छेरछेरा।।
कोनों धरे हन बोरी, कोनों मन चुरकी।
कोनों धरे हन झोला, कोनों मन अंगौछी।।
छबाए कोठी के धान ल झटकुन हेरा।
माँगे बर आए हवन तुंहर घर छेरछेरा।।
एक पसर देदे या देदे सूपा म भरके।
कहूँ खोंची म देबे, लेलेबो हमन लरके।।
दूसर दूवारी जाना हे, होगे अबड़ बेरा।
माँगे बर आए हवन तुंहर घर छेरछेरा।।
कवि- अशोक कुमार यादव मुंगेली, छत्तीसगढ़
जिलाध्यक्ष राष्ट्रीय कवि संगम इकाई
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