— डॉ. कर्नल आदिशंकर मिश्र ‘आदित्य’
प्रेम केवल भावना नहीं, यह भक्ति का स्वरूप है,
प्रेम पूजा है, जहां न स्वार्थ है, न अहंकार का रूप है।
जब प्रेम निस्वार्थ बन जाए, वही सच्ची सेवा कहलाए,
और जब हर प्राणी से प्रेम हो, वही धर्म बन जाए।
प्रेम केवल किसी एक से नहीं, स्वयं से भी होता है,
जो खुद से प्रेम करता है, वही संसार से जुड़ा होता है।
प्रेम में ही ईश्वर का साक्षात वास माना गया है,
क्योंकि प्रेम ही ईश्वर है और ईश्वर ही प्रेम कहा गया है।
जहां प्रेम में पवित्रता है, वहां सम्मान अपने आप है,
प्रेम ही राधा है, प्रेम ही श्रीकृष्ण का भाव है।
प्रेम लीनता है, विकारों से परे एक अवस्था है,
जहां न कोई भेद है, न कोई स्वार्थ की व्यथा है।
प्रेम की न कोई सीमा है, न कोई परिभाषा,
यह निराकार भी है और साकार भी—यही इसकी भाषा।
पूरा संसार प्रेम से ही संचालित हो रहा है,
क्योंकि प्रेम में ही जीवन का वास्तविक अर्थ छिपा है।
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