Bhutan की पहाड़ियों से भारत पर बाढ़ का खतरा! 7,000 लोगों का पलायन, क्या दूसरी जलप्रलय के लिए तैयार है देश?

अभिषेक कुमार यादव की रिपोर्ट
लखनऊ (राष्ट्र की परम्परा)। हिमालय की ऊंचाइयों पर टूटा प्राकृतिक बांध और भारत के सीमावर्ती इलाकों में बढ़ी दहशत! भूटान में ग्लेशियर झील से पानी निकलने की घटना ने पश्चिम बंगाल से लेकर असम तक प्रशासन की चिंता बढ़ा दी। नदी किनारे बसे गांवों को अलर्ट किया गया, हजारों लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया गया और NDRF-SDRF की टीमें मोर्चे पर उतारी गईं। फिलहाल जलस्तर घटने के संकेत राहत दे रहे हैं, लेकिन एक नई अस्थायी झील के बनने से खतरे की आशंका पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। सवाल बड़ा है—अगर दोबारा पानी का सैलाब उमड़ा, तो भारत की तैयारी कितनी कारगर साबित होगी?
60 से 70 लाख घन मीटर पानी का खतरा
29 अक्टूबर 2026 को भूटान के गासा जिले के लेमथांग क्षेत्र में स्थित शिंताफू झील के प्राकृतिक अवरोध के टूटने से पानी का तेज बहाव शुरू हुआ। अंतरराष्ट्रीय एकीकृत पर्वतीय विकास केंद्र (ICIMOD) के अनुसार, घटना से पहले झील में करीब 60 से 70 लाख घन मीटर पानी मौजूद था। पानी मो छू और पुनात्सांगछू नदी तंत्र से होते हुए संकोश नदी की दिशा में बढ़ा। संभावित जलस्तर वृद्धि को देखते हुए केंद्रीय जल आयोग (CWC) ने बाढ़ संबंधी परामर्श जारी किया।
हजारों लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया
पश्चिम बंगाल के अलीपुरद्वार में एहतियातन करीब 6,000 से 7,000 लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाने की खबर सामने आई। राहत शिविरों में भोजन, राशन और जरूरी सुविधाओं की व्यवस्था की गई। कूचबिहार और जलपाईगुड़ी में भी निगरानी बढ़ाई गई। असम के धुबरी और कोकराझार जिलों में प्रशासन को सतर्क रहने के निर्देश दिए गए। NDRF, SDRF और नागरिक सुरक्षा दलों को तैयार रखा गया, ताकि जरूरत पड़ने पर तत्काल राहत एवं बचाव अभियान चलाया जा सके।
पानी घटा, लेकिन नई झील ने बढ़ाई चिंता
संकोश नदी के जलस्तर में कमी के संकेत राहत जरूर दे रहे हैं, लेकिन भूटान में पानी और मलबे के कारण एक नई अस्थायी झील बनने की सूचना ने विशेषज्ञों की चिंता बढ़ा दी है। यदि इसका प्राकृतिक अवरोध कमजोर पड़ता है या टूट जाता है, तो दोबारा अचानक बाढ़ आ सकती है। ऐसे में नदी घाटियों और निचले इलाकों में रहने वाले लोगों के लिए सतर्कता बेहद जरूरी है।
आखिर क्यों फटती हैं ग्लेशियर झीलें?
जलवायु परिवर्तन के कारण ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने से पहाड़ों में नई झीलें बन सकती हैं। इनके प्राकृतिक बांध बर्फ, मिट्टी और चट्टानों से बने होते हैं। भारी बारिश, हिमस्खलन, भूस्खलन या पानी का दबाव बढ़ने से ये अवरोध टूट सकते हैं। इसे ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) कहा जाता है। ऐसी बाढ़ में पानी के साथ पत्थर और मलबा भी तेज गति से नीचे आता है, जिससे नुकसान का खतरा कई गुना बढ़ सकता है।
भारत की तैयारी पर सबसे बड़ा सवाल
भूटान की घटना ने सीमा पार चेतावनी प्रणाली, नदी जलस्तर की निगरानी और समय रहते लोगों को निकालने की व्यवस्था की अहमियत फिर सामने रखी है। क्या संवेदनशील गांवों तक समय पर अलर्ट पहुंचाने के पर्याप्त साधन हैं? क्या सुरक्षित आश्रय स्थल और निकासी मार्ग तैयार हैं? क्या नई झील की लगातार निगरानी कर संभावित दूसरे खतरे की सूचना तुरंत दी जा सकती है? सबक साफ है: आपदा के बाद राहत पहुंचाना जरूरी है, लेकिन उससे भी ज्यादा जरूरी है समय रहते खतरे को पहचानना। हिमालय में उठने वाला पानी सीमाओं में बंधकर नहीं बहता। भारत और भूटान के बीच वैज्ञानिक निगरानी, सटीक सूचना साझा करने और मजबूत आपदा प्रबंधन का तालमेल ही ऐसी जलप्रलय से जनजीवन की रक्षा कर सकता है।
