Wednesday, July 1, 2026
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देवरिया में अपराधियों की सार्वजनिक पहचान से मचा हड़कंप, शहर में लगी लूट–छिनैती रोकने की नई दीवार


सुभाष चौक सहित कई सार्वजनिक स्थानों पर लगाए गए 16 शातिर अपराधियों के पोस्टर, पुलिस की कड़ी कार्रवाई से बदमाशों में हड़कंप


देवरिया(राष्ट्र की परम्परा)
शहर में बढ़ते अपराध, लूट और छिनैती की घटनाओं पर रोक लगाने के लिए देवरिया पुलिस ने एक सख्त और अनोखी पहल की है। देवरिया पुलिस अधीक्षक के निर्देश पर देवरिया सदर क्षेत्र में अपराध जगत में सक्रिय 16 कुख्यात अपराधियों की पहचान सार्वजनिक कर दी गई है। इस कदम के बाद बदमाशों में भारी खलबली मच गई है, वहीं आमजन खुद को अधिक सतर्क महसूस कर रहे हैं।

सुभाष चौक समेत शहर के अन्य प्रमुख स्थानों पर लगाए गए इन पोस्टरों में उन सभी 16 अपराधियों की स्पष्ट तस्वीरें और नाम दर्ज किए गए हैं, ताकि उनकी पहचान जनता तक सीधे और साफ रूप में पहुंच सके। सूची में शामिल नाम—
शिवा उर्फ शिव शंकर, राज यादव, राजू जायसवाल, मोनू वर्मा, रवि पटेल, सोनू डोम, शुभम बरनवाल, श्यामू चौबे, गंगेश तिवारी, अनूप तिवारी, रुस्तम अंसारी, दुर्गेश कुमार गौतम, किशन सिंह, किशन मद्धेशिया, सलमान अंसारी और शांतनु द्विवेदी—को अब पुलिस ने सार्वजनिक रूप से चिन्हित कर दिया है।

पोस्टरों के नीचे पुलिस की ओर से साफ अपील लिखी गई है—“सतर्क रहें, जनहित में विशेष पोस्टर जारी।”
इस कदम का उद्देश्य शहरवासियों को जागरूक करना और अपराधियों के खिलाफ सामाजिक दबाव बनाना है। पोस्टर ऐसे स्थानों पर लगाए गए हैं जहाँ सबसे अधिक भीड़ रहती है, ताकि हर नागरिक अपराधियों के चेहरे पहचान सके और किसी भी संदिग्ध गतिविधि पर तुरंत पुलिस को सूचना दे सके।

पुलिस की यह नई रणनीति कानून-व्यवस्था को मजबूत करने के साथ ही अपराधियों के मनोबल को तोड़ने का प्रयास है। लोगों ने भी इस कार्रवाई की सराहना करते हुए इसे अत्यंत प्रभावी कदम बताया है।

बिहार में एनडीए प्रचंड बहुमत की ओर

पटना (राष्ट्र की परम्परा डेस्क)। बिहार विधानसभा चुनाव की मतगणना शुरू होते ही एनडीए गठबंधन ने शुरुआती दौर में ही स्पष्ट बढ़त बना ली है। कुल 243 सीटों में से एनडीए लगभग 180 से 160 सीटों पर बढ़त बनाए हुए है, जो बहुमत के लिए आवश्यक 122 सीटों से काफी अधिक है। इन शुरुआती रुझानों ने गठबंधन खेमे में उत्साह का माहौल बना दिया है।
वहीं महागठबंधन शुरुआती रुझानों में पीछे चल रहा है और कई महत्वपूर्ण सीटों पर उसकी स्थिति कमजोर दिखाई दे रही है। एनडीए की बढ़त को राजनीतिक विश्लेषक कई कारणों से जोड़कर देख रहे हैं। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की राजनीतिक छवि और गठबंधन के भीतर उनकी भूमिका को एनडीए के प्रदर्शन का प्रमुख आधार माना जा रहा है। इसके साथ ही महिलाओं, पिछड़ी एवं अति-पिछड़ी जातियों में एनडीए को मजबूत समर्थन मिलने के संकेत हैं।
विकास योजनाएँ, सामाजिक कल्याण कार्यक्रम और उच्च मतदान दर भी एनडीए के पक्ष में जाते दिख रहे हैं। खासकर ग्रामीण क्षेत्रों में मतदाताओं की बड़ी संख्या ने एनडीए के लिए माहौल बेहतर बनाया है।
हालाँकि रुझान एनडीए के पक्ष में हैं, लेकिन मतगणना अभी जारी है और अंतिम परिणाम में बदलाव की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। भाजपा और जदयू के भीतर सीटों के वितरण और नेतृत्व के प्रश्न भी आगे महत्वपूर्ण रहेंगे। उधर विपक्षी महागठबंधन ने अभी हार नहीं मानी है और अंतिम परिणाम तक किसी भी प्रकार के अप्रत्याशित बदलाव की संभावना देख रहा है।
अगर ये रुझान अंतिम नतीजों में भी बरकरार रहते हैं, तो बिहार में एक बार फिर एनडीए सरकार बनने के संकेत मिल रहे हैं। आने वाले दिनों में विकास, उद्योग, रोजगार और कल्याणकारी योजनाओं को लेकर जनता की अपेक्षाएँ भी बढ़ेंगी। वहीं विपक्ष के सामने रणनीति के पुनर्गठन और संगठन को मजबूत करने की चुनौती होगी।

“बिहार में सत्ता की दस्तक: रुझानों ने खोला रास्ता, एनडीए बहुमत की चौखट पर”

बिहार/पटना (राष्ट्र की परम्परा)

बिहार विधानसभा चुनाव 2025 की मतगणना ने राजनीतिक माहौल में नई हलचल पैदा कर दी है। शुरुआती रुझानों के साथ ही सत्ता की तस्वीर लगभग स्पष्ट होती दिख रही है। जिस तेजी और मजबूती के साथ एनडीए सीटों पर बढ़त मज़बूत कर रहा है, उसने राज्य की भावी सरकार की दिशा लगभग तय कर दी है। मुकाबला भले ही त्रिकोणीय रहा हो, लेकिन शुरुआती वोट ट्रेंड यह संकेत दे रहे हैं कि बिहार की कुर्सी पर एनडीए की वापसी लगभग सुनिश्चित होती दिखाई दे रही है।

बिहार चुनाव 2025 की मतगणना शुरू होते ही राजनीतिक मैदान में उत्सुकता अपने चरम पर पहुंच गई। मतगणना केंद्रों से आते प्रारंभिक आंकड़ों ने यह साफ कर दिया है कि राज्य में इस बार का जनादेश किस ओर झुक रहा है। एनडीए लगातार उन सीटों पर बढ़त बनाए हुए है, जो बहुमत की दहलीज को पार करने के लिए जरूरी मानी जा रही थीं।

243 सीटों वाली बिहार विधानसभा में सरकार बनाने के लिए 122 सीटों का जादुई आंकड़ा चाहिए। ताज़ा रुझानों के अनुसार एनडीए इस संख्या के बेहद करीब पहुँच गया है और कई जगहों पर उसकी लीड स्थिर हो कर मजबूत बहुमत का संकेत दे रही है। इन रुझानों ने विपक्षी महागठबंधन की उम्मीदों को सीमित कर दिया है और हवा का रुख साफ तौर पर एनडीए की ओर बहता दिखाई दे रहा है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि विकास-एजेंडा, नेतृत्व की स्थिरता और उम्मीदवारों का स्थानीय प्रभाव इस बार एनडीए के पक्ष में निर्णायक कारक बनकर उभरे हैं। ग्रामीण और शहरी दोनों इलाकों के वोटरों की पसंद में एक समान झुकाव दिखाई दे रहा है, जो एनडीए की सीटों में तेजी से बढ़त के रूप में सामने आया है।

मतगणना अभी जारी है, लेकिन जो ट्रेंड अब तक सामने आ रहे हैं, वे इस ओर संकेत करते हैं कि बिहार की सत्ता की चाबी एक बार फिर एनडीए के हाथों में जाने वाली है। सभी की निगाहें अब अंतिम नतीजों पर टिकी हैं, लेकिन राजनीतिक हवा लगभग साफ हो चुकी है—बिहार में एनडीए की सरकार बनना तय-सा दिख रहा है।

“हाँ हम बिहारी हैं जी” बना चुनावी पर्व की शान, सोशल मीडिया पर मचा धमाल

विदेश में रहकर भी माटी से जुड़े शैलेन्द्र, बिहारी गौरव गीत ने जीता करोड़ों दिल

सलेमपुर/देवरिया(राष्ट्र की परम्परा)

देवरिया जिले के सलेमपुर तहसील अंतर्गत चांदपालिया गाँव के युवा प्रतिभा शैलेन्द्र द्विवेदी ने बिहार विधानसभा चुनाव के बीच ऐसा गीत प्रस्तुत किया जिसने प्रदेश ही नहीं, पूरे देश में धूम मचा दी। उनके गीत “माटी को सोना करने वाली कलाकारी है जी… हाँ हम बिहारी हैं जी, थोड़े संस्कारी हैं जी…” ने न केवल सोशल मीडिया पर तहलका मचा दिया, बल्कि बिहार की संस्कृति, भावनाओं और स्वाभिमान को भी नए अंदाज़ में सामने रखा।

देवरिया के शैलेन्द्र द्विवेदी का बनाया गीत बिहार चुनाव में छाया, “हाँ हम बिहारी हैं जी” बना नई पहचान”

मिट्टी से जुड़ाव ने बनाया ‘भोजपुरी का दूत’

शैलेन्द्र द्विवेदी ने बी.टेक करने के बाद सिंगापुर की प्रतिष्ठित कंपनी में नौकरी शुरू की। विदेश में रहना जितना चुनौतीपूर्ण होता है, उतना ही अपनी मिट्टी से दूर रहना भावुक भी करता है। लेकिन शैलेन्द्र अपने गाँव, अपनी भाषा और अपनी बोली—भोजपुरी—से कभी दूर नहीं हुए।
सिंगापुर में रहते हुए भी उन्होंने भोजपुरी भाषा के उत्थान को मिशन बनाकर लगातार ऐसे गीत लिखे और बनवाए जो समाज, संस्कृति और संस्कार का प्रतिनिधित्व करें।

भोजपुरी को फूहड़ता से बाहर निकालने का प्रयास

आज जब भोजपुरी गानों की छवि अक्सर फूहड़ता से जोड़ दी जाती है, वहीं शैलेन्द्र द्विवेदी ने इस सोच को बदलने का बीड़ा उठाया। उनके द्वारा बनाए गए गीतों में संस्कृति, मर्यादा और अपनी जड़ों से प्रेम झलकता है।
उनके हर गीत में एक संदेश, एक भाव, और एक सौम्यता होती है, जिसने देश-विदेश के दर्शकों का दिल जीता।

बिहार चुनाव में गीत बना आवाज़

बिहार चुनाव 2025 के दौरान शैलेन्द्र के गीत
“हाँ हम बिहारी हैं जी”
ने माहौल में जोश भर दिया। बिहार की मिट्टी, मेहनत, संघर्ष और प्रतिभा का सुंदर चित्रण करने वाला यह गीत चुनावी रैलियों से लेकर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म तक हर जगह छा गया।

इस गीत की टीम भी बेहद मजबूत रही—गीत निर्माता : शैलेन्द्र द्विवेदी,गीत लेखक : अतुल कुमार राय,गायक : मनोज तिवारी ‘मृदुल’,संगीत : मधुकर आनंद

मनोज तिवारी की सुरीली आवाज़ और मधुकर आनंद के संगीत ने गीत को और भी ऊर्जा से भर दिया, जबकि शैलेन्द्र द्विवेदी की सोच और संकल्प ने इसे एक सांस्कृतिक पहचान बना दिया।

देश-विदेश में मिली सराहना

यह गीत बिहार की पहचान, बिहारी गौरव और लोक-संस्कृति का जीवंत प्रतीक बनकर उभरा। लाखों दर्शकों ने इसे सुना, साझा किया और इसकी तारीफ की। प्रवासी बिहारी समुदाय ने भी इस गीत को अपने ‘दिल की आवाज़’ बताया।

भविष्य में भी भोजपुरी को नई ऊँचाइयों तक ले जाने का संकल्प

शैलेन्द्र द्विवेदी का कहना है कि वे आगे भी भोजपुरी भाषा को वैश्विक मंच तक ले जाने के लिए काम करते रहेंगे। उनका सपना है कि भोजपुरी को वह सम्मान मिले जिसकी वह सच्चे अर्थों में हकदार है।

चुनावी अपडेट — बिहार विधानसभा चुनाव 2025

एनडीए की बड़ी बढ़त, महागठबंधन पीछे; मुकाबले की तस्वीर और साफ

बिहार (राष्ट्र की परम्परा)। बिहार विधानसभा चुनाव 2025 की मतगणना जारी है और शुरुआती रुझानों ने राज्य की राजनीति में नई हलचल पैदा कर दी है। गिनती के शुरुआती दौर से ही National Democratic Alliance (एनडीए) ने बढ़त बनाकर मुकाबले पर पकड़ मजबूत कर ली है।

तेजस्वी यादव के नेतृत्व वाले महागठबंधन को कई सीटों पर लाभ जरूर मिला है, लेकिन अब तक वे उस स्तर पर बढ़त नहीं बना सके हैं जिसकी उम्मीद उनके समर्थक कर रहे थे।

अधिकांश सर्वेक्षणों एवं एग्जिट पोल ने एनडीए के लिए 120 से 150 सीटें संभावित बताई थीं, जबकि महागठबंधन के लिए यह अनुमान 70-100 सीटों तक सीमित था।
वहीं इस बार मतदान में भी जनता का उत्साह चरम पर रहा और कुल लगभग 67% वोटिंग दर्ज की गई।


एनडीए क्यों मजबूत दिख रहा है?

एनडीए ने सामाजिक कल्याण योजनाओं, बेहतर प्रशासन (Good Governance) और मजबूत संगठन-तंत्र के दम पर अपनी पकड़ ग्रामीण से शहरी इलाकों तक बनाई। शुरुआती रुझानों से साफ है कि गठबंधन 2020 के प्रदर्शन से आगे निकलने के लक्ष्य की ओर बढ़ रहा है।

महागठबंधन की चुनौतियाँ

सीट-बंटवारे में असहमति, रणनीति पर एकरूपता की कमी और कई क्षेत्रों में संगठनात्मक ढील महागठबंधन के सामने बड़ी चुनौतियों के रूप में उभरकर आई हैं। उनका जनाधार कई इलाकों में सक्रिय तो दिखा, लेकिन पूरे राज्य में एक तरंग पैदा करने में पूरी तरह सफल नहीं हो सका।


सामाजिक समीकरण और वोटिंग पैटर्न

बिहार की राजनीति में जातिगत व क्षेत्रीय समीकरण सदैव निर्णायक रहे हैं। पिछड़ा वर्ग, अल्पसंख्यक, युवा वोटर और ग्रामीण तबके का रुझान इस बार तय करेगा कि सत्ता की कुर्सी किस गठबंधन के पास जाएगी।
इस बार एनडीए इन सभी बड़े वोट बैंक में अनुशासन व पकड़ मजबूत बनाए हुए दिखाई दे रहा है।


ग्रामीण आकांक्षाएँ और मुद्दे

किसानी, रोजगार, शिक्षा व स्वास्थ्य जैसे मुद्दे इस चुनाव में केंद्र में रहे। महागठबंधन ने परिवर्तन का नारा जरूर दिया, लेकिन इसे राज्यभर में एक बड़े आंदोलन के रूप में परिवर्तित नहीं कर पाया।


बहुमत का आंकड़ा और रुझान

243 सदस्यीय विधानसभा में 122 सीटें बहुमत के लिए आवश्यक हैं।
शुरुआती रुझान बदल सकते हैं, लेकिन फिलहाल तस्वीर काफी स्पष्ट होती दिख रही है।

ताज़ा रुझानों के अनुसार:

एनडीए गठबंधन — 152 सीटों पर आगे

महागठबंधन — 79 सीटों पर आगे

अन्य — 11 सीटों पर आगे

इन आंकड़ों के आधार पर एनडीए स्पष्ट बहुमत की स्थिति में पहुंचता दिख रहा है। यदि यह रुझान स्थिर रहा, तो एनडीए एक बार फिर सत्ता में वापसी करता दिखाई दे रहा है।


राजनीतिक प्रभाव

इस चुनाव का असर सिर्फ बिहार तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि राष्ट्रीय राजनीति—खासतौर से आगामी लोकसभा चुनावों—पर भी इसका बड़ा प्रभाव पड़ेगा। दोनों गठबंधन इसे 2026 की रणनीति तैयार करने के लिए एक महत्वपूर्ण पड़ाव मान रहे हैं।

चुनावी अपडेट — बिहार विधानसभा चुनाव 2025आज के रुझानों को देखते हुए National Democratic Alliance (एनडीए) और महागठबंधन के बीच चल रही मुकाबले की तस्वीर कुछ इस तरह बन रही है

बिहार/पटना (राष्ट्र की परम्परा)
गिनती शुरू होते ही एनडीए ने शुरुआती बढ़त पकड़ी है।

तेजस्वी यादव के नेतृत्व वाले महागठबंधन को अपने पाले में कुछ सीटें मिलती दिख रही हैं, लेकिन स्थिति पूरी तरह उनके पक्ष में नहीं घूम पाई है।

अधिकांश सर्वेक्षणों एवं एग्जिट पोल ने एनडीए को 120 से 150 सीटों के बीच आने की संभावना जताई है, जबकि महागठबंधन के लिए अनुमान 70-100 सीटों के आसपास रहे हैं।

मतदान में भागीदारी भी रिकॉर्ड रही — कुल वोटिंग लगभग 67% के आसपास रही।

कौन किस पर भारी पड़ता दिख रहा है

एनडीए की मजबूती:
एनडीए ने सोशल-वेलफेयर योजनाओं, अच्छे शासन (गुड गवर्नेंस) के संदेश और अपने मजबूत संगठन-जाल के माध्यम से अपनी पकड़ मजबूत की है। शुरुआती बढ़त इसके संकेत दे रही है कि वह इस बार अपने 2020 के प्रदर्शन से आगे निकलने का लक्ष्य रखेगा।

महागठबंधन की चुनौतियाँ:
महागठबंधन के लिए सीट-बंटवारे, गठबंधन-सामंजस्य और अपना देशी एजेंडा पूरे राज्य में मजबूती से पेश करना चुनौतिपूर्ण रहा है। जबकि कुछ क्षेत्रों में उनका जनाधार ज़ोर पकड़ रहा है, लेकिन यह उस तरह फैल नहीं पाया है जिससे एनडीए के खिलाफ बड़े दल के रूप में असर दिख सके।

वोट बैंक व क्षेत्रीय समीकरण:
बिहार में जातिगत, क्षेत्रीय व सामाजिक समीकरण का असर प्रत्यक्ष है। पिछड़े एवं अल्पसंख्यक वर्ग, पुरानी राजनीतिक धड़ाएं, तथा नए वोटर्स — इन सबका रुझान इस बार निर्णायक होगा। एनडीए को इन श्रेणियों में अनुशासन बनाए रखने में सफलता मिलती दिख रही है।

किसानी-क्षेत्र व आकांक्षाएँ:
ग्रामीण-क्षेत्र में बदलती आकांक्षाएँ, रोजगार-मुद्दा, शिक्षा-स्वास्थ्य से जुड़े वादे, ये सभी इस चुनाव में बड़े रोल निभा रहे हैं। महागठबंधन को इस मोर्चे पर ‘परिवर्तन’ का एजेंडा थामना था, लेकिन अपना पूरा ताप एवं विस्तार हासिल नहीं कर पाया है।

अभी तक की रुझान प्रारम्भिक है — गिनती जारी है, अंतिम परिणाम अभी तय नहीं। शुरुआती बढ़त समय-सापेक्ष बदल भी सकती है।

243 सीटों वाले विधानसभा में 122 सीटें सरकार बनाने के लिए न्यूनतम बहुमत की संख्या है।

यदि एनडीए ने 120+ सीटों की ओर बढ़त बनाई है, तो उसकी सरकार फिर से बनेगी; दूसरी ओर, महागठबंधन के लिए 100+ सीटें भी बड़ी सफलता मानी जाएँगी।

अंतिम परिणाम आने तक क्षेत्र-वार, विधानसभा-वार ट्रेंड्स पर नजर रखना ज़रूरी होगा — क्योंकि कुछ ज़िले, कुछ सीटें ‘स्विंग’ कर सकती हैं।

इस चुनाव परिणाम का असर सिर्फ राज्य-स्तर पर नहीं, बल्कि राष्ट्रीय राजनीति में भी देखा जा रहा है — यह देखें कि कैसे दोनों गठबंधन आगामी लोकसभा-चुनाव और राष्ट्रीय स्ट्रैटेजी के लिए इस परिणाम को पड़ाव मानेंगे।

इस वक्त की तस्वीर यह है कि एनडीए वर्तमान में आगे दिख रहा है, और ऐसा लगता है कि उसे इस बार वरीयता-विहीन जीत मिल सकती है। महागठबंधन के लिए यह ‘प्लान बी’ नहीं बल्कि ‘प्लान ए’ समय था — लेकिन फिलहाल वह एनडीए के मुकाबले पीछे नजर आ रहा है।
हालाँकि, राजनीतिक मुठभेड़ में आखिरी दौर तक सब खुला होता है। आने वाला समय बतायेगा कि बिहार का मतदाता किसे भरोसा देता है — और किस गठबंधन व कौन-से नेतृत्व पर भारी पड़ता है।

बिहार विधानसभा चुनाव 2025: 14 नवंबर को निर्णायक मतगणना जारी , कई वीवीआईपी सीटों पर टकराव चरम पर

पटना(राष्ट्र की परम्परा)। बिहार की 18वीं विधानसभा के गठन की उलटी गिनती शुरू हो चुकी है। 6 और 11 नवंबर को दो चरणों में शांतिपूर्ण मतदान के बाद अब 14 नवंबर को राज्य की 243 विधानसभा सीटों पर मतगणना होगी। सुबह 8 बजे से 38 जिलों के 46 मतगणना केंद्रों पर वोटों की गिनती शुरू होगी। इस बार मुकाबला राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) और महागठबंधन के बीच बेहद रोमांचक माना जा रहा है। दोनों चरणों में 65 प्रतिशत से ज्यादा मतदान ने मुकाबले को और दिलचस्प बना दिया है।

चुनाव में कई नए दलों ने भी पहली बार मैदान में उतरकर मुकाबले को बहुआयामी ​बना दिया है। प्रशांत किशोर की जन सुराज और तेज प्रताप यादव की जन शक्ति जनता दल (JJD) चर्चाओं में रहे। वहीं NDA में भाजपा, जदयू, लोजपा (रामविलास), राष्ट्रीय लोक मोर्चा और HAM शामिल रहे। दूसरी तरफ महागठबंधन ने राजद, कांग्रेस, वाम मोर्चा, वीआईपी और IIP के साथ मिलकर व्यापक मोर्चा बनाया।

माहौल को और गर्माने वाली बात यह है कि महागठबंधन ने जहाँ 252 उम्मीदवार उतारे, वहीं एनडीए 242 सीटों पर मुकाबले में उतरा। तेजस्वी यादव को महागठबंधन ने सीएम चेहरा घोषित किया, जबकि एनडीए ने चुनाव मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के नेतृत्व में लड़ने का दावा किया।

कई हाई-प्रोफाइल सीटों पर निगाहें टिकीं

दानापुर, मनेर, छपरा, फुलवारी, तारापुर, पटना साहिब, लखीसराय, महुआ, राघोपुर, मोकामा, काराकाट, लालगंज, रघुनाथपुर, नालंदा, मुजफ्फरपुर, सीवान, अलीनगर और कुम्हरार ऐसी सीटें हैं जहां मुकाबला बेहद करीबी माना जा रहा है।
राघोपुर में तेजस्वी यादव का मुकाबला एनडीए के सतीश कुमार यादव और JSP के चंचल सिंह से है। वहीं मोकामा में अनंत सिंह और सूरजभान सिंह की भिड़ंत भी सुर्खियों में है।
अलीनगर में मैथिली ठाकुर की बढ़त की खबरें पहले ही राजनीतिक हलचल बढ़ा चुकी हैं।

पोस्टल बैलेट से शुरुआती रुझान

सूत्रों के अनुसार पोस्टल बैलेट की शुरुआती गिनती में मैथिली ठाकुर, अनंत सिंह और तेजस्वी यादव को बढ़त मिलती दिख रही है।

कोदईपुर के प्राथमिक विद्यालय में विवादित शिक्षिका हुई निलंबित

नीरज कुमार मिश्रा की आईजीआरएस शिकायत संख्या 40018725025213 के आधार पर हुई कार्यवाही

महराजगंज(राष्ट्र की परम्परा)।सदर विकासखंड के ग्राम पंचायत बागापार टोला कोदईपुर के प्राथमिक विद्यालय में शिक्षिका और शिक्षामित्र के बीच विवाद ने विद्यालय की स्थिति बिगाड़ दी। बच्चों की पढ़ाई ठप हो गई थी, जबकि ग्रामीणों में आक्रोश व्याप्त है।
प्राप्त समाचार के अनुसार17 अक्टूबर को मीडिया टीम ने जब विद्यालय का हाल जाना तो शिक्षिका रीना कन्नौजिया अनुपस्थित मिलीं। विद्यालय में पंजीकृत 47 बच्चों में से केवल 12 ही उपस्थित पाए गए। 25 अक्टूबर को पुनः जब टीम दोबारा पहुंची तो विद्यालय पर ताला लटका मिला। रसोईया सीमा यादव ने बताया कि शिक्षिका और शिक्षामित्र दोनों की अनुपस्थिति से विद्यालय बंद करना पड़ा। शिक्षामित्र राधा पांडेय बीमार हैं और ऑनलाइन अवकाश पर हैं, जबकि शिक्षिका लगातार अनुपस्थित हैं। वहीं ग्रामीणों ने बताया कि शिक्षिका का व्यवहार ठीक नहीं है और इससे बच्चों की शिक्षा पर गहरा असर पड़ रहा है। कई बार मिड-डे मील भी समय से नहीं बनता, जिससे बच्चे भूखे घर लौट जाते हैं।
ग्रामीणों ने जिलाधिकारी से जांच कर कठोर कार्रवाई की मांग की थी।इस बीच, जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी रिद्धि पांडेय ने कार्रवाई करते हुए शिक्षिका रीना कन्नौजिया को निलंबित कर दिया है। बीएसए कार्यालय से जारी पत्र पत्रांक 14164-65 /2025-26 दिनांक 11 नवम्बर 2025 में उल्लेख किया गया है कि शिकायतकर्ता नीरज कुमार मिश्रा की आईजीआरएस शिकायत संख्या 40018725025213 के आधार पर यह कार्रवाई की गई है।ग्रामीणों ने कहा कि अब विद्यालय की व्यवस्था दुरुस्त कर बच्चों की पढ़ाई दोबारा शुरू कराई जाए, ताकि शिक्षा का माहौल वापस लौट सके।

बिहार विधानसभा चुनाव 2025: मतगणना शुरू, सुरक्षा कड़ी – ऐतिहासिक मतदान के बाद तय होगी सत्ता की नई दिशा

पटना (राष्ट्र की परम्परा डेस्क)बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के लिए शुक्रवार सुबह से मतगणना की प्रक्रिया शुरू होते ही पूरे राज्य में राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। दो चरणों—6 और 11 नवंबर—में हुए मतदान ने इस बार इतिहास रचा है। चुनाव आयोग के अनुसार, स्वतंत्रता के बाद के बिहार के चुनावी इतिहास में सबसे अधिक मतदान इस चुनाव में दर्ज किया गया है।

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मतगणना केंद्रों पर सुरक्षा के कड़े प्रबंध किए गए हैं। पटना, गया, लखीसराय सहित सभी जिलों में सुरक्षाकर्मी तैनात कर दिए गए हैं। प्रत्येक केंद्र पर धारा-144 लागू है और किसी भी प्रकार की अव्यवस्था रोकने के लिए पुलिस व प्रशासन मुस्तैद है। लखीसराय से चुनाव लड़ रहे बिहार के उपमुख्यमंत्री विजय सिन्हा मतगणना शुरू होने से पहले मंदिर में पूजा-अर्चना कर पहुंचे, जहां उन्होंने जीत की कामना की।

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रिकॉर्ड मतदान ने बढ़ाई सभी की उत्सुकता – बिहार ने इस बार मतदान के नए कीर्तिमान बनाए हैं।पहले चरण में मतदान प्रतिशत: 65.06% दूसरे चरण में रिकॉर्ड मतदान प्रतिशत: 68.76% कुल औसत मतदान: 66.91% यह 1951 के बाद से अब तक का सबसे अधिक मतदान है, जिससे इस चुनाव में जनता की अभूतपूर्व सहभागिता झलकती है।

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एनडीए और महागठबंधन के बीच सीधी टक्कर

मुख्य मुकाबला इस बार भी राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) और महागठबंधन के बीच है। एनडीए में भाजपा, जेडीयू, लोजपा (रामविलास), हम (सेक्युलर) और राष्ट्रीय लोक मोर्चा शामिल हैं। वहीं महागठबंधन में आरजेडी, कांग्रेस, सीपीआई-एमएल, सीपीआई, सीपीएम और वीआईपी शामिल हैं। इसके साथ ही प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी भी 243 सीटों पर चुनाव लड़कर मुकाबले को त्रिकोणीय बनाने का प्रयास कर रही है।

पटना में भाजपा कार्यकर्ताओं ने हनुमान मंदिर में विशेष पूजा की और एनडीए के प्रचंड बहुमत की कामना की। कार्यकर्ताओं का दावा है कि जनता के आशीर्वाद से गठबंधन 175 से 200 सीटें जीत सकता है।

मतगणना के प्रारंभिक रुझान आने के साथ ही राजनीतिक दलों के मुख्यालयों में हलचल बढ़ गई है और सभी की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि क्या बिहार में सत्ता की वापसी होगी या नई राजनीतिक दिशा तय होगी।

प्रथम प्रधानमंत्री पंडित नेहरू: विज्ञान, आधुनिकता और प्रगति के पथप्रदर्शक

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पुनीत मिश्र

भारत के इतिहास में 14 नवम्बर केवल एक तिथि नहीं, बल्कि आधुनिक भारत की नींव रखने वाले प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू की स्मृति का गौरवपूर्ण दिवस है। राष्ट्र उन्हें केवल एक राजनेता के रूप में नहीं, बल्कि उस दूरदर्शी विचारक के रूप में याद करता है जिसने स्वतंत्र भारत को वैज्ञानिक सोच, प्रगतिशील नीतियों और आधुनिक दृष्टिकोण की दिशा दिखायी।
पंडित नेहरू का जन्म 1889 में इलाहाबाद में एक प्रतिष्ठित परिवार में हुआ। इंग्लैंड में शिक्षा प्राप्त करने के बाद भी उनका मन मातृभूमि की दासता से व्यथित रहा। महात्मा गांधी के आह्वान पर उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन में कदम रखा और जल्द ही वे कांग्रेस के प्रमुख नेताओं में शामिल हो गए। असहयोग आंदोलन, सविनय अवज्ञा, नमक सत्याग्रह और किसानों-मजदूरों के मुद्दों को लेकर उनके संघर्षों ने उन्हें जनता के बीच लोकप्रिय बना दिया। कई बार जेल की यातनाओं के बावजूद नेहरू की प्रतिबद्धता अडिग रही।
15 अगस्त 1947 को स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री के रूप में उन्होंने एक नवजात राष्ट्र को संभालने की ऐतिहासिक जिम्मेदारी उठाई। विभाजन की पीड़ा, आर्थिक संकट, सामाजिक विविधता और सीमित संसाधनों के बीच उन्होंने लोकतांत्रिक व्यवस्था को मजबूत आधार देने का काम किया। संसद, न्यायपालिका, प्रेस की स्वतंत्रता और नागरिक अधिकारों को संरक्षित करने में उनका योगदान अमूल्य रहा।
पंडित नेहरू नेहरू का सबसे बड़ा सपना थाI एक आधुनिक और वैज्ञानिक भारत। उनका विश्वास था कि विज्ञान ही देश को प्रगति की ओर ले जा सकता है। भारी उद्योगों, आईआईटी, डीआरडीओ, वैज्ञानिक अनुसंधान संस्थानों, अंतरिक्ष और परमाणु ऊर्जा कार्यक्रमों की नींव उनके कार्यकाल में रखी गई। भाखड़ा नंगल और दमोड़र घाटी जैसी परियोजनाओं को उन्होंने आधुनिक भारत के ‘मंदिर’ कहा। इन परियोजनाओं ने भारत को न केवल ऊर्जा बल्कि आत्मनिर्भरता की राह दिखाई।
अंतरराष्ट्रीय मंच पर भी नेहरू ने भारत की पहचान को नए स्तर पर स्थापित किया। शीत युद्ध के दौर में उन्होंने गुटनिरपेक्ष नीति अपनाकर भारत को स्वतंत्र कूटनीतिक दृष्टिकोण दिया। यह नीति आज भी भारत की विदेश नीति का आधार मानी जाती है।
बच्चों के प्रति उनका स्नेह पूरे देश में चर्चित रहा। उनकी सरलता, मधुरता और मासूमियत के प्रति प्रेम के कारण उन्हें ‘चाचा नेहरू’ कहा गया। इसी वजह से उनकी जयंती को ‘बाल दिवस’ के रूप में मनाया जाता है, जो बच्चों के अधिकारों, शिक्षा और सुरक्षित भविष्य के प्रति जागरूकता का प्रतीक है।
आज नेहरू जयंती हमें यह याद दिलाती है कि आधुनिक भारत की मजबूत संरचना किसी एक दिन में नहीं बनी, बल्कि दशकों की सोच, परिश्रम और दूरदृष्टि का परिणाम है। पंडित नेहरू की वैज्ञानिक दृष्टि, लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति आस्था और प्रगतिशील नीतियां आज भी भारत की विकास यात्रा को प्रेरित करती हैं। उनकी विरासत इतिहास के पन्नों में ही नहीं, बल्कि भारत की हर प्रगति में दिखाई देती है।

14 नवंबर 1962: जब संसद ने चीन से हर इंच भूमि वापस लाने की प्रतिज्ञा ली

नवनीत मिश्र

भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में कुछ तिथियाँ केवल घटनाओं की याद नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्वाभिमान और एकता के प्रतीक के रूप में दर्ज होती हैं। 14 नवंबर 1962 ऐसी ही तारीख है, जब चीन के विस्तारवादी आक्रमण के बीच भारतीय संसद ने एक सुर में वह संकल्प लिया, जिसने पूरी दुनिया को भारत की दृढ़ इच्छाशक्ति का संदेश दिया। यह वह दिन था, जिसने साबित किया कि संकट कितना ही बड़ा हो, भारत अपनी जमीन और सम्मान की रक्षा के लिए एकजुट होकर खड़ा होता है।
1950 के दशक में तिब्बत पर कब्जा जमा लेने के बाद चीन की निगाहें भारतीय सीमाओं पर थीं। पंचशील समझौते और शांति की बातों के बीच चीनी सेना धीरे–धीरे लद्दाख और उत्तर–पूर्व के इलाकों में घुसपैठ बढ़ाती रही। अंततः अक्टूबर 1962 में चीन ने अचानक हमला कर दिया। प्रयाप्त तैयारी न होने के बावजूद भारतीय जवानों ने अदम्य साहस दिखाया, लेकिन चीन ने हजारों वर्ग मील क्षेत्र पर कब्जा कर लिया।
स्थिति जितनी गंभीर थी, उतना ही देश का मनोबल टूटने की कगार पर था। ऐसे समय में राष्ट्र को दिशा देने की जिम्मेदारी संसद पर थी।
इसी संकट की घड़ी में 14 नवंबर 1962 को भारतीय संसद का संयुक्त सत्र बुलाया गया। वातावरण भारी थाl चिंता, पीड़ा और आक्रोश सब एक साथ मौजूद थे। उसी दिन सर्वसम्मति से एक ऐसा प्रस्ताव पारित किया गया, जिसे आज भी राष्ट्रीय संकल्प की मिसाल माना जाता है।
प्रस्ताव में कहा गया कि “भारत की संसद प्रतिज्ञा करती है कि चीन ने भारत की जिस एक–एक इंच भूमि पर कब्जा किया है, उसे वापस लिए बिना चैन से नहीं बैठेंगे।”
यह केवल शब्दों का संग्रह नहीं था, बल्कि एक ऐसे राष्ट्र की भावना थी, जो अपने सम्मान और अखंडता को सर्वोपरि मानता है। इस प्रस्ताव में न किसी दल का मतभेद था, न किसी विचारधारा की दूरी, सिर्फ भारत की आवाज थी।
इस प्रस्ताव का महत्व इसलिए भी अधिक था क्योंकि यह राजनीतिक विभाजन से ऊपर उठकर लिया गया निर्णय था। युद्धकाल की कठिन परिस्थितियों में संसद का ऐसा सामूहिक संकल्प सेना के मनोबल को मजबूती देने वाला साबित हुआ। यह स्पष्ट संदेश था कि भारत किसी भी परिस्थिति में अपनी जमीन के साथ समझौता नहीं करेगा।
1962 के युद्ध की पीड़ा गहरी थी, लेकिन उसने भारत को अपनी रक्षा नीति पर नए सिरे से सोचने के लिए मजबूर किया। सेना के आधुनिकीकरण, सीमा प्रबंधन, नए रक्षा ढांचे और कूटनीतिक रणनीतियों को मजबूत करने की प्रक्रिया तेज हुई। राष्ट्र ने यह समझ लिया कि सुरक्षा और तैयारी किसी भी शांति–नीति का अनिवार्य हिस्सा हैं।
आज भी प्रासंगिक है 14 नवंबर का संदेश दशक बीत गए, लेकिन 14 नवंबर 1962 का प्रस्ताव आज भी राष्ट्रीय चेतना का हिस्सा है। यह हमें याद दिलाता है कि भारत शांतिप्रिय जरूर है, पर अपनी सीमाओं की रक्षा के लिए सदैव तत्पर और दृढ़ है।
वर्तमान वैश्विक परिस्थितियों में जब सुरक्षा चुनौतियाँ लगातार बदल रही हैं, यह संकल्प और भी महत्वपूर्ण हो जाता है।
14 नवंबर 1962 का संसदीय संकल्प भारत की लोकतांत्रिक ताकत, राष्ट्रीय एकता और आत्मसम्मान का प्रतीक है। संसद ने उस दिन जो प्रतिज्ञा ली थी, वह सिर्फ तत्कालीन युद्धकाल के लिए नहीं, बल्कि भारत की आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा बन गई।
यह संकल्प आज भी हमें यही संदेश देता है कि राष्ट्र की भूमि और सम्मान से बड़ा कुछ नहीं, और भारत इसके लिए हर परिस्थिति में एकजुट खड़ा रहेगा।

जब इतिहास झुका इन अमर आत्माओं के सामने

💐 13 नवंबर के अमर प्रेरणा स्तंभ: जिन्होंने अपने कर्मों से इतिहास के पन्नों पर अमिट छाप छोड़ी


इतिहास केवल घटनाओं का क्रम नहीं, बल्कि उन व्यक्तित्वों का दस्तावेज़ है जिन्होंने अपने कर्म, विचार और योगदान से मानवता के हृदय पर गहरी छाप छोड़ी। 13 नवंबर का दिन भी ऐसे कई महान आत्माओं को याद करने का दिन है, जिन्होंने विभिन्न क्षेत्रों में अपना अमूल्य योगदान देकर भारत ही नहीं, पूरी दुनिया को दिशा दी। आइए जानते हैं उन प्रेरक हस्तियों के बारे में, जिनका निधन 13 नवंबर को हुआ था —

  1. सत्यव्रत शास्त्री (1920–2021): संस्कृत के शिखर पुरुष
    सत्यव्रत शास्त्री संस्कृत भाषा के ऐसे मनीषी थे जिन्होंने आधुनिक युग में भी इस प्राचीन भाषा को जीवंत बनाए रखा। उनकी रचनाएँ केवल साहित्यिक सौंदर्य का उदाहरण नहीं हैं, बल्कि उनमें भारतीय संस्कृति की आत्मा बसी हुई है। उन्हें ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया, जो उनके विद्वतापूर्ण योगदान की पहचान है। शास्त्रीजी ने संस्कृत को जनमानस की भाषा बनाने का जो प्रयास किया, वह आज भी प्रेरणास्रोत है। उनके लेखन में भाषा की मर्यादा और भावनाओं की गहराई का अद्भुत संगम देखने को मिलता है।
  2. शरद कुमार दीक्षित (1936–2011): मानवता के सच्चे चिकित्सक
    भारतीय मूल के अमेरिकी प्लास्टिक सर्जन डॉ. शरद कुमार दीक्षित चिकित्सा जगत में समर्पण और संवेदना के प्रतीक थे। उन्होंने हज़ारों गरीब और ज़रूरतमंद बच्चों की मुफ्त सर्जरी की, जिनके चेहरे पर जन्मजात विकृति थी। उनके कार्य ने यह संदेश दिया कि डॉक्टर केवल उपचारक नहीं, बल्कि मानवता के सच्चे उपासक होते हैं। उन्होंने “Smile Train” जैसे अभियानों से असंख्य जीवनों में मुस्कान लौटाई। उनका जीवन यह सिखाता है कि विज्ञान तभी सार्थक है जब वह सेवा से जुड़ा हो।
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  4. सी. के. नायडू (1895–1967): भारतीय क्रिकेट के प्रथम कप्तान
    सी. के. नायडू भारतीय क्रिकेट के इतिहास में वह पहला नाम हैं, जिन्होंने अंग्रेजों के विरुद्ध आत्मविश्वास और सम्मान से खेल का प्रतिनिधित्व किया। वे भारतीय क्रिकेट टीम के प्रथम टेस्ट कप्तान बने और अपने शानदार बल्लेबाज़ी कौशल तथा नेतृत्व क्षमता से देश को गौरवान्वित किया। उनके व्यक्तित्व में खेल भावना, अनुशासन और देशभक्ति का अनोखा संगम था। उन्होंने क्रिकेट को केवल खेल नहीं, बल्कि एक राष्ट्रीय अभिव्यक्ति बनाया, जिसके माध्यम से भारत ने आत्मसम्मान की भावना जगाई।
  5. हरिकृष्ण देवसरे (1938–2013): बाल साहित्य के अमर कवि
    हरिकृष्ण देवसरे का नाम बाल साहित्य के क्षेत्र में स्वर्णाक्षरों में दर्ज है। उन्होंने बच्चों के मन की कोमलता और कल्पनाशक्ति को अपनी कहानियों और कविताओं में शब्द दिए। उनकी रचनाओं में नैतिकता, रोमांच और ज्ञान का संगम था। उन्होंने बाल साहित्य को केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि शिक्षा और संस्कार का माध्यम बनाया। बतौर संपादक और लेखक, उन्होंने हज़ारों बच्चों को पढ़ने और सोचने की प्रेरणा दी। देवसरे जी की कलम ने बाल मन को शब्दों की रंगीन दुनिया से जोड़ा।
  6. लक्ष्मीचंद जैन (1925–2010): अर्थशास्त्र के मानवीय चेहरा
    लक्ष्मीचंद जैन भारतीय अर्थशास्त्र में समाजोन्मुख दृष्टिकोण के प्रतीक थे। उन्होंने हमेशा यह माना कि अर्थनीति का उद्देश्य केवल वृद्धि नहीं, बल्कि समावेशी विकास होना चाहिए। सहकारिता और ग्रामोन्नति के क्षेत्र में उनका योगदान उल्लेखनीय रहा। उन्हें पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया। जैन जी के विचार आज भी भारत के ग्रामीण और आर्थिक सुधारों के लिए मार्गदर्शक हैं। उन्होंने नीति और नैतिकता का संगम अर्थशास्त्र में स्थापित किया।
  7. भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद (1896–1977): भक्ति आंदोलन के विश्वप्रसारक
    भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद ने अंतर्राष्ट्रीय कृष्ण भावनामृत संघ (ISKCON) की स्थापना की और श्रीकृष्ण भक्ति को वैश्विक स्तर पर फैलाया। उन्होंने पश्चिमी देशों में भारतीय आध्यात्मिकता का प्रचार किया और लाखों लोगों को भक्ति मार्ग की ओर अग्रसर किया। उनकी सरल जीवनशैली, गीता पर आधारित प्रवचनों और लेखन ने आधुनिक समाज को आध्यात्मिक चेतना से जोड़ा। उन्होंने दिखाया कि भक्ति केवल धर्म नहीं, बल्कि जीवन जीने का एक शाश्वत मार्ग है।
    13 नवंबर उन विभूतियों को याद करने का अवसर है जिन्होंने अपने जीवन से हमें यह सिखाया कि समर्पण, ज्ञान, करुणा और आस्था से ही मानवता का वास्तविक उत्थान संभव है। चाहे वह विद्या का क्षेत्र हो, विज्ञान का या अध्यात्म का — हर व्यक्ति ने अपने कर्म से भारत की आत्मा को समृद्ध किया। उनके योगदान आज भी नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा के स्रोत हैं।

जानिए किस मूलांक पर बरसेगी किस्मत की कृपा

🌟 14 नवंबर 2025 का अंक राशिफल: जानिए मूलांक 1 से 9 तक के लिए कैसा रहेगा दिन — पंडित सुधीर तिवारी

अंक ज्योतिष के अनुसार हर व्यक्ति की जन्म तिथि उसके व्यक्तित्व और भाग्य का आईना होती है। यदि आप अपनी जन्मतिथि के सभी अंकों को जोड़कर एक अंक प्राप्त करते हैं, तो वही आपका मूलांक कहलाता है। आइए जानते हैं पंडित सुधीर तिवारी द्वारा बताए गए 14 नवंबर 2025 के मूलांक अनुसार भाग्यफल—
🔹 मूलांक 1 (जिनका जन्म 1, 10, 19 या 28 को हुआ)
आज आर्थिक स्थिति मजबूत होगी। किसी पारिवारिक सदस्य की तबीयत में सुधार देखकर मन प्रसन्न रहेगा। जीवनसाथी के साथ यात्रा या छोटा ब्रेक आपके रिश्ते में नई ऊर्जा लाएगा।
🔹 मूलांक 2 (जिनका जन्म 2, 11, 20 या 29 को हुआ)
पैसों से जुड़ी अड़चनें खत्म होंगी। कार्यक्षेत्र में आपकी मेहनत को पहचान मिलेगी। किसी संपत्ति विवाद से दूर रहें। परिवार का सहयोग मिलने से आत्मविश्वास बढ़ेगा।
🔹 मूलांक 3 (जिनका जन्म 3, 12, 21 या 30 को हुआ)
आज यात्रा टालना बेहतर रहेगा। विद्यार्थियों के लिए यह दिन आत्मविश्वास बढ़ाने वाला है। पुराने मित्रों से मुलाकात आपको सकारात्मक ऊर्जा देगी।
🔹 मूलांक 4 (जिनका जन्म 4, 13, 22 या 31 को हुआ)
किसी पुराने विवाद में आपकी राय सही साबित होगी। करियर की दिशा में किसी विशेषज्ञ की सलाह फायदेमंद होगी। योग और ध्यान आपकी सेहत के लिए लाभदायक रहेंगे।
🔹 मूलांक 5 (जिनका जन्म 5, 14 या 23 को हुआ)
आज रोमांस और खुशियों से भरा दिन रहेगा। कोई लाभदायक सौदा आर्थिक स्थिति को बेहतर बनाएगा। पारिवारिक माहौल में सद्भाव बना रहेगा।
🔹 मूलांक 6 (जिनका जन्म 6, 15 या 24 को हुआ)
आज परिवार के साथ समय बिताने का अवसर मिलेगा। कोई प्रॉपर्टी डील या निवेश आपके लिए शुभ रहेगा। सितारे आपके पक्ष में हैं, योजनाओं को आगे बढ़ाएं।
🔹 मूलांक 7 (जिनका जन्म 7, 16 या 25 को हुआ)
यात्रा या किसी नए स्थान का अनुभव सुखद रहेगा। विरासत में संपत्ति या धन प्राप्ति के योग हैं। प्रेम जीवन में नई शुरुआत संभव है।
🔹 मूलांक 8 (जिनका जन्म 8, 17 या 26 को हुआ)
स्वास्थ्य को लेकर सावधानी बरतें। आर्थिक दृष्टि से दिन बेहतर रहेगा। कार्यक्षेत्र में आपके नए विचारों की सराहना होगी।
🔹 मूलांक 9 (जिनका जन्म 9, 18 या 27 को हुआ)
लंबे समय से चली आ रही बीमारी से राहत के संकेत हैं। पैसों के मामले में उन्नति होगी। माता-पिता की प्रसन्नता आपके मन को सुकून देगी।
✴️ हर मूलांक का दिन अलग ऊर्जा और अवसर लेकर आता है। आत्मविश्वास बनाए रखें और सकारात्मक सोच के साथ आगे बढ़ें।
🪔यह अंक ज्योतिष केवल सामान्य संकेत देता है। यह राष्ट्र की परंपरा द्वारा प्रमाणित नहीं है। सटीक मार्गदर्शन हेतु अपनी जन्मकुंडली किसी योग्य ज्योतिष विशेषज्ञ को अवश्य दिखाएं।

🌸 14 नवंबर को जन्मे महान व्यक्तित्व: जिनके कर्म, विचार और संघर्ष ने इतिहास में अमिट छाप छोड़ी 🌸


14 नवंबर का दिन भारतीय इतिहास और विश्व पटल दोनों पर अत्यंत प्रेरणादायी रहा है। इस दिन अनेक ऐसे महान व्यक्तित्व जन्मे, जिन्होंने अपने कार्यों, विचारों और संघर्ष से समाज को नई दिशा दी। आइए जानते हैं 14 नवंबर को जन्मे उन विशिष्ट हस्तियों के बारे में, जिन्होंने अपने जीवन से मानवता, सेवा और प्रेरणा का संदेश दिया।
जवाहरलाल नेहरू (1889 – भारत के प्रथम प्रधानमंत्री)
14 नवंबर 1889 को इलाहाबाद में जन्मे पंडित जवाहरलाल नेहरू आधुनिक भारत के निर्माता माने जाते हैं। उन्होंने न सिर्फ़ स्वतंत्रता संग्राम में गांधीजी के साथ मिलकर ब्रिटिश शासन के खिलाफ संघर्ष किया, बल्कि स्वतंत्र भारत की नींव भी मज़बूत की। बच्चों से उनके गहरे लगाव के कारण यह दिन “बाल दिवस” के रूप में मनाया जाता है। उन्होंने पंचशील सिद्धांत, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और धर्मनिरपेक्षता पर आधारित राष्ट्र की परिकल्पना की। उनका योगदान शिक्षा, उद्योग और अंतरराष्ट्रीय संबंधों में अतुलनीय है।
बुतरस बुतरस घाली (1922 – संयुक्त राष्ट्र महासचिव)
मिस्र में जन्मे बुतरस घाली 1992 से 1996 तक संयुक्त राष्ट्र संघ के महासचिव रहे। वे पहले अफ्रीकी और अरब व्यक्ति थे जिन्होंने इस पद की गरिमा को बढ़ाया। उन्होंने शीत युद्ध के बाद विश्व में शांति और सहयोग की भावना को पुनर्जीवित करने का प्रयास किया। उनके नेतृत्व में संयुक्त राष्ट्र ने कई संघर्षग्रस्त क्षेत्रों में शांति अभियानों को सफलतापूर्वक संचालित किया। वैश्विक कूटनीति में उनका योगदान आज भी प्रेरणा का स्रोत है।

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पीलू मोदी (1926 – स्वतंत्र विचारों के प्रतीक राजनेता)
पीलू मोदी भारतीय राजनीति के उन नेताओं में से थे, जो अपने उदारवादी और स्वतंत्र आर्थिक विचारों के लिए प्रसिद्ध हुए। स्वतंत्र पार्टी के प्रमुख नेता के रूप में उन्होंने सरकारी नियंत्रण की जगह निजी पहल और उद्यमशीलता को बढ़ावा देने की वकालत की। वे अपने ह्यूमर और तीखे लेकिन ईमानदार वक्तव्यों के लिए जाने जाते थे। उनका राजनीतिक दृष्टिकोण आज के उदारवादी भारत की नींव कहे जा सकते हैं।
इंदिरा गोस्वामी(1942–असमिया साहित्य की ममता भरी आवाज़)
इंदिरा गोस्वामी, जिन्हें ‘मामोनी रईसोम गोस्वामी’ के नाम से भी जाना जाता है, असमिया साहित्य की सबसे सशक्त हस्तियों में थीं। उनके लेखन में स्त्री की पीड़ा, समाज के विरोधाभास और मानवीय करुणा की गहराई झलकती है। उनके उपन्यास “द मुथार डेड बॉडीज़” और “आई आर सौती” ने भारतीय साहित्य को नया दृष्टिकोण दिया। उन्होंने साहित्य अकादमी पुरस्कार, ज्ञानपीठ पुरस्कार और अनेक सम्मान प्राप्त किए।

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डॉ. पुखराज बफाना (1946 – बाल स्वास्थ्य के संवेदनशील प्रहरी)
डॉ. पुखराज बफाना भारतीय बाल रोग विशेषज्ञ और किशोर स्वास्थ्य सलाहकार के रूप में जाने जाते हैं। उन्होंने बच्चों और किशोरों में स्वास्थ्य जागरूकता, पोषण और मानसिक संतुलन के क्षेत्र में विशेष योगदान दिया। उनके कार्यों ने ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में बाल स्वास्थ्य सुधार के लिए नई पहलें शुरू कीं। वे चिकित्सा जगत के एक संवेदनशील और समर्पित व्यक्तित्व हैं, जिन्होंने सेवा को अपना धर्म बनाया।
सिंधुताई सपकाल (1948 – अनाथ बच्चों की ‘माई’)
‘अनाथों की माँ’ के नाम से प्रसिद्ध सिंधुताई सपकाल का जीवन त्याग, संघर्ष और सेवा का उदाहरण है। महाराष्ट्र के एक गरीब परिवार में जन्मी सिंधुताई ने अपने जीवन की कठिनाइयों को दूसरों के सुख में बदल दिया। उन्होंने हजारों अनाथ बच्चों को आश्रय, शिक्षा और सम्मानजनक जीवन दिया। उनके कार्यों ने पूरे समाज को यह सिखाया कि एक व्यक्ति भी यदि ठान ले, तो दुनिया में बदलाव ला सकता है।
अमिया कुमार मलिक (1992 – भारतीय धावक)
ओडिशा के रहने वाले अमिया कुमार मलिक भारतीय एथलेटिक्स में स्प्रिंटिंग के क्षेत्र में उभरते सितारे हैं। उन्होंने कई राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में स्वर्ण पदक जीतकर देश का नाम रोशन किया। उनके अथक परिश्रम और दृढ़ निश्चय ने उन्हें भारतीय खेल जगत में पहचान दिलाई। युवाओं के लिए वे प्रेरणा हैं कि सीमित साधनों में भी दृढ़ इच्छा से सफलता पाई जा सकती है।
विकास ठाकुर (1993 – भारतीय भारोत्तोलक)
पंजाब के लुधियाना में जन्मे विकास ठाकुर भारतीय वेटलिफ़्टिंग के शीर्ष खिलाड़ियों में से एक हैं। उन्होंने राष्ट्रमंडल खेलों और एशियाई प्रतियोगिताओं में भारत के लिए पदक जीते। उनका अनुशासन, संघर्ष और निरंतर मेहनत का सफर युवा खिलाड़ियों को प्रेरित करता है। विकास ठाकुर की उपलब्धियाँ भारत के खेल इतिहास में सुनहरे अक्षरों में दर्ज है।
14 नवंबर को जन्मे ये सभी व्यक्तित्व — नेहरू से लेकर सिंधुताई सपकाल, इंदिरा गोस्वामी से लेकर बुतरस घाली तक — मानवता, निष्ठा और सेवा के प्रतीक हैं। उनके कार्यों ने समाज के हर वर्ग को प्रभावित किया है। यह दिन सिर्फ बाल दिवस नहीं, बल्कि मानवता और प्रेरणा का दिवस भी है, जो हमें यह याद दिलाता है कि एक जन्म, एक विचार और एक संकल्प दुनिया बदल सकता है।

घटित विश्व और भारत की ऐतिहासिक घटनाएँ

🌅 14 नवंबर का इतिहास: प्रगति, परिवर्तन और यादों से भरा दिन जिसने विश्व को नई दिशा दी


14 नवंबर का दिन इतिहास के पन्नों में विशेष महत्व रखता है। यह तिथि कई ऐसी घटनाओं की साक्षी रही है, जिन्होंने विश्व की दिशा और दशा दोनों को प्रभावित किया। चाहे वह साम्राज्य की स्थापना हो, मीडिया की नई शुरुआत, राजनीतिक बदलाव या विज्ञान की ऊँचाइयाँ — हर घटना अपने भीतर गहरी ऐतिहासिक छाप समेटे हुए है।
1681 में इस दिन ईस्ट इंडिया कंपनी ने बंगाल को एक अलग रियासत घोषित किया, जिससे भारत के राजनीतिक परिदृश्य में बड़ा बदलाव आया। इस कदम ने भारत में ब्रिटिश शासन की नींव और गहरी कर दी।

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1922 में ब्रिटिश ब्रॉडकास्टिंग कॉर्पोरेशन (BBC) की स्थापना हुई, जिसने ब्रिटेन में रेडियो सेवा शुरू की और संचार के नए युग का सूत्रपात किया। आज भी BBC विश्व की सबसे विश्वसनीय मीडिया संस्थाओं में से एक मानी जाती है।
1973 में इतिहास तब बना जब ब्रिटेन की राजकुमारी ऐन ने आम नागरिक से विवाह किया, जो राजघराने की परंपरा के विपरीत एक प्रगतिशील निर्णय था। यह विवाह समाज में समानता और आधुनिक सोच की मिसाल बन गया।
1999 में अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर यह दिन तब चर्चित हुआ जब संयुक्त राष्ट्र ने ओसामा बिन लादेन को न सौंपने पर तालिबान पर प्रतिबंध लगाए, वहीं राष्ट्रमंडल सम्मेलन ने पाकिस्तान को निलंबित करने की घोषणा की। यह निर्णय विश्व राजनीति में आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक एकजुटता का प्रतीक बना।
2002 में चीन के राष्ट्रपति जियांग जेमिन ने अपने पद से इस्तीफा दिया, जो चीन की राजनीतिक व्यवस्था में नई पीढ़ी के नेतृत्व के लिए मार्ग प्रशस्त करने वाला क्षण था।
2006 में भारत-पाकिस्तान संबंधों में एक नया अध्याय जुड़ा, जब दोनों देशों के विदेश सचिवों ने एंटी-टेरेरिज्म मैकेनिज्म पर सहमति जताई। यह प्रयास दोनों देशों के बीच विश्वास और शांति की दिशा में छोटा लेकिन महत्वपूर्ण कदम था।
2007 में डेनमार्क में आन्द्रे फ़ाग रासमुस्सेन ने लगातार तीसरी बार प्रधानमंत्री पद संभाला, जो उनके नेतृत्व की लोकप्रियता और लोकतांत्रिक मजबूती का प्रतीक था।
2008 का 14 नवंबर भारत के लिए मिश्रित भावनाओं का दिन रहा। इस दिन पूर्व केंद्रीय मंत्री और तृणमूल कांग्रेस नेता अजीत पांजा का निधन हुआ, वहीं भारतीय अंतरिक्ष इतिहास में एक गौरवशाली पल आया जब मून इम्पैक्ट प्रोब चाँद की सतह पर उतरा, जिसने चंद्रयान मिशन की सफलता को नई ऊँचाइयाँ दीं। इसी दिन छत्तीसगढ़ में विधानसभा चुनाव के पहले चरण का मतदान भी संपन्न हुआ, जो लोकतांत्रिक प्रक्रिया का मजबूत उदाहरण बना।
2009 में मंडोर सुपरफास्ट एक्सप्रेस ट्रेन हादसा जयपुर के पास हुआ, जिसमें 6 यात्रियों की मौत हुई। यह दुखद घटना हमें रेल सुरक्षा की जिम्मेदारी और सुधारों की आवश्यकता की याद दिलाती है।
इतिहास के इन क्षणों में राजनीति, विज्ञान, समाज और मानवता — सभी के रंग झलकते हैं। 14 नवंबर का दिन हमें यह सिखाता है कि समय चाहे जैसा भी हो, बदलाव हमेशा सभ्यता की दिशा तय करता है। हर घटना अपने पीछे एक नई सोच, एक नई प्रेरणा और एक नया अध्याय छोड़ जाती है।
यह तिथि सिर्फ बीते दिनों की कहानी नहीं है, बल्कि आने वाले कल के लिए सीख भी है—कि हर चुनौती, हर बदलाव, और हर निर्णय मानवता के विकास की कहानी लिखता है।