मानवाधिकार, समानता और न्याय की अलख जगाने वाली शख्सियत को काव्यात्मक नमन

जिसने अन्याय के आगे झुकना नहीं सीखा,
जिसने अत्याचारों के आगे रुकना न सीखा।
मानवता की पीड़ा को अपना दर्द है बनाया,
नवी पिल्लई ने देखो, न्याय का दीप जलाया।
दक्षिण अफ्रीका की धरती से उठी है आवाज़,
इसमें साहस, संकल्प और न्याय का आगाज़।
रंगभेद की दीवारों से जब इंसानियत कराहती,
तब उनके संघर्ष की लौ अंधेरों से लड़ जाती।
न थी सत्ता की चाहत, न शोहरत का अरमान,
उनके लिए सर्वोपरि था मानवता का सम्मान।
कानून की ताकत को हथियार बनाकर,
हर बार लड़ीं वो लड़ाई, अन्याय को मिटाकर।
न्यायालयों के गलियारों में उनकी पहचान बनी,
पीड़ितों की आँखों में उम्मीद की मुस्कान बनी।
महिलाओं के अधिकारों की बुलंद आवाज़ रहीं,
कमज़ोरों के हक़ में संघर्ष का आगाज़ बनीं।
नमन उस व्यक्तित्व को, जो न्याय की मशाल है,
मानवता के पथ पर जो साहस की मिसाल है।
उनके विचारों से रोशन हो इंसाफ़ का जहान,
हर इंसान को मिले बराबरी, गरिमा और सम्मान।
कविता के रचनाकार:
संजय एम. तराणेकर
कवि, लेखक एवं समीक्षक
इन्दौर–452011, मध्य प्रदेश
