Friday, July 10, 2026
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चंदवारा गांव में युवक को गोली मारकर घायल, पुलिस जांच में जुटी

वैशाली (राष्ट्र की परम्परा डेस्क)। करताहा थाना क्षेत्र के चंदवारा गांव में अज्ञात अपराधियों ने 22 वर्षीय युवक को गोली मार दी। घायल युवक की पहचान विजय राय के पुत्र आदित्य कुमार के रूप में हुई है। घटना उस समय हुई जब आदित्य अपने दोस्त के घर से लौट रहा था। रास्ते में दो मोटरसाइकिल सवार बदमाशों ने उसे निशाना बनाया।

गोली आदित्य के दाहिने पैर में लगी, जिसके बाद परिजन और स्थानीय लोग आनन-फानन में उसे सदर अस्पताल लेकर पहुंचे। डॉक्टर उसकी हालत स्थिर बताकर इलाज में जुटे हैं और गोली निकालने का प्रयास कर रहे हैं।

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तार चोरी विवाद से जुड़ा मामला

स्थानीय सूत्रों के अनुसार, घायल युवक के परिवार के घर में पिछले दो दिनों से तार चोरी की घटनाएं हो रही थीं। इसी विवाद को लेकर गांव में पंचायत बुलाई गई थी, जिसमें दो युवकों पर संदेह जताया गया था। पंचायत के बाद आदित्य अपने दोस्त से मिलने गया था और लौटते समय अपराधियों ने उस पर हमला कर दिया।

पुलिस की कार्रवाई

करताहा थानाध्यक्ष कुणाल आजाद ने बताया कि अभी तक पीड़ित परिवार की ओर से कोई लिखित शिकायत दर्ज नहीं कराई गई है। आवेदन मिलते ही एफआईआर दर्ज कर आवश्यक कार्रवाई की जाएगी। फिलहाल पुलिस मामले की गहन जांच-पड़ताल कर रही है और हमलावरों की तलाश जारी है।

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JJD पोस्टर विवाद पर बोले, “पहले तेजस्वी से पूछो माता-पिता की तस्वीरें क्यों गायब”-तेज प्रताप यादव

पटना (राष्ट्र की परम्परा डेस्क)बिहार की राजनीतिक सरगर्मी इस समय नई दिशा पकड़ रही है। राज्य के पूर्व मंत्री और आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव के बड़े पुत्र तेज प्रताप यादव ने हाल ही में अपनी नई पार्टी जनशक्ति जनता दल (JJD) के पोस्टर को लेकर उठे विवाद पर मीडिया से मुखातिब होते हुए जोरदार प्रतिक्रिया दी है।

तेज प्रताप यादव ने पलटवार करते हुए कहा कि उन्हें सवाल करने से पहले यह पूछा जाना चाहिए कि आरजेडी के पोस्टरों से माता-पिता की तस्वीरें क्यों गायब हैं। यह बयान बिहार की राजनीति में तेज प्रताप और तेजस्वी यादव के बीच चल रही निजी और राजनीतिक चुनौतियों को उजागर करता है, और JJD के गठन के बाद पार्टी की सक्रियता को भी रेखांकित करता है।

भगत सिंह की जयंती? आधुनिकता, राजनीति और सोशल मीडिया के जाल में खोता इतिहास?

(राजकुमार मणि)

आज़ादी का संघर्ष सिर्फ तारीख़ों और घटनाओं का संग्रह नहीं है, बल्कि उन वीर आत्माओं की शौर्य गाथाओं से लिखा गया है जिन्होंने मातृभूमि के लिए अपने प्राण न्यौछावर कर दिए। इन वीरों में सबसे चमकता नाम है शहीद-ए-आज़म सरदार भगत सिंह।
लेकिन हर साल हमारी अंतरात्मा को झकझोरने वाला सवाल यह है – हम क्यों भूल जाते हैं भगत सिंह की जयंती?
आज, सोशल मीडिया पर हर किसी के जन्मदिन की फोटो और बधाई ट्रेंड करती है, लेकिन स्वतंत्रता संग्राम के नायकों की स्मृति कहीं पीछे छूट जाती है। क्या हम सचमुच अपने इतिहास को भूल रहे हैं, या आधुनिक जीवन की तेज़ रफ्तार और राजनीतिक स्वार्थ हमें उनसे दूर ले जा रही है?
भगत सिंह: बचपन से क्रांति तक
28 सितंबर 1907 को पंजाब के बंगा गाँव में जन्मे भगत सिंह, मात्र 12 वर्ष की आयु में जलियांवाला बाग हत्याकांड से गहरे प्रभावित हुए। यही घटना उनके हृदय में क्रांति की ज्वाला भड़क गई।
उनका मानना था कि अंग्रेज़ों की हुकूमत केवल हथियार, संगठन और बलिदान से ही परास्त हो सकती है। इसलिए उन्होंने हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA) से जुड़कर संगठित क्रांति की नींव रखी।
भुला क्यों दिया गया भगत सिंह को?

आधुनिकता और व्यावसायिक जीवन का दबदबा
युवा पीढ़ी आज मनोरंजन, सोशल मीडिया और व्यस्त जीवन में उलझी है। ऐसे में राष्ट्रनायकों की स्मृति केवल इतिहास की किताबों तक सीमित रह गई है।

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  1. राजनीतिक स्वार्थ और उपेक्षा
    कई बार राजनीतिक दल अपने हित और विचारधारा के अनुसार इतिहास का प्रचार करते हैं। भगत सिंह का समाजवादी और क्रांतिकारी दृष्टिकोण हर किसी के लिए सहज नहीं था, इसलिए उनकी जयंती पर औपचारिकता से अधिक चर्चा नहीं होती।
  2. मीडिया की सीमित भूमिका
    समाचार चैनल और डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म पर उनकी जयंती पर श्रद्धांजलि दी जाती है, लेकिन लगातार युवा पीढ़ी तक उनके विचार और साहस की पहुँच नहीं होती।
  3. युवा पीढ़ी की अनभिज्ञता
    इंटरनेट और सोशल मीडिया में मनोरंजन और ट्रेंड्स का दबदबा ऐतिहासिक व्यक्तित्वों को पीछे धकेल देता है।
    भगत सिंह के विचार आज भी प्रासंगिक क्यों हैं?
    भगत सिंह का संदेश केवल अंग्रेज़ों से लड़ने तक सीमित नहीं था। उनका मानना था:

“किसी भी समाज को यदि आगे बढ़ना है, तो उसे अंधविश्वास और गुलामी की मानसिकता से मुक्त होना पड़ेगा।”
आज, जब हम भ्रष्टाचार, बेरोज़गारी और सामाजिक असमानता जैसी चुनौतियों से जूझ रहे हैं, उनके विचार और भी अधिक प्रासंगिक हो उठते हैं।
शहादत जिसने इतिहास बदल दिया
8 अप्रैल 1929 को भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने सेंट्रल असेंबली, दिल्ली में बम फेंका। उनका उद्देश्य किसी की जान लेना नहीं था, बल्कि ब्रिटिश शासन को जगाना था।
23 मार्च 1931 को, राजगुरु और सुखदेव के साथ, भगत सिंह को लाहौर सेंट्रल जेल में फांसी दे दी गई, जब उनकी उम्र केवल 23 वर्ष थी। उनकी शहादत ने लाखों भारतीयों के दिलों में क्रांति की आग भड़काई और स्वतंत्रता संग्राम को नई दिशा दी।
सोशल मीडिया और राजनीतिक लाभ में फंसी जयंती
आज भगत सिंह की जयंती भी राजनीतिक और डिजिटल स्वार्थों के जाल में फंसी है। अनेक बार जातिगत राजनीति और राजनीतिक प्रचार के लिए स्वतंत्रता आंदोलन के नायकों को “अपने हित के हिसाब से” मोड़ दिया जाता है। ऐसे में युवाओं तक उनका वास्तविक संदेश और बलिदान पहुँच पाना कठिन हो जाता है।
हम क्या कर सकते हैं?

  1. शैक्षणिक पाठ्यक्रम में विस्तार
    बच्चों को केवल नाम और तारीख़ नहीं, बल्कि भगत सिंह के विचार, सिद्धांत और क्रांतिकारी दृष्टिकोण पढ़ाना चाहिए।
  2. डिजिटल जागरूकता
    सोशल मीडिया पर उनकी जयंती को ट्रेंड में लाना, वीडियो, पोडकास्ट और आर्टिकल के माध्यम से युवाओं तक पहुँचाना।
  3. सांस्कृतिक और सामुदायिक आयोजन
    स्कूल, कॉलेज और समाज में नाटक, वाद-विवाद और सांस्कृतिक कार्यक्रम कर उनकी गाथा जीवित रखना।
  4. व्यक्तिगत संकल्प
    हर भारतीय अपने जीवन में कम से कम एक कार्य ऐसा अपनाए जो देश और समाज के हित में हो, यही सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
    भगत सिंह सिर्फ एक क्रांतिकारी नहीं, बल्कि युवा चेतना और समाज की मानसिकता बदलने वाले दार्शनिक थे। उनकी जयंती हमें याद दिलाती है कि स्वतंत्रता केवल राजनीतिक आज़ादी नहीं, बल्कि सामाजिक और मानसिक स्वतंत्रता भी है।
    अगर हम हर साल केवल औपचारिकता निभाते रहेंगे, तो आने वाली पीढ़ियाँ उन्हें केवल इतिहास की किताबों में ढूँढेंगी। इसलिए ज़रूरी है कि हम भगत सिंह की जयंती को राष्ट्रीय चेतना और युवा जागरण का पर्व बनाएं।

विजयपुर फार्म हाउस की दुर्दशा से किसान परेशान, बीज वितरण में घोटाले का आरोप

ग्रामीणों ने उठाई उच्च स्तरीय जांच की मांग

डाॅ.सतीश पाण्डेय व नीरज की रिपोर्ट

महराजगंज(राष्ट्र की परम्परा)। विकासखंड सदर अंतर्गत ग्राम पंचायत विजयपुर स्थित उद्यान विभाग की सैकड़ों एकड़ भूमि एक समय था कि जिले के उन्नत किसानो के लिए वरदान माना जाता था। यहां आलू, मूली, चना, मटर, भिंडी सहित अनेक मौसमी फसलें तैयार कर किसानों को फार्म के माध्यम से बीज वितरण कराया जाता था। लेकिन विभागीय लापरवाही और अधिकारियों की अनदेखी के चलते अब यह फार्म उपेक्षा का शिकार हो गया है। सरकार की मंशा है कि बदलते मौसम और जलवायु प्रभाव को देखते हुए किसानों को आधुनिक तकनीक से खेती के लिए प्रोत्साहित किया जाए। इसी उद्देश्य से विजयपुर फार्म हाउस में लाखों रुपए की लागत से स्ट्रक्चर पॉलीहाउस,नर्सरी हाउस का निर्माण कराया गया ताकि किसान आसानी से पौधा तैयार कर सकें। लेकिन आज यह स्ट्रक्चर पानी भराव और देख-रेख के अभाव में खुद बदहाली की तस्वीर पेश कर रहा है।

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प्राप्त समाचार के अनुसार किसानों को अमरूद, नींबू, केला, पपीता, टमाटर व फूलों की खेती सहित विविध फसलों के लिए प्रोत्साहित करती है। इसके लिए विभाग द्वारा गोभी, बंदगोभी, पपीता, आंवला, शिमला मिर्च, लौकी, कद्दू, नींबू आदि के बीज निःशुल्क दिए जाते हैं।लेकिन ग्रामीणों का आरोप है कि विभाग और कंपनियों की मिलीभगत से यहां भी बड़े पैमाने पर घोटाले किए जाते हैं। बीज वितरण के लिए पांच से छः कंपनियों को अधिकृत किया जाता है, परंतु कमीशन के चक्कर में कंपनी वाले पुराने बीजों की री-पैकिंग कर उन पर ताजे पैकिंग का लेबल लगाकर किसानों में वितरण कर देते हैं। ऐसे बीजों से न तो फसल सही तरह उगती है और न ही किसान को अपेक्षित लाभ मिलता है।
ग्रामीणों का कहना है कि ऐसे बीजों से फसल चौपट हो जाती है और लाखों का नुकसान उठाना पड़ता है। शिकायत करने पर अधिकारी टाल-मटोल कर देते हैं, और कोई ठोस कदम नहीं उठाते। विजयपुर और आस- पास के किसानों में राजेश, उपेंद्र, कमला देवी, कुसमावती, वेदना, शोभा, सोनू, चंदन, मनोज, कन्हैया, अलगू आदि ने आरोप लगाया कि विभागीय मिली-भगत से वर्षों से इस तरह के खेल हो रहे हैं। ग्रामीणों ने मांग की है कि विजयपुर फार्म हाउस और विभागीय गतिविधियों की उच्च स्तरीय जांच कराई जाए। जहां एक ओर सरकार किसानों की आमदनी दोगुनी करने के लिए बागवानी और उद्यानिकी की ओर किसानों को प्रेरित कर रही है, वहीं दूसरी ओर जमीनी स्तर पर विभागीय लापरवाही और घोटाले सरकार की योजनाओं पर पानी फेर रहे हैं। अब देखना यह होगा कि ग्रामीणों की शिकायत पर प्रशासन कब और कैसी कार्रवाई करता है।
इस संबंध में जिला उद्यान अधिकारी संजय कुमार रस्तोगी से पूछे जाने पर उन्होंने कहा मामला मेरे संज्ञान में नहीं है। शिकायत मिलेगी तो जांच कराकर आवश्यक कार्रवाई की जाएगी।

दिल का ख्याल रखें – परिवार का भविष्य बचाएँ

हार्ट अटैक समस्या क़ा संभावित समाधान- जीवनशैली में सख़्त आचार संहिता अपनाकर असामाइक मौतों को रोकने में सहभागी बनें

गोंदिया- वैश्विक स्तरपर दुनियाँ तेजी से बदल रही है जिसके कारण बदलती मानवीय जीवनशैली का सबसे गंभीर प्रभाव मानव हृदय पर पड़ा है। आज हृदय रोग केवल वृद्धावस्था तक सीमित नहीं रह गया, बल्कि यह युवाओं में भी बड़ी चुनौती बनकर उभरा है। वैश्विक स्तर पर हर साल लाखों लोग दिल से जुड़ी बीमारियों के कारण अपनी जान गंवा रहे हैं।पिछले दो-तीन वर्षों से कम उम्र के लोगों में हार्ट अटैक के मामले तेजी से बढ़ते हुए देखे गए हैं ।पचास वर्ष से कम उम्र के 50 फ़ीसदी और 40 वर्ष से कम उम्र के 25 फीसदी लोगों में हार्ट अटैक का जोखिम देखा गया है कुछ वर्षों पूर्व पुरुषों की तुलना में महिलाओं में हार्ट अटैक के मामले कम थे।एक नए शोध में यह ह्रदय रोग अब बराबर देखे गए।ह्रदय रोगियों की संख्या में वृद्धि हुई। मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र मानता हूं कि कुछ वर्षों पूर्व वृद्धावस्था में होने वाली इस बीमारी ने युवकों को भी शिकार बना लिया है।वर्तमान में हार्ट अटैक युवाओं में होने के अनेकों -अनेक कारणों का समावेश होता रहा है!इसमें आधुनिक खान- पान और जीवन शैली महत्वपूर्ण है। डब्ल्यूएचओ के अनुसार दुनियाँ के कुल ह्रदय रोगियों में से 60 प्रतिशत मरीज अकेले भारत में ही होने की संभावना व्यक्ति की गई है।इन्हीं चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए हर वर्ष 29 सितंबर को विश्व हृदय दिवस मनाया जाता है।वर्ष 2025 का विषय है “एक धड़कन न चूकें” यह संदेश केवल व्यक्तिगत स्वास्थ्य तक सीमित नहीं है, बल्कि एक सामूहिक चेतावनी है कि यदि अब भी लोग, समाज और सरकारें सक्रिय नहीं हुए तो हृदय रोग एक वैश्विक महामारी का रूप ले लेगा। चूँकिहार्ट अटैक समस्या क़ा संभावित समाधान- जीवनशैली में सख़्त आचार संहिता अपनाकर असामाइक मौतों को रोकने में सहभागी बनें इसलिए आज हम मीडिया में उपलब्ध जानकारी के सहयोग से आर्टिकल के माध्यम से चर्चा करेंगे,विश्व हृदय दिवस 2025- हृदय स्वास्थ्य एक वैश्विक समस्या-“सावधानी बरतें जीवन बचाएं”-“एक धड़कन न चूकें”
साथियों बात अगर हम हार्ट अटैक क्या है और कैसे होता है? इसको समझने की करें तो, हार्टअटैक, इसे चिकित्सकीय भाषा में मायोकार्डियलइंफार्क्शन कहा जाता है, तब होता है जब हृदय की मांसपेशियों तक रक्त का प्रवाह अचानक बाधित हो जाता है। यह स्थिति प्रायः तब उत्पन्न होती है जब कोरोनरी आर्टरी (हृदय की रक्तवाहिका) में प्लाक (कोलेस्ट्रॉल, वसा और अन्य तत्वों का जमाव) जमा होकर ब्लॉकेज पैदा कर देता है। इस ब्लॉकेज से हृदय की मांसपेशियों को पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं मिलती और परिणामस्वरूप हृदय की कोशिकाएं मरने लगती हैं। यदि समय पर इलाज न मिले तो यह व्यक्ति की जान भी ले सकता है।इसके लक्षण कई बार अचानक और गंभीर हो सकते हैं जैसे- सीने में तेज दर्द या दबाव, पसीना आना, सांस फूलना, जबड़े या बांह में दर्द, मतली या बेहोशी। वहीं, कुछ मामलों में हल्के संकेत भी मिलते हैं जिन्हें लोग सामान्य थकान या गैस समझकर नजरअंदाज कर देते हैं, और यही लापरवाही जीवन के लिए घातक सिद्ध होती है।
साथियों बात अगर हम जीवनशैली और हार्ट अटैक का संबंध को समझने की करें तो,आधुनिक युग की भागदौड़ भरी जीवनशैली हृदय के लिए सबसे बड़ा खतरा बन चुकी है। अधिकतर मामलों में पाया गया है कि हृदय रोग सीधे-सीधे व्यक्ति की आदतों और दिनचर्या से जुड़े होते हैं।(1)अस्वास्थ्यकर आहार- जंक फूड, तैलीय और प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थ, उच्च नमक और चीनी का सेवन हृदय पर भार डालते हैं। (2) शारीरिक निष्क्रियता- लंबे समय तक बैठे रहने और व्यायाम न करने से मोटापा, डायबिटीज और हाई ब्लड प्रेशर बढ़ते हैं।(3)धूम्रपान व शराब का सेवन-तंबाकू और अल्कोहल हृदय की धमनियों को नुकसान पहुंचाते हैं।(4)तनाव और अनियमित नींद- मानसिक दबाव और नींद की कमी हार्मोनल असंतुलन पैदा कर हृदय रोग का खतरा बढ़ाते हैं।यानी, यदि व्यक्ति अपने जीवनशैली विकल्पों में बदलाव कर ले तो हृदय रोग से होने वाले 80 फ़ीसदी समयपूर्व मौतों को रोका जा सकता है।
साथियों बात अगर हम विश्व हृदय दिवस 29 सितंबर 2025 को एक वैश्विक बहुभाषी अभियान को समझने की करें तो,हर वर्ष 29 सितंबर को विश्व हृदय दिवस मनाया जाता है। यह केवल एक दिन का कार्यक्रम नहीं बल्कि एक वैश्विक अभियान है जिसमें विभिन्न भाषाओं, संस्कृतियों और देशों को एक मंच पर लाकर हृदय स्वास्थ्य के प्रति जागरूक किया जाता है।(1) स्कूल,कॉलेज औरविश्वविद्यालयों में हेल्थ कैम्प और सेमिनार आयोजित होते हैं।(2)अस्पताल और स्वास्थ्य संगठन मुफ्त जांच शिविर और परामर्श सेवाएं प्रदान करते हैं।(3) डिजिटल माध्यमों पर सोशल मीडिया कैंपेन चलाए जाते हैं।(4) सरकारें और अंतरराष्ट्रीय संगठन मिलकर नीतिगत हस्तक्षेप की दिशा में कदम उठाते हैं।इस दिन का मुख्य उद्देश्य लोगों को याद दिलाना है कि उनका हृदय ही उनकी जीवन शक्ति है और उसकी देखभाल सबसे पहली जिम्मेदारी होनी चाहिए।2025 की थीम-“एक धड़कन न चूकें” इसका गहरा अर्थ है। यह लोगों को यह समझाने का प्रयास है, (1)हृदय स्वास्थ्य में लापरवाही की कोई जगह नहीं है (2) समय- समय पर स्वास्थ्य जांच कराना जरूरी है।(3)चेतावनी संकेतों (जैसे सांस फूलना, थकान, सीने में दर्द) को कभी नजरअंदाज न करें।(5)स्वस्थ आदतों को निरंतर बनाए रखना चाहिए, चाहे व्यक्ति पूरी तरह स्वस्थ क्यों न दिखे।(6)समय पर चिकित्सा सहायता लेना ही जीवन बचाने का सबसे प्रभावी उपाय है।(7)चिप्स, फ्रेंच फ्राइज ,कैंडी, आइसक्रीम, चॉकलेट, कोक, और सोडा जैसी हाई कार्बोहाइडेड, शुगर ओर पेंटी, फैटी एसिड वाली चीजों को कंफर्ट फूड में रखा गया है। इनसे हार्ट अटैक का रोग खतरा 33% बढ़ जाता है। यदि प्रतिदिन लगभग 800/900 ग्राम फल और सब्जियां खाते हैं ,तो उनमें हार्ट अटैक का खतरा लगभग 30% कम होता है। हृदयाघात की जोखिम बढ़ने के 6 कारणों में से 4 कारण तो जीवनशैली से जुड़े है,जिन्हें नियन्त्रित कर ह्रदय घात के खतरे को काफी कम करके दिल को मजबूत किया जा सकता। उपरोक्त थीम वैश्विक स्तरपर एक चेतावनी है कि हम सभी को अपने और अपने प्रियजनों के हृदय की जिम्मेदारी लेनी होगी।
साथियों बात अगर हम इस जागरण अभियान में सरकारों और समाज की भूमिका को समझने की करें तो,(1)हृदय स्वास्थ्य केवल व्यक्तिगत जिम्मेदारी नहीं है। इसमेंसरकारों और समाजों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है (2) सरकारें किफायती और सुलभ स्वास्थ्य सेवाएं सुनिश्चित करें।(3)ग्रामीण और पिछड़े क्षेत्रों में हृदय रोग की जांच और इलाज की सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएं।(4)खाद्य उद्योगों को नियमन में लाकर अस्वास्थ्यकर खाद्य पदार्थों पर नियंत्रण किया जाए।(5)स्कूलों में बच्चों को बचपन से ही स्वास्थ्य शिक्षा दी जाए।(6)कार्यस्थलों पर तनाव प्रबंधन और फिटनेस कार्यक्रम शुरू किए जाएं।(7) यदि यह प्रयास सामूहिक रूप से किए जाएं तो आने वाले वर्षों में हृदय रोग के मामलों में उल्लेखनीय कमी लाई जा सकती है।
अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विशेषण करें तो हम पाएंगे कि,विश्व हृदय दिवस 2025 केवल एक तारीख नहीं है,यह दुनियाँ के हर नागरिक के लिए एक याद दिलाने वाला अवसर है कि हृदय की धड़कन अमूल्य है।“एक धड़कन न चूकें” केवल एक नारा नहीं बल्कि एक जीवन मंत्र है। हृदय स्वास्थ्य के लिए व्यक्तिगत जिम्मेदारी, सामूहिक प्रयास और सरकारी नीतियां तीनों जरूरी हैं। यदि लोग आज ही स्वस्थ जीवनशैली अपनाना शुरू करें, समय पर जांच कराएं और चेतावनी संकेतों को गंभीरता से लें तो असामयिक मौतों को रोका जा सकता है।हृदय एक बार रुक जाए तो जीवन ठहर जाता है, इसलिए अब समय है कि दुनिया भर की सरकारें, समाज और व्यक्ति मिलकर यह संकल्प लें कि आने वाली पीढ़ियों को एक स्वस्थ और मजबूत हृदय की धड़कन उपहार में देंगे।

करूर हादसे में मातम का माहौल: परिजनों का रो-रोकर बुरा हाल

करुर (राष्ट्र की परम्परा डेस्क)तमिलनाडु के करूर ज़िले में एक बड़ा हादसा हो गया। अभिनेता से नेता बने तमिलगा वेत्री कझगम (TVK) प्रमुख विजय की रैली में अचानक भारी भीड़ उमड़ पड़ी, जिससे अफरातफरी मच गई और भगदड़ की स्थिति बन गई। इस दर्दनाक हादसे में अब तक 39 लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि कई लोग घायल होकर अस्पताल में भर्ती हैं। सरकारी मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल से जब शवों को बाहर निकाला गया, तो परिजनों का विलाप और चीत्कार दिल दहला देने वाला था। सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे वीडियो में देखा जा सकता है कि परिजन अपने प्रियजनों के शव देखकर बेसुध होकर रो पड़े।

न्यूज़ एजेंसी एएनआई द्वारा जारी वीडियो में साफ देखा जा सकता है कि मृतकों के परिवारजन शव को देखते ही दहाड़ मारकर विलाप करने लगे। उनका दर्द इतना गहरा था कि मानो वे अपनों से कह रहे हों– “उठ जाओ…कहां चले गए।”

इस घटना पर प्रतिक्रिया देते हुए टीवीके प्रमुख विजय ने कहा कि करूर हादसे में हुई मौतों से वे बेहद आहत हैं। उन्होंने इसे असहनीय दुख बताया और शोक संवेदनाएँ व्यक्त कीं। विजय ने अस्पताल में भर्ती घायलों के जल्द स्वस्थ होने की कामना की।

तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन ने भी इस त्रासदी पर गहरा दुख जताया और बताया कि अब तक 39 लोगों की जान जा चुकी है। साथ ही प्रशासन ने मृतकों के परिजनों और घायलों की मदद के लिए तत्काल राहत कार्य शुरू कर दिया है।

करूर ट्रेजेडी:भीड़ नियंत्रण में लापरवाही या अचानक हादसा ? जांच जारी

विजय की सभा में कई घायल, गृह मंत्रालय ने मांगी रिपोर्

करूर (राष्ट्र की परम्परा डेस्क)तमिलनाडु के करूर में अभिनेता से नेता बने विजय की पार्टी तमिलगा वेत्री कझगम (TVK) की रैली में भारी भीड़ उमड़ पड़ी। भीड़ इतनी विशाल थी कि नियंत्रण बिगड़ गया और अचानक भगदड़ मच गई। इस अफरातफरी में कई लोग गंभीर रूप से घायल हो गए, जबकि कुछ की मौत होने की पुष्टि हुई है। घायलों को नजदीकी अस्पतालों में भर्ती कराया गया है।

घटना के बाद सामने आए दिल दहला देने वाले वीडियो ने हर किसी को भावुक कर दिया। पीटीआई द्वारा जारी एक वीडियो में पीड़ित परिवार की महिलाएं बिलखती नजर आईं, जबकि एएनआई की क्लिप में जूते-चप्पल और बिखरी भीड़ के निशान साफ देखे जा सकते हैं।

स्थिति की गंभीरता को देखते हुए केंद्रीय गृह मंत्रालय ने तमिलनाडु सरकार से रिपोर्ट मांगी है। गृह मंत्री अमित शाह ने राज्यपाल आर.एन. रवि और मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन से बातचीत कर हालात का जायजा लिया और हरसंभव मदद का आश्वासन दिया। इस बीच, राज्य सरकार ने मृतकों के परिजनों को 10-10 लाख रुपये की अनुग्रह राशि देने का ऐलान किया है।

“आपके लिए अग्रिम पंचांग: 29 और 30 सितंबर 2025 – शुभ व अशुभ मुहूर्त”

तिथि: शुक्ल पक्ष पंचमी — दोपहर 12:04 बजे तक, उसके बाद षष्ठी
वार: सोमवार
नक्षत्र: अनूराधा — रात्रि 1:08 AM तक
चंद्र राशि: वृश्चिक (Scorpio)
करण: बालव — दोपहर 12:04 तक, तत्पश्चात कौलव
योग: प्रीति
सूर्योदय / सूर्यास्त: 5:48 AM / 5:49 PM (वाराणसी समयानुसार)
चंद्र उदय: 10:28 AM
दोष काल:राहुकाल: 8:48 AM – 10:18 AM
गुलिक काल: 5:48 AM – 7:18 AM
यमघंट: 1:19 PM – 2:49 PM
शुभ मुहूर्त: 11:24 AM – 12:12 PM
🔱 पूजा एवं विशेषता
यह दिन स्कंद षष्ठी का माना जाता है। भगवान कार्तिकेय (स्कंद) की पूजा विशेष फलदायी रहेगी।
सोमवार होने से शिव पूजन का महत्व और अधिक बढ़ जाता है।
नवरात्रि के चलते देवी दुर्गा की नियमित पूजा, दुर्गा स्तुति, धूप-दीप-अक्षत अर्पण करना श्रेष्ठ होगा।
राहुकाल और यमघंट में कोई शुभ कार्य न करें।

30 सितंबर 2025 – मंगलवार का पंचांग
तिथि: शुक्ल पक्ष षष्ठी — दोपहर 2:28 बजे तक, तत्पश्चात सप्तमी
वार: मंगलवार
नक्षत्र: ज्येष्ठा — रात्रि 3:55 AM तक
चंद्र राशि: वृश्चिक (Scorpio)
करण: तैतिल — दोपहर तक
योग: आयुष्मान
सूर्योदय / सूर्यास्त: 5:49 AM / 5:48 PM
चंद्र उदय: 11:24 AM
दोष काल: राहुकाल: 3:18 PM – 4:48 PM
गुलिक काल: 12:18 PM – 1:48 PM
यमघंट: 9:18 AM – 10:48 AM
🔱 पूजा एवं विशेषता
यह दिन नवरात्रि की षष्ठी के नाम से प्रसिद्ध है। इस दिन देवी दुर्गा की काल प्रारंभ पूजा, बिल्व निमंत्रण और अकाल बोधन का विशेष महत्व है।
भगवान शिव को बिल्व पत्र अर्पित करने से विशेष पुण्य की प्राप्ति होती है।
सुबह और दोपहर मध्य का समय पूजा-अर्चना हेतु श्रेष्ठ रहेगा।
राहुकाल एवं दोषकालों से बचते हुए ही पूजन या मांगलिक कार्य करें।
✨ समग्र विशेष मार्गदर्शन (27 से 30 सितंबर का संदर्भ)
27 व 29 सितंबर: चंद्रमा वृश्चिक राशि में रहते हुए अनूराधा नक्षत्र में — यह काल स्कंद पूजा व शिव-शनि उपासना हेतु अनुकूल।
28 व 30 सितंबर: चंद्रमा वृश्चिक राशि में ज्येष्ठा नक्षत्र में — नवरात्रि षष्ठी के कारण देवी दुर्गा की आराधना, अकाल बोधन, बिल्व निमंत्रण का महत्व।
सभी दिनों में राहुकाल, यमघंट, गुलिक काल में शुभ कार्य न करें।
📍 नोट: यह पंचांग सामान्य पंचांग व समयानुसार तैयार है। स्थानीय सूर्योदय-सूर्यास्त और तिथि-नक्षत्र में कुछ अंतर संभव है। अतः अंतिम निर्णय हेतु किसी योग्य पंडित या ज्ञानी से परामर्श अवश्य लें।

विश्व रेबीज दिवस : जागरूकता और रोकथाम का संकल्प

हर साल 28 सितंबर को विश्व रेबीज दिवस मनाया जाता है। इस दिन का उद्देश्य लोगों को रेबीज जैसी गंभीर बीमारी से बचाव के लिए जागरूक करना और इसके खात्मे की दिशा में प्रयासों को मजबूत करना है।

रेबीज अधिकतर संक्रमित जानवर, खासकर कुत्ते के काटने से फैलती है। यदि समय पर इलाज न हो, तो यह बीमारी जानलेवा साबित हो सकती है। इसलिए समय रहते उपचार और रोकथाम बेहद जरूरी है।

पालतू पशुओं का नियमित टीकाकरण इस बीमारी को रोकने का सबसे कारगर तरीका है। साथ ही, यदि किसी जानवर के काटने की घटना हो, तो तुरंत घाव को साबुन-पानी से धोकर चिकित्सक से परामर्श लेना चाहिए।

यह दिवस हमें याद दिलाता है कि जागरूकता, सतर्कता और सामूहिक प्रयासों के जरिए रेबीज को पूरी तरह समाप्त किया जा सकता है। जिम्मेदार समाज बनकर ही हम रेबीज-मुक्त भविष्य की ओर बढ़ सकते हैं।

आज का इतिहास : 28 सितम्बर

🔹 प्रमुख घटनाएँ

551 ईसा पूर्व – चीन के महान दार्शनिक कन्फ्यूशियस का जन्म।

1746 – फ्रांसीसियों ने भारत में मद्रास (चेन्नई) पर कब्ज़ा किया।

1837 – अकबर द्वितीय का निधन; बहादुर शाह द्वितीय (बहादुरशाह ज़फ़र) ने दिल्ली का शासन संभाला।

1838 – बहादुरशाह ज़फ़र आधिकारिक रूप से भारत का अंतिम मुग़ल सम्राट बने।

1887 – चीन की ह्वांगहो नदी में आई भीषण बाढ़ से लगभग 15 लाख लोग मारे गए।

1923 – इथियोपिया ने राष्ट्र संघ (League of Nations) की सदस्यता छोड़ी।

1928 – अमेरिका ने चीन की राष्ट्रवादी सरकार (च्यांग काई शेक) को मान्यता दी।

1939 – जर्मनी ने पोलैंड पर कब्जा कर वारसा पर अधिकार किया।

1950 – इंडोनेशिया संयुक्त राष्ट्र का 60वां सदस्य बना।

1958 – फ्रांस में नया संविधान लागू हुआ।

1961 – सीरिया ने मिस्र से अलग होकर स्वतंत्र राष्ट्र का दर्जा पाया।

1994 – तुर्क सागर में एतोमिया का जलपोत डूबने से 800 लोगों की मौत।

1995 – इज़रायल और फ़िलिस्तीन के बीच वेस्ट बैंक समझौते पर हस्ताक्षर।

1997 – अमेरिकी अंतरिक्ष शटल अटलांटिस रूसी अंतरिक्ष केंद्र मीर से जुड़ा।

2000 – सिडनी ओलंपिक में 200 मीटर दौड़ में मोरियाना जोंस और केंटेरिस ने स्वर्ण पदक जीते।

2001 – अमेरिका व ब्रिटिश सेना ने अफगानिस्तान में ऑपरेशन एंड्योरिंग फ़्रीडम शुरू किया।

2003 – एक यान रूस की धरती पर सुरक्षित उतरा।

2004 – विश्व बैंक ने भारत को विश्व की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बताया।

2006 – शिंजो आबे जापान के 90वें प्रधानमंत्री बने।

2006 – थाइलैंड में सुपाचाओ पानिच पाकड़ी प्रधानमंत्री बने।

2006 – तालिबान ने लादेन के जीवित होने की घोषणा की।

2006 – फ़्रांस की चिकित्सा टीम ने शून्य गुरुत्वाकर्षण में सफल ऑपरेशन किया।

2007 – मेक्सिको में चक्रवाती तूफ़ान लोरेंजो से भारी तबाही।

2007 – नासा ने डॉन अंतरिक्ष यान का प्रक्षेपण किया।

2007 – रूस ने ईरान के खिलाफ नए प्रतिबंधों का विरोध किया।

2009 – भारतीय टेनिस खिलाड़ी सानिया मिर्ज़ा पैन पैसिफिक ओपन से बाहर हुईं।

🔹 जन्म

1838 – बहादुरशाह ज़फ़र, भारत के अंतिम मुग़ल सम्राट।

1885 – श्री नारायण चतुर्वेदी, हिंदी साहित्यकार व सरस्वती पत्रिका के संपादक।

1889 – शहीद-ए-आज़म भगत सिंह, महान स्वतंत्रता सेनानी।

1896 – रामहरख सिंह सहगल, पत्रकार और क्रांतिकारी विचारक।

1907 – जयरामदास दौंड, समाजसेवी और स्वतंत्रता सेनानी।

1909 – पी. जयराज, अभिनेता।

1921 – कल्याण मल लोढ़ा, शिक्षाविद् और साहित्यकार।

1929 – लता मंगेशकर, सुर साम्राज्ञी व ख्यातिप्राप्त गायिका।

1930 – क्रांति त्रिवेदी, प्रसिद्ध हिंदी लेखिका।

1932 – साहिर लुधियानवी, मशहूर शायर।

1949 – राजेन्द्र मल लोढ़ा, भारत के 41वें मुख्य न्यायाधीश।

1955 – कैलाश खेर, गायक।

1956 – कमलेश डी. पटेल (दाजी), आध्यात्मिक गुरु।

1982 – अभिनव बिंद्रा, ओलंपिक स्वर्ण पदक विजेता निशानेबाज़।

1982 – रणबीर कपूर, बॉलीवुड अभिनेता।

🔹 निधन

1837 – अकबर द्वितीय, मुग़ल वंश का 18वाँ बादशाह।

1895 – लुई पाश्चर, प्रसिद्ध फ्रांसीसी वैज्ञानिक।

1895 – पं. विष्णु दिगंबर पलुस्कर, संगीतज्ञ।

1953 – एडविन हब्बल, अमेरिकी खगोलशास्त्री।

1970 – आशापूर्णा देवी, लेखिका।

1983 – सी. एच. मुहम्मद कोया, केरल के पूर्व मुख्यमंत्री।

2008 – शिवप्रसाद सिंह, हिंदी साहित्यकार।

2012 – बृजेश मिश्र, भारत के पहले राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार।

2012 – वैज्ञानिक राजेश खुराना।

2015 – वीरेन डंगवाल, हिंदी के कवि।

2022 – जयंती पटनायक, सांसद और राष्ट्रीय महिला आयोग की पहली अध्यक्ष।

“जाम में कैद शहर: विकास की रफ्तार या अव्यवस्था का जाल?”

शहर का नाम लेते ही भीड़-भाड़, हॉर्न का शोर और घंटों तक खिंचता जाम आंखों के सामने आ जाता है। अब केवल महानगर ही नहीं, बल्कि छोटे और मध्यम वर्ग के शहर भी इस संकट से जूझ रहे हैं। सड़कों का चौड़ीकरण और फ्लाईओवर निर्माण के बावजूद जाम का स्थायी समाधान नहीं निकल पा रहा। सवाल यही है—गलती किसकी है? प्रशासन की योजनाओं की कमी या नागरिकों की लापरवाही?

जाम से थमती सांसें और घटता जीवन स्तर

हर सुबह ऑफिस जाने वाला कर्मचारी, स्कूल जाने वाले बच्चे, अस्पताल की ओर भागते मरीज और आम आदमी—सभी इस जाम की भेंट चढ़ते हैं। एंबुलेंस और फायर ब्रिगेड जैसी आपातकालीन सेवाएं भी अक्सर इस अव्यवस्था में फंस जाती हैं। यह समस्या सिर्फ़ समय की बर्बादी नहीं है, बल्कि प्रदूषण, मानसिक तनाव और स्वास्थ्य संकट का खतरनाक रूप ले चुकी है।

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प्रशासनिक योजनाओं की कमजोर कड़ी

विकास के नाम पर सड़कों पर गाड़ियों की संख्या बढ़ती गई, मगर ट्रैफिक प्रबंधन की योजनाएं वहीं की वहीं रह गईं।ट्रैफिक सिग्नल का तालमेल बिगड़ा हुआ है। पार्किंग की ठोस व्यवस्था नहीं है।पब्लिक ट्रांसपोर्ट की कमी ने लोगों को निजी वाहनों पर निर्भर बना दिया है।
“स्मार्ट सिटी” और “मास्टर प्लान” जैसे नारे तो खूब गूंजते हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर यह सब खोखले साबित हो जाते हैं।जनमानस की भूमिका भी उतनी ही जिम्मेदारसिर्फ़ प्रशासन को दोषी ठहराना गलत होगा। नागरिक भी उतनी ही बड़ी भूमिका निभाते हैं। सड़क किनारे अवैध तरीके से गाड़ियां खड़ी करना ट्रैफिक नियम तोड़ना लेन अनुशासन की अनदेखी करना,ओवरटेक की होड़ लगाना
यही सब सड़कों को जाम के जाल में धकेल देते हैं।
सड़कों पर कब्ज़े ने बिगाड़ी हालत
आत्मनिर्भरता और रोज़गार के नाम पर दुकानों के आगे 2-3 फीट तक सड़क पर कब्ज़ा, और उसके आगे ठेले-खोमचे वालों द्वारा 5 फीट तक व्यवसायिक प्रतिष्ठान खड़े कर दिए गए हैं। ग्राहक वहां गाड़ी खड़ी करके खरीदारी करता है, जिससे सड़क एक लेन तक सिमट जाती है। ऊपर से आड़े-तिरछे खड़े रिक्शे, ई-रिक्शे और सवारी गाड़ियां मिलकर यातायात को अव्यवस्था के दलदल में धकेल देती हैं।
‘देर आए दुरुस्त आए’—लेकिन कब तक?
हर नया फ्लाईओवर और चौड़ी सड़क कुछ वर्षों बाद फिर जाम का हिस्सा बन जाती है। यानी हम “देर आए दुरुस्त आए” के बहाने अपने जीवन की रफ्तार को थाम रहे हैं।
क्या है समाधान?

पब्लिक ट्रांसपोर्ट को मजबूत बनाना – मेट्रो, इलेक्ट्रिक बसें और साझा सवारी को बढ़ावा देना।सख्त ट्रैफिक नियम – चालान और जुर्माना सिर्फ दिखावे का न होकर वास्तव में असरदार बने।स्मार्ट ट्रैफिक सिस्टम – सेंसर आधारित सिग्नल और AI मॉनिटरिंग का इस्तेमाल।साइकिल और पैदल पथ – पर्यावरण व स्वास्थ्य दोनों के लिए लाभकारी।सड़क कब्ज़े पर रोक – ठेले-खोमचे और दुकानों द्वारा सड़क घेरने पर सख्त कार्यवाही।जन-जागरूकता – सड़क को अपनी जिम्मेदारी मानते हुए अनुशासन में चलना।
शहर का जाम केवल प्रशासन की नाकामी या नागरिकों की लापरवाही नहीं, बल्कि एक सामूहिक समस्या है। जब तक सरकार ठोस नीतियां नहीं बनाएगी और नागरिक अपनी आदतें नहीं बदलेंगे, तब तक शहर की रफ्तार जाम में कैद रहेगी। यह जाम सिर्फ हमारी गाड़ियों को नहीं, बल्कि हमारे जीवन को भी रोक रहा है। अब समय आ गया है कि हम “जिम्मेदारी और अनुशासन” को समाधान की चाबी मानें—वरना आने वाली पीढ़ियां भी इसी अव्यवस्था की कैद में रहेंगी।

“अब सोच बदलनी होगी: भ्रष्टाचार से समझौता नहीं – नई पीढ़ी को लेना होगा संकल्प

आज का भारत प्रगति के पथ पर है, लेकिन भ्रष्टाचार अब भी समाज और व्यवस्था के लिए सबसे बड़ी चुनौती बना हुआ है। चाहे सरकारी दफ्तर हों, छोटे-मोटे काम या फिर बड़े प्रोजेक्ट – रिश्वत, सिफारिश और कमीशन की जड़ें गहरी बैठ चुकी हैं। समय आ गया है कि हम इस सोच को बदलें। अब भ्रष्टाचार को “समस्या” मानकर टालना नहीं, बल्कि “जिम्मेदारी” मानकर मिटाना होगा। यही बदलती सोच भारत को नई दिशा और नई ऊँचाई दे सकती है।

कहानी
गाँव के एक छोटे से स्कूल में पढ़ने वाला नन्हा अर्जुन हर दिन अपने पिता को परेशान देखता था। उसके पिता, रामकिशन, एक मेहनती किसान थे। फसल बेचने के बाद जब वह सरकारी कार्यालय में अनुदान लेने जाते, तो उनसे हमेशा कोई न कोई अधिकारी “फाइल आगे बढ़ाने” के नाम पर पैसे मांग लेता।

रामकिशन मजबूर होकर कभी पाँच सौ, कभी हज़ार रुपये देकर घर लौटते। अर्जुन यह सब देखता और सोचता—”पिताजी ईमानदार हैं, फिर भी क्यों बार-बार इन्हें लूट लिया जाता है?”

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एक दिन स्कूल में शिक्षक ने बच्चों से पूछा—“अगर देश को बदलना है तो सबसे पहले क्या करना होगा?”
सभी बच्चे अलग-अलग जवाब देने लगे—”सड़कें बनानी होंगी”, “अस्पताल अच्छे करने होंगे”, “नौकरी बढ़ानी होगी”।
लेकिन अर्जुन खड़ा होकर बोला—“गुरुजी! अगर भ्रष्टाचार खत्म हो जाएगा, तो सड़कें भी खुद बनेंगी, अस्पताल भी अच्छे होंगे और नौकरियाँ भी मिलेंगी।”कक्षा में सन्नाटा छा गया। शिक्षक ने उसकी बात की पुष्टि करते हुए कहा—“सही कहा अर्जुन। असली आज़ादी तभी मिलेगी, जब हम भ्रष्टाचार से आज़ाद होंगे।”

पीढ़ी की बदलती सोच
आज की युवा पीढ़ी भ्रष्टाचार को जीवन का “अनिवार्य हिस्सा” नहीं मानती। पहले लोग सोचते थे—“थोड़ा बहुत चलता है।” लेकिन अब सोच बदल रही है—“एक रुपया भी गलत नहीं चलेगा।”

सरकारी योजनाओं का डिजिटलाइजेशन, ऑनलाइन भुगतान, आधार और यूपीआई जैसी तकनीकों ने भी इस सोच को नया बल दिया है। लेकिन असली बदलाव तब होगा, जब आम आदमी रिश्वत को “जिम्मेदारी से मना करने का साहस” दिखाएगा।

समाज का संकल्प
कल्पना कीजिए, यदि हर नागरिक यह ठान ले कि वह न रिश्वत देगा, न लेगा, तो स्थिति कितनी बदलेगी। छोटे-से-छोटे कदम से बड़ा आंदोलन खड़ा किया जा सकता है। जैसे—शिकायत को दबाने के बजाय सार्वजनिक मंच पर लाना।अपने बच्चों को ईमानदारी का मूल्य सिखाना।छोटे लाभ के लिए गलत समझौता न करना।

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भ्रष्टाचार सिर्फ राजनीति या सरकारी दफ्तर तक सीमित नहीं है। यह हमारे रोज़मर्रा के जीवन में भी दिखता है—परीक्षाओं में नकल से लेकर सड़क पर ट्रैफिक नियम तोड़ने तक। बदलाव वहीं से शुरू होगा जहाँ से हम इसे पहचानेंगे।

अर्जुन की तरह हर बच्चा और हर नागरिक यदि यह सोच ले कि “अब भ्रष्टाचार से समझौता नहीं होगा,” तो वह दिन दूर नहीं जब भारत एक सशक्त, पारदर्शी और ईमानदार राष्ट्र बनेगा। यह सोच सिर्फ आने वाली पीढ़ियों के भविष्य को नहीं, बल्कि पूरे देश के भाग्य को बदल देगी।

Deoria News: उड़ते ड्रोन ने उड़ाई नींद, गांवों में दहशत और अफवाहें तेज

देवरिया (राष्ट्र की परम्परा)। जिले के रुद्रपुर इलाके में पिछले एक सप्ताह से रहस्यमयी ड्रोन देखे जाने की घटनाओं ने ग्रामीणों की नींद उड़ा दी है। रात होते ही आसमान में चमकती रोशनी के साथ ड्रोन दिखाई देता है, जिससे गांवों में हड़कंप मच जाता है। लोग शोर मचाकर पुलिस को सूचना देते हैं, लेकिन पुलिस के पहुंचते ही ड्रोन गायब हो जाता है।

शुक्रवार रात नगर के पूर्वी बाईपास, श्रीनगर कोल्हुआ, अम्मा उर्फ अमवा गांव सहित कई जगहों पर लोगों ने ड्रोन देखा। इसी तरह बरडीहा दल, बरडीहा अली, गोलउथा, अहिरौली, दुबौली और एकौना थाना क्षेत्र के करहकोल, तिघरा, माझा नरायन गांव में भी ड्रोन दिखने से ग्रामीणों में दहशत फैल गई।

अफवाहों और आशंकाओं से बढ़ी चिंता

ग्रामीणों का कहना है कि अंधेरे में उड़ता यह ड्रोन कहीं चोरी या जासूसी की नीयत से तो इस्तेमाल नहीं किया जा रहा। कई गांवों में लोग पूरी रात जागकर पहरा दे रहे हैं। बरडीहा निवासी रामधारी निषाद ने बताया कि रात करीब आठ बजे उन्होंने छत से ड्रोन देखा और शोर मचाया। वहीं, प्रधान विकास सोनी और अन्य ग्रामीणों ने आशंका जताई कि यह किसी की शरारत भी हो सकती है।

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पुलिस जांच में जुटी

ड्रोन का वीडियो और फोटो लगातार सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। हालांकि पुलिस की कोशिशों के बावजूद अब तक ड्रोन उड़ाने वाले की पहचान नहीं हो सकी है। ग्रामीणों की आशंका और दहशत को देखते हुए पुलिस ने जांच तेज कर दी है।

विदेशी फर्म के नाम पर कारोबारी से ₹9.87 लाख की धोखाधड़ी, दंपती समेत 5 पर केस दर्ज

सहारनपुर (राष्ट्र की परम्परा)। स्क्रैप कारोबारी से विदेशी कंपनी के नाम पर करोड़ों की ठगी का सनसनीखेज मामला सामने आया है। थाना जनकपुरी क्षेत्र के पीड़ित ने दंपती समेत पांच लोगों पर धोखाधड़ी, मारपीट और लूटपाट का आरोप लगाया। कोर्ट के आदेश पर पुलिस ने अब सभी आरोपियों के खिलाफ केस दर्ज कर जांच शुरू कर दी है।

रोमानिया की फर्म के नाम पर ठगी

खानआलमपुरा निवासी मोहम्मद अरशद राणा, जो “भारत इंजीनियर्स” के नाम से स्क्रैप और हाउस सोल का कारोबार करते हैं, ने बताया कि अगस्त 2022 में उनकी पहचान पंकज थापर से हुई। पंकज की कंपनी Brahma Recycles SRL, रोमानिया (यूरोप) में रजिस्टर्ड है। 1 सितंबर 2022 को स्क्रैप मटेरियल सप्लाई का एग्रीमेंट हुआ, जिसके लिए कारोबारी ने ₹9,87,548 रुपये रोमानिया स्थित बैंक खाते में ट्रांसफर किए।

भुगतान के बाद भी नहीं मिला माल

पीड़ित का आरोप है कि भुगतान के बाद भी पंकज थापर ने कोई माल सप्लाई नहीं किया। भारत लौटने पर पंकज ने उसे और रुपये देने का झांसा दिया। आरोप है कि 45 लाख रुपये की मदद करने पर वह माल और भुगतान लौटाने का वादा कर रहा था।

लूटपाट और मारपीट का आरोप

पीड़ित के अनुसार, 5 सितंबर 2025 को कुछ लोग इंडस्ट्रियल एरिया, देहरादून रोड स्थित उसके कार्यालय पहुंचे और रुपयों के लेनदेन को लेकर मारपीट की। इसी दौरान आरोपियों ने उसकी गले की सोने की चेन लूट ली।

कोर्ट के आदेश पर केस दर्ज

पीड़ित ने बताया कि घटना के बाद पुलिस में शिकायत करने पर कोई कार्रवाई नहीं हुई। इसके बाद उन्होंने कोर्ट का सहारा लिया। कोर्ट के आदेश पर पुलिस ने अब पंकज थापर, नेहा थापर, निशांत कुमार और दो अज्ञात के खिलाफ केस दर्ज कर लिया है।

पुलिस का कहना है कि मामले की जांच की जा रही है और आरोपियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी।

सुप्रीम कोर्ट ने IIT मेडिकल ट्रांसफर याचिका पर जारी किया नोटिस, 10 अक्टूबर तक मांगा जवाब

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नई दिल्ली (राष्ट्र की परम्परा डेस्क)। सुप्रीम कोर्ट ने IIT खड़गपुर के एक छात्र की मेडिकल ट्रांसफर याचिका पर महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए IIT खड़गपुर, IIT दिल्ली और AIIMS को नोटिस जारी किया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि सभी पक्ष 10 अक्टूबर 2025 तक इस मामले में अपना जवाब दाखिल करें।

IIT खड़गपुर से IIT दिल्ली में ट्रांसफर की मांग

याचिका बैचलर ऑफ आर्किटेक्चर (B.Arch) प्रथम वर्ष के छात्र द्वारा दाखिल की गई है, जो Borderline Personality Disorder से पीड़ित हैं। छात्र ने मेडिकल आधार पर IIT दिल्ली में स्थानांतरण की मांग की है ताकि उन्हें दिल्ली स्थित AIIMS में निरंतर इलाज मिल सके।

छात्र का तर्क: IIT खड़गपुर में उपलब्ध नहीं आवश्यक सुविधाएं

छात्र ने अपने वकील विपिन नायर के माध्यम से कोर्ट को बताया कि IIT खड़गपुर में उनकी बीमारी के इलाज के लिए आवश्यक मेडिकल सुविधा उपलब्ध नहीं है। उन्हें Repetitive Transcranial Magnetic Stimulation (rTMS) थैरेपी की आवश्यकता है, जो केवल AIIMS दिल्ली में उपलब्ध है। साथ ही छात्र ने यह भी कहा कि दिल्ली में ट्रांसफर होने पर वह माता-पिता की देखरेख में भी रह पाएंगे।

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जीवन-रक्षक इलाज से वंचित होने का आरोप

याचिकाकर्ता ने दावा किया कि ट्रांसफर अस्वीकार किए जाने से उन्हें जीवन-रक्षक उपचार से वंचित होना पड़ा। उन्होंने कोर्ट को बताया कि अतीत में अन्य छात्रों को मेडिकल आधार पर ट्रांसफर की अनुमति मिल चुकी है।

कोर्ट से क्या मांगा गया?

याचिका में मांग की गई है कि सुप्रीम कोर्ट IIT खड़गपुर और IIT दिल्ली को आदेश दे कि वे निर्धारित इंटर-IIT ट्रांसफर नियमों के तहत छात्र का मेडिकल ट्रांसफर आवेदन दो सप्ताह के भीतर पूरा करें। साथ ही मेडिकल बोर्ड केवल AIIMS दिल्ली या IIT दिल्ली में गठित किया जाए।

यह मामला अब शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं की उपलब्धता से जुड़े एक बड़े मुद्दे को सामने ला रहा है। सभी की नजरें अब 10 अक्टूबर को आने वाले जवाब पर टिकी हैं।