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हरेक चेहरे पर मुस्कान सजाकर,
दिल में वो दर्द छिपाकर बैठे हैं।
दुनिया समझे सब कुछ अच्छा,
हम खामोशी को अपना बैठे हैं।
किससे कहें अपने मन की बातें,
हमको कौन यहाँ सुनने वाला है।
यहाँ हर चेहरा अपना लगता है,
परंतु कौन किसका होने वाला है।
हाँ, कुछ दर्द जुबाँ तक आते नहीं,
कुछ आँसू आँखों में ही सूख गए।
कुछ सपने थे जो अपने भी कभी,
स्थिति और वक्त के हाथों टूट गए।
✍️ रचनाकार
संजय एम. तराणेकर
कवि, लेखक एवं समीक्षक
इन्दौर-452011, मध्यप्रदेश