सरदार भगत सिंह ने ‘किरती’ में लिखी वीरों की गाथा
काकोरी ट्रेन एक्शन केवल सरकारी खजाना लूटने की घटना नहीं, बल्कि औपनिवेशिक सत्ता को सीधी चुनौती देने वाले उस क्रांतिकारी आत्मविश्वास का प्रतीक था, जिसने देश के युवाओं में स्वतंत्रता के लिए निर्णायक संघर्ष की चेतना जगाई।- नवनीत मिश्र
9 अगस्त 1925 भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के उन दिनों में दर्ज है, जब कुछ युवाओं ने ब्रिटिश साम्राज्य की ताकत के सामने अपने साहस का ऐसा परिचय दिया, जिसकी गूंज आने वाले वर्षों तक सुनाई देती रही। काकोरी के निकट चलती ट्रेन को रोककर अंग्रेजी सरकार का खजाना अपने कब्जे में लेना सामान्य घटना नहीं थी। यह एक राजनीतिक संदेश था, स्पष्ट, साहसिक और सीधा। संदेश यह कि भारत की धरती पर अंग्रेजी सत्ता को अब बिना चुनौती के स्वीकार करने वाली पीढ़ी नहीं बची है।
काकोरी ट्रेन एक्शन के पीछे व्यक्तिगत स्वार्थ नहीं, बल्कि क्रांतिकारी आंदोलन को संसाधन उपलब्ध कराने की आवश्यकता थी। उस समय हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन से जुड़े क्रांतिकारी अंग्रेजी शासन को उखाड़ फेंकने और स्वतंत्र भारत की स्थापना का सपना देख रहे थे। उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती थी, संगठन को मजबूत करना, हथियार जुटाना और आंदोलन को आगे बढ़ाने के लिए धन की व्यवस्था करना। इसी पृष्ठभूमि में सरकारी खजाने को निशाना बनाने की योजना बनी।
9 अगस्त की शाम ट्रेन काकोरी स्टेशन से आगे बढ़ी। क्रांतिकारियों ने उसे रोक लिया। उनका निशाना यात्रियों की निजी संपत्ति नहीं, बल्कि अंग्रेजी सरकार का वह खजाना था, जिसे वे औपनिवेशिक शासन की संपत्ति मानते थे। कार्रवाई के दौरान हुई गोलीबारी में एक यात्री की मृत्यु ने इस घटना को और गंभीर बना दिया। ब्रिटिश सरकार के लिए यह साफ संकेत था कि उसके खिलाफ काम कर रहा क्रांतिकारी आंदोलन अब केवल गुप्त बैठकों और विचारों तक सीमित नहीं रहा।
इसके बाद अंग्रेजी शासन ने अपनी पूरी ताकत क्रांतिकारियों के नेटवर्क को तोड़ने में लगा दी। गिरफ्तारियों का दौर शुरू हुआ। पूछताछ, छापे और मुकदमों के जरिए क्रांतिकारी संगठन को कमजोर करने का प्रयास किया गया। रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खां, राजेंद्रनाथ लाहिड़ी और ठाकुर रोशन सिंह जैसे नाम अंग्रेजी शासन की नजर में सबसे बड़े अपराधियों में बदल गए, जबकि देश की जनता की नजर में वे स्वतंत्रता के योद्धा बन चुके थे।
काकोरी ट्रेन एक्शन का महत्व केवल इस बात में नहीं था कि सरकारी खजाना कब्जे में लिया गया। इसका असली महत्व उस राजनीतिक चेतना में था, जिसने अंग्रेजी सत्ता की अजेयता के भ्रम को तोड़ा। ब्रिटिश साम्राज्य के पास सेना थी, पुलिस थी, कानून था और जेलें थीं, लेकिन इन सबके बावजूद कुछ युवा यह मानने को तैयार नहीं थे कि गुलामी स्थायी हो सकती है।
यही कारण है कि काकोरी ट्रेन एक्शन की कहानी अदालत की फाइलों में बंद नहीं रह सकी। इसे शब्द मिले, विचार मिले और एक ऐसी आवाज मिली, जिसने क्रांतिकारियों के संघर्ष को जनता तक पहुंचाया। वह आवाज थी सरदार भगत सिंह की।
पंजाबी पत्रिका ‘किरती’ में सरदार भगत सिंह ने काकोरी ट्रेन एक्शन और उससे जुड़े क्रांतिकारियों पर लिखा। मई 1927 में प्रकाशित ‘काकोरी के वीरों से परिचय’ जैसे लेखों में उन्होंने केवल घटना का विवरण नहीं दिया, बल्कि उन युवाओं के विचारों और उद्देश्यों को भी सामने रखा। उनके लिए इतिहास का अर्थ केवल तारीखें और घटनाएं दर्ज करना नहीं था। वे चाहते थे कि जनता यह समझे कि इन युवाओं ने अपने जीवन को किस उद्देश्य के लिए दांव पर लगाया था।
सरदार भगत सिंह की लेखनी की सबसे बड़ी विशेषता यही थी कि उन्होंने क्रांतिकारियों को केवल अदालत में खड़े अभियुक्तों के रूप में नहीं देखा। उनके लेखों में शचींद्रनाथ सान्याल, पं. रामप्रसाद बिस्मिल, राजेंद्रनाथ लाहिड़ी, रोशन सिंह, मन्मथनाथ गुप्त, जोगेशचंद्र चटर्जी, अशफाक उल्ला खां और उनके अनेक साथियों का संघर्ष सामने आता है। यह इतिहास के उन चेहरों को बचाने का प्रयास था, जिन्हें अंग्रेजी शासन अपने दस्तावेजों में अपराधी साबित करना चाहता था।
काकोरी ट्रेन एक्शन के बाद चला मुकदमा भी ब्रिटिश शासन की कठोरता का प्रमाण था। करीब दस महीने तक न्यायिक प्रक्रिया चली। क्रांतिकारियों को कठोर सजाएं सुनाई गईं। देश के विभिन्न हिस्सों से उनकी सजा कम करने की मांग उठी, लेकिन अंग्रेजी सरकार अपने फैसले से पीछे नहीं हटी। अंततः चार क्रांतिकारियों पं. रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खां, राजेंद्रनाथ लाहिड़ी और ठाकुर रोशन सिंह को मृत्युदंड दिया गया।
राजेंद्रनाथ लाहिड़ी को 17 दिसंबर 1927 को गोंडा जेल में फांसी दी गई। 19 दिसंबर को पं. रामप्रसाद बिस्मिल को गोरखपुर जेल, अशफाक उल्ला खां को फैजाबाद जेल और ठाकुर रोशन सिंह को इलाहाबाद जेल में फांसी दी गई। अंग्रेजी सरकार ने सोचा होगा कि चार फंदे क्रांति की आवाज को शांत कर देंगे। इतिहास ने इसके ठीक उलट फैसला सुनाया।
इन शहादतों के बाद क्रांतिकारियों के प्रति युवाओं का आकर्षण और बढ़ा। उनके गीत गाए गए, उनके विचार पढ़े गए और उनके जीवन की कहानियां गांव-गांव तक पहुंचीं। अंग्रेजी शासन जिन लोगों को भय का प्रतीक बनाना चाहता था, वे जनता के लिए साहस और बलिदान के प्रतीक बन गए।
पं.रामप्रसाद बिस्मिल और अशफाक उल्ला खां की दोस्ती इस कहानी का सबसे उजला पक्ष है। दोनों की धार्मिक पृष्ठभूमि अलग थी, लेकिन मातृभूमि के प्रति समर्पण ने दोनों को एक सूत्र में बांध दिया था। उनके बीच का रिश्ता बताता है कि स्वतंत्रता आंदोलन की असली ताकत किसी संकीर्ण पहचान में नहीं, बल्कि साझा राष्ट्रीय उद्देश्य में थी। दोनों ने साथ संघर्ष किया और अंततः देश के लिए अपने प्राण दे दिए।
सरदार भगत सिंह ने इन शहीदों की कहानी लिखते समय इसी भावना को सामने रखा। वे जानते थे कि अंग्रेजी सरकार शरीर को कैद कर सकती है, आवाज को दबा सकती है और जीवन छीन सकती है, लेकिन विचारों को फांसी नहीं दी जा सकती। इसलिए उनकी कलम भी संघर्ष का हथियार थी।
आज जब काकोरी ट्रेन एक्शन को 100 साल बाद याद किया जाता है तो इसे केवल एक ट्रेन रोकने और सरकारी खजाना कब्जे में लेने की घटना मानना इसके व्यापक अर्थ को छोटा करना होगा। यह उस दौर की बेचैनी का परिणाम था, जब देश का युवा यह सवाल पूछ रहा था कि गुलामी आखिर कब तक? यह उस साहस का प्रतीक था, जिसमें परिणाम की चिंता से ज्यादा स्वतंत्रता का सपना महत्वपूर्ण था।
काकोरी की पटरियों पर उस दिन ट्रेन जरूर रुकी थी, लेकिन इतिहास की गति तेज हो गई थी। ब्रिटिश शासन ने क्रांतिकारियों को गिरफ्तार किया, मुकदमे चलाए और फांसी दी, मगर जिस विचार को वे खत्म करना चाहते थे, वह और व्यापक होता गया।
काकोरी ट्रेन एक्शन की सबसे बड़ी विरासत यही है कि स्वतंत्रता किसी एक व्यक्ति, एक संगठन या एक आंदोलन की देन नहीं थी। इसके पीछे अनगिनत युवाओं का साहस, संघर्ष, त्याग और बलिदान था। कुछ ने जेलें देखीं, कुछ ने यातनाएं सहीं और कुछ हंसते-हंसते फांसी के फंदे पर झूल गए और फिर सरदार भगत सिंह की कलम ने उन गुमनाम और चर्चित चेहरों को इतिहास की स्मृति में सुरक्षित कर दिया।
9 अगस्त 1925 की वह घटना आज भी इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि उसने ब्रिटिश सत्ता को यह बता दिया था कि भारत का युवा अब डरने वाला नहीं है। काकोरी की पटरियों से उठी वह हुंकार आगे चलकर स्वतंत्रता के अंतिम संघर्ष की चेतना का हिस्सा बनी।
काकोरी ट्रेन एक्शन इसलिए इतिहास का केवल एक अध्याय नहीं, बल्कि उस पीढ़ी के साहस का दस्तावेज है जिसने गुलामी को नियति मानने से इनकार कर दिया था।
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