
हाँ, कच्ची दीवारों पर जब, संजा मुस्कुराती थी,
मिट्टी-गोबर-फूलों से बेटियाँ दुनिया सजाती थीं।
नन्ही-सी उँगलियों में पूरा “गाँव” उतर आता था,
हर दिन आकृति में मन का सपना मुस्काता था।
सहेलियाँ गीत सुनातीं, हँसी आँगन में गूँजती थी,
नानी-दादी “लोककथाओं” से शाम महकाती थी।
संजा केवल चित्र नहीं, यह रिश्तों की पहचान थी,
बेटियों के कोमल मन में लोक संस्कृति की जान थी।
सोलह दिन तक हर संध्या एक नया उत्सव होता,
मिट्टी के अदने आँगन में बड़ा-सा संसार संजोता।
फिर आती अमावस बेला, संजा “विदा” हो जाती,
जाते-जाते घर-आँगन में यादों की खुशबू छोड़ जाती।
रचनाकार
संजय एम. तराणेकर
(कवि, लेखक व समीक्षक)
इन्दौर-452011 (मध्य प्रदेश)
