शाहजहाँपुर(राष्ट्र की परम्परा)
थाना पुवायाँ में गुरुवार को प्रशिक्षणरत रिक्रूट आरक्षियों के साथ आयोजित गोष्ठी में पुलिस अधीक्षक ने अनुशासन, जनसेवा और प्रभावी पुलिसिंग का पाठ पढ़ाया। अपर पुलिस अधीक्षक (ग्रामीण) और क्षेत्राधिकारी पुवायाँ की मौजूदगी में आयोजित बैठक में एसपी ने नए जवानों को वर्दी की गरिमा बनाए रखते हुए जनता के साथ शालीन व्यवहार करने की नसीहत दी। एसपी ने कहा कि पुलिस विभाग में समयबद्धता, जिम्मेदारी और अनुशासन का सबसे अधिक महत्व है। उन्होंने निर्देश दिए कि थाने या मौके पर आने वाले पीड़ितों की समस्याओं को गंभीरता से सुनते हुए उनका त्वरित और निष्पक्ष निस्तारण सुनिश्चित किया जाए। उन्होंने कहा कि पुलिसकर्मी का व्यवहार ही विभाग की छवि तय करता है। गोष्ठी में कानून व्यवस्था, अपराध नियंत्रण, महिला सुरक्षा, यातायात प्रबंधन और रात्रि गश्त के दौरान सतर्क रहने के निर्देश भी दिए गए। साथ ही सोशल मीडिया के जिम्मेदार उपयोग और विभागीय गोपनीयता बनाए रखने पर विशेष जोर दिया गया। एसपी ने नए आरक्षियों को शारीरिक और मानसिक रूप से फिट रहने के लिए प्रेरित करते हुए कहा कि बदलते दौर में आधुनिक पुलिसिंग प्रणाली के अनुरूप खुद को तैयार करना जरूरी है। गोष्ठी में थाना पुवायाँ के पुलिस अधिकारी और कर्मचारी मौजूद रहे।
वर्दी की गरिमा और जनता का सम्मान ही पुलिस की पहचान-एसपी
बरहज की टूटी सड़क और अधूरा मोहन सेतु बना सियासी मुद्दा, सपा ने सरकार को घेरा
देवरिया में गरजा सपा का विरोध: बरहज की बदहाल सड़क, अधूरा मोहन सेतु और महंगाई पर मुख्यमंत्री को सौंपा ज्ञापन
देवरिया (राष्ट्र की परम्परा)। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के 22 मई के देवरिया दौरे के दौरान जिले का सियासी पारा उस समय गर्म हो गया, जब समाजवादी पार्टी के बरहज विधानसभा-342 इकाई के पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं ने जनसमस्याओं को लेकर जोरदार विरोध दर्ज कराया। विधानसभा अध्यक्ष रामबहादुर यादव की अगुवाई में सपा प्रतिनिधिमंडल ने मुख्यमंत्री को ज्ञापन सौंपते हुए क्षेत्र की ज्वलंत समस्याओं के तत्काल समाधान की मांग की।
सपा नेताओं ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि बरहज विधानसभा क्षेत्र की जनता वर्षों से टूटी सड़कों, अधूरे पुल निर्माण और महंगाई की मार झेल रही है, लेकिन सरकार इन मुद्दों पर गंभीर नहीं दिख रही। पार्टी नेताओं ने चेतावनी दी कि यदि समस्याओं का शीघ्र समाधान नहीं हुआ तो समाजवादी पार्टी जनआंदोलन को और तेज करेगी।
ज्ञापन में सबसे प्रमुख मुद्दा बरहज-सोनूघाट मार्ग की बदहाली को बनाया गया। नेताओं ने कहा कि यह सड़क कई वर्षों से पूरी तरह क्षतिग्रस्त पड़ी है, जिससे आए दिन दुर्घटनाएं हो रही हैं। खराब सड़क के कारण आम लोगों, विद्यार्थियों और व्यापारियों को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। सपा ने इस सड़क के तत्काल पुनर्निर्माण की मांग उठाई।
इसके साथ ही सरयू नदी पर निर्माणाधीन मोहन सेतु का मुद्दा भी प्रमुखता से उठाया गया। सपा नेताओं ने कहा कि पुल निर्माण कार्य वर्षों से अधर में लटका हुआ है, जिससे क्षेत्रीय विकास प्रभावित हो रहा है। उन्होंने सरकार से तत्काल निर्माण कार्य शुरू कर पुल को शीघ्र पूरा कराने की मांग की।
किसानों की समस्याओं को उठाते हुए प्रतिनिधिमंडल ने डीजल, पेट्रोल, खाद और बिजली की बढ़ती कीमतों पर चिंता जताई। ज्ञापन में मांग की गई कि किसानों को राहत देने के लिए इन आवश्यक संसाधनों के दाम कम किए जाएं तथा क्षेत्र में पर्याप्त उपलब्धता सुनिश्चित की जाए।
इस दौरान जिला उपाध्यक्ष अम्बिका यादव, पूर्व प्रत्याशी विधानसभा बरहज मुरली मनोहर जायसवाल ,तेज प्रताप जायसवाल, विनोद यादव, रामप्रकाश चौधरी, रामनरेश यादव, राजित यादव, हृदया शंकर यादव, दुर्गेश यादव, राजेंद्र यादव, सीमा यादव, हरेंद्र यादव, संतोष यादव, राजन मिश्रा, वीर बहादुर सिंह सैंथवार, उमेश नारायण शाही, योगेंद्र भारती, बेचूलाल चौधरी और श्रीकिशुन यादव सहित बड़ी संख्या में समाजवादी पार्टी के नेता एवं कार्यकर्ता मौजूद रहे।
सपा नेताओं ने कहा कि पार्टी जनता के मुद्दों पर संघर्ष करती रही है और आगे भी करती रहेगी। उन्होंने कहा कि बरहज की उपेक्षित सड़कों, अधूरे मोहन सेतु और किसानों की समस्याओं को लेकर पार्टी सड़क से सदन तक आवाज उठाएगी।
देवरिया से योगी का विपक्ष पर बड़ा हमला, बोले- “गुंडे मिट्टी में मिल गए”655 करोड़
देवरिया में गरजे योगी: “वन डिस्ट्रिक्ट वन माफिया” से “विकास मॉडल” तक बदली यूपी की पहचान, 655 करोड़ की परियोजनाओं का शिलान्यास
देवरिया (राष्ट्र की परम्परा)। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री Yogi Adityanath ने शुक्रवार को देवरिया में आयोजित विशाल जनसभा को संबोधित करते हुए कहा कि वर्ष 2017 से पहले उत्तर प्रदेश की पहचान “वन डिस्ट्रिक्ट वन माफिया” के रूप में बन चुकी थी, लेकिन आज प्रदेश विकास, सुरक्षा और निवेश का नया मॉडल बनकर उभरा है। उन्होंने कहा कि कभी दूसरे राज्यों के लोग यूपी का नाम सुनकर दूरी बना लेते थे, जबकि अब लोग “जय श्री राम” बोलकर गले मिलते हैं।
मुख्यमंत्री ने देवरिया जनपद के लिए 655 करोड़ रुपये लागत की 19 विकास परियोजनाओं का शिलान्यास करते हुए कहा कि प्रदेश में तेज रफ्तार विकास और मजबूत कानून व्यवस्था ने उत्तर प्रदेश की छवि को पूरी तरह बदल दिया है।
सभा को संबोधित करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि प्रधानमंत्री Narendra Modi के नेतृत्व में “नए भारत” का विजन धरातल पर दिखाई दे रहा है। उन्होंने कहा कि एक दशक पहले पूर्वांचल में फोरलेन सड़कों की कल्पना भी कठिन थी, लेकिन आज कुशीनगर-देवरिया-बलिया और गोरखपुर-देवरिया-सिलीगुड़ी मार्गों को आधुनिक सड़क नेटवर्क से जोड़ा जा रहा है। इससे आवागमन सुगम हुआ है और व्यापार, निवेश व रोजगार के नए अवसर पैदा हो रहे हैं।
योगी आदित्यनाथ ने कहा कि विकास की सबसे बड़ी बुनियाद बेहतर कनेक्टिविटी होती है। पहले गोरखपुर से देवरिया आने में घंटों जाम का सामना करना पड़ता था, लेकिन अब सड़क परियोजनाओं ने लोगों की यात्रा आसान बना दी है। उन्होंने कहा कि प्रदेश सरकार का लक्ष्य गांव, किसान, नौजवान और व्यापारियों को विकास की मुख्यधारा से जोड़ना है।
सभा में उमड़ी भारी भीड़ को देखकर मुख्यमंत्री ने आगामी 2027 के चुनावी संकेत भी दिए। उन्होंने कहा कि सरकार केवल समस्याओं की चर्चा नहीं करती, बल्कि समाधान प्रस्तुत करती है और जनता उसी समाधान पर भरोसा करती है। मंच पर मौजूद जनप्रतिनिधियों की ओर इशारा करते हुए उन्होंने कहा कि विकास कार्य जनप्रतिनिधियों के प्रस्ताव और जनता के सहयोग से ही आगे बढ़ते हैं। उन्होंने लोगों से अपील की कि वे किसी के बहकावे में न आएं और विकास की राजनीति पर भरोसा रखें।
मुख्यमंत्री ने अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों का जिक्र करते हुए कहा कि पश्चिम एशिया में चल रहे तनाव और ईरान-अमेरिका संकट के कारण तारकोल की उपलब्धता प्रभावित हो रही है। इसी को देखते हुए प्रदेश सरकार ने अधिकारियों को इंटरलॉकिंग और सीसी रोड निर्माण को प्राथमिकता देने के निर्देश दिए हैं। उन्होंने कहा कि लागत बढ़ने के बावजूद विकास कार्यों की गति नहीं रुकने दी जाएगी।
लगभग आधे घंटे के भाषण में मुख्यमंत्री समाजवादी पार्टी पर सबसे अधिक हमलावर दिखे। उन्होंने आरोप लगाया कि पूर्ववर्ती सरकारों के दौरान प्रदेश में अराजकता और अपराध चरम पर था। बेटियां शाम के बाद घर से बाहर निकलने में असुरक्षित महसूस करती थीं और व्यापारी भय के माहौल में काम करते थे। उन्होंने कहा कि वर्तमान सरकार में माफिया प्रदेश छोड़कर भाग चुके हैं और “गुंडे मिट्टी में मिल गए”।
कार्यक्रम में सांसद Shashank Mani Tripathi, कृषि मंत्री Surya Pratap Shahi, राज्यमंत्री Vijayalakshmi Gautam, परिवहन मंत्री Dayashankar Singh, एमएलसी Ratanpal Singh, विधायक Shalabh Mani Tripathi सहित कई जनप्रतिनिधि मौजूद रहे। कार्यक्रम का संचालन जिला अध्यक्ष भूपेंद्र सिंह ने किया।
CM से मिलने की तैयारी पड़ी भारी! देवरिया में सपा नेता को पुलिस ने रोका
देवरिया में आधी रात पुलिस कार्रवाई, सपा नेता अनिल यादव नजरबंद; CM से मिलने से पहले रोके गए
देवरिया (राष्ट्र की परम्परा)में मुख्यमंत्री के प्रस्तावित दौरे से पहले राजनीतिक हलचल तेज हो गई। समाजवादी पार्टी के मुखर नेता अनिल यादव को पुलिस प्रशासन ने बीती रात उनके आवास पर ही नजरबंद कर दिया। बताया जा रहा है कि रात लगभग 1:20 बजे सीओ सिटी, सदर कोतवाल और भारी संख्या में पुलिस बल उनके घर पहुंचा और पूरे परिसर को पुलिस छावनी में तब्दील कर दिया गया।
सपा नेता अनिल यादव ने इस कार्रवाई को लोकतांत्रिक अधिकारों का दमन बताते हुए कहा कि उनका “कसूर” केवल इतना था कि वे सोनू घाट-बरहज मार्ग समेत क्षेत्र की कई जनसमस्याओं को लेकर मुख्यमंत्री से मुलाकात करना चाहते थे। उन्होंने अपने समर्थकों और स्थानीय लोगों से अपील की थी कि मुख्यमंत्री के देवरिया आगमन के दौरान वे जनहित से जुड़ा ज्ञापन सौंपेंगे।
अनिल यादव का आरोप है कि प्रशासन को आशंका थी कि मुख्यमंत्री के कार्यक्रम में जनसमस्याओं को प्रमुखता से उठाया जाएगा, इसी कारण उन्हें घर में ही रोक दिया गया। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में जनता की आवाज उठाना अपराध नहीं हो सकता, लेकिन वर्तमान व्यवस्था विपक्ष की आवाज दबाने का प्रयास कर रही है।
उन्होंने सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि विपक्षी नेताओं को प्रताड़ित करना, फर्जी मुकदमों में फंसाना और हाउस अरेस्ट जैसी कार्रवाइयां लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ हैं। उनके अनुसार यह कार्रवाई प्रशासनिक सख्ती से ज्यादा राजनीतिक दबाव का संकेत देती है।
सपा नेता ने कहा कि क्षेत्र की सड़क, स्वास्थ्य, बिजली और अन्य जनसमस्याओं को लेकर उनका संघर्ष लगातार जारी रहेगा। उन्होंने यह भी कहा कि यदि जनता की आवाज उठाने की कीमत जेल या उत्पीड़न है, तो भी वे पीछे हटने वाले नहीं हैं।
मुख्यमंत्री के दौरे से पहले हुई इस कार्रवाई को लेकर जिले की राजनीति गरमा गई है। स्थानीय स्तर पर समर्थकों में नाराजगी देखी जा रही है और विपक्ष इसे लोकतंत्र पर हमला बता रहा है। वहीं प्रशासन की ओर से फिलहाल इस मामले पर कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है।
सुंदरता के नाम पर सेहत से खिलवाड़ बंद, अवैध कॉस्मेटिक इंजेक्शन पर सख्त कार्रवाई शुरू
सुंदरता की अंधी दौड़ पर सरकार की सख्ती: कॉस्मेटिक इंजेक्शन पर CDSCO की बड़ी चेतावनी, अब होगी कठोर कानूनी कार्रवाई

भारत में तेजी से बढ़ती ब्यूटी और एस्थेटिक इंडस्ट्री के बीच केंद्र सरकार ने स्वास्थ्य सुरक्षा को लेकर बड़ा और सख्त कदम उठाया है। 21 मई 2026 को भारत की दवा नियामक संस्था Central Drugs Standard Control Organization (सीडीएससीओ) ने सार्वजनिक चेतावनी जारी करते हुए स्पष्ट किया कि किसी भी कॉस्मेटिक उत्पाद का उपयोग इंजेक्शन के रूप में नहीं किया जा सकता। सरकार ने कहा है कि ऐसा करना औषधि एवं सौंदर्य प्रसाधन अधिनियम 1940 का उल्लंघन माना जाएगा और दोषियों के खिलाफ कठोर कानूनी कार्रवाई की जाएगी।
आज ग्लोइंग स्किन, इंस्टेंट फेयरनेस, एंटी-एजिंग थेरेपी, स्किन टाइटनिंग और इंस्टेंट ब्यूटी ट्रीटमेंट का बाजार तेजी से फैल रहा है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स, ऑनलाइन विज्ञापनों और तथाकथित “इंस्टेंट रिजल्ट” देने वाले क्लीनिकों ने लोगों में आकर्षक दिखने की होड़ को और तेज कर दिया है। लेकिन इसी चमक-दमक के पीछे एक गंभीर स्वास्थ्य संकट भी छिपा हुआ है। देशभर में कई ब्यूटी क्लीनिक और अवैध केंद्र कॉस्मेटिक उत्पादों का इस्तेमाल इंजेक्शन के रूप में कर रहे हैं, जबकि ऐसे उत्पाद केवल बाहरी उपयोग के लिए बनाए जाते हैं।
सरकार के अनुसार कॉस्मेटिक उत्पादों का उद्देश्य केवल त्वचा की सफाई, सुगंध, सौंदर्य बढ़ाना और बाहरी रूप को आकर्षक बनाना होता है। यदि किसी उत्पाद को इंजेक्शन या इन्फ्यूजन के माध्यम से शरीर के अंदर पहुंचाया जाता है, तो वह सामान्य कॉस्मेटिक की श्रेणी से बाहर हो जाता है और उसके लिए अलग चिकित्सकीय अनुमति, वैज्ञानिक परीक्षण तथा सुरक्षा मानक आवश्यक होते हैं। यही कारण है कि सीडीएससीओ ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि कॉस्मेटिक उत्पादों को इंजेक्शन के रूप में उपयोग करना कानून का सीधा उल्लंघन है।
विशेषज्ञों के अनुसार बीते कुछ वर्षों में ग्लूटाथियोन इंजेक्शन, इंस्टेंट ग्लो थेरेपी, स्किन व्हाइटनिंग इंजेक्शन, फेस लिफ्ट इंजेक्शन और एंटी-एजिंग इंजेक्शन जैसे उपचारों का चलन तेजी से बढ़ा है। कई क्लीनिक इन्हें पूरी तरह सुरक्षित और वैज्ञानिक बताकर प्रचारित करते हैं, जबकि अधिकांश मामलों में इनके पर्याप्त चिकित्सकीय प्रमाण उपलब्ध नहीं होते। सबसे गंभीर चिंता यह है कि कई स्थानों पर बिना प्रशिक्षित या गैर-चिकित्सकीय व्यक्ति ऐसे इंजेक्शन लगा रहे हैं, जिससे संक्रमण, एलर्जी, त्वचा क्षति, नसों को नुकसान, हार्मोनल असंतुलन और यहां तक कि जानलेवा स्थितियां पैदा हो सकती हैं।

सरकार का मानना है कि सौंदर्य उपचार के नाम पर लोगों की भावनाओं और असुरक्षाओं का व्यावसायिक लाभ उठाना अत्यंत खतरनाक प्रवृत्ति बन चुकी है। गलत तरीके से लगाए गए इंजेक्शन से सेप्सिस, चेहरे की स्थायी विकृति, लीवर और किडनी पर दुष्प्रभाव तथा प्रतिरक्षा प्रणाली में गड़बड़ी जैसी गंभीर समस्याएं हो सकती हैं। मेडिकल विशेषज्ञों का कहना है कि शरीर के अंदर प्रवेश करने वाली किसी भी प्रक्रिया को केवल प्रशिक्षित चिकित्सकों की निगरानी में ही किया जाना चाहिए।
कानूनी दृष्टि से भी यह मामला बेहद गंभीर है। औषधि एवं सौंदर्य प्रसाधन अधिनियम 1940 की धारा 18 के तहत ऐसे कॉस्मेटिक उत्पादों के निर्माण, बिक्री और उपयोग पर रोक है जो नियमों का उल्लंघन करते हों। धारा 17सी “मिसब्रांडेड कॉस्मेटिक्स” से संबंधित है, जिसमें भ्रामक दावे, झूठे विज्ञापन और गलत लेबलिंग शामिल हैं। वहीं धारा 26ए केंद्र सरकार को जनहित में किसी भी कॉस्मेटिक उत्पाद के निर्माण, बिक्री या उपयोग पर प्रतिबंध लगाने का अधिकार देती है।
यदि कोई कॉस्मेटिक उत्पाद नकली, मिलावटी या गलत तरीके से उपयोग किया जाता है, तो दोषियों को अधिकतम तीन वर्ष तक की कैद और भारी जुर्माना हो सकता है। वहीं कॉस्मेटिक उत्पादों का इंजेक्शन के रूप में उपयोग करने पर एक वर्ष तक की कैद, 20 हजार रुपये तक जुर्माना या दोनों दंड दिए जा सकते हैं। सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि झूठे विज्ञापन, बढ़ा-चढ़ाकर किए गए दावे और मेडिकल ट्रीटमेंट जैसा प्रभाव दिखाने वाले प्रचार भी कानून के दायरे में आएंगे।
डिजिटल युग में सोशल मीडिया ने ब्यूटी इंडस्ट्री को नई रफ्तार दी है। इंस्टाग्राम, यूट्यूब और शॉर्ट वीडियो प्लेटफॉर्म्स पर “पहले और बाद” की तस्वीरें दिखाकर लोगों को प्रभावित किया जाता है। युवा वर्ग और महिलाएं ऐसे विज्ञापनों से तेजी से प्रभावित हो रहे हैं। कई बार सेलिब्रिटी और इन्फ्लुएंसर्स भी ऐसे उत्पादों का प्रचार करते हैं, जिससे आम लोगों में विश्वास पैदा होता है। लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि इन दावों की वैज्ञानिक जांच बेहद सीमित होती है और कई उत्पादों में हानिकारक रसायन भी पाए जाते हैं।
सरकार ने जनता से अपील की है कि किसी भी ब्यूटी ट्रीटमेंट से पहले उसकी वैधता और चिकित्सकीय सुरक्षा की जांच अवश्य करें। यदि कहीं कॉस्मेटिक के नाम पर इंजेक्शन लगाए जा रहे हों या भ्रामक विज्ञापन चलाए जा रहे हों, तो इसकी जानकारी संबंधित प्राधिकरण को दें। प्रशासन का मानना है कि केवल कानूनी कार्रवाई ही पर्याप्त नहीं होगी, बल्कि जनता की जागरूकता भी उतनी ही आवश्यक है।
स्पष्ट है कि सरकार की यह कार्रवाई केवल नियम लागू करने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सार्वजनिक स्वास्थ्य सुरक्षा से जुड़ा बड़ा संदेश है। आने वाले समय में ब्यूटी और एस्थेटिक इंडस्ट्री के लिए निगरानी और नियम और अधिक कठोर हो सकते हैं। अब यह समझना बेहद जरूरी है कि सुंदरता तभी सार्थक है जब वह स्वास्थ्य और सुरक्षा के साथ जुड़ी हो। त्वरित और सस्ते परिणामों की चाह में ऐसे उपचार अपनाना जो शरीर को नुकसान पहुंचाएं, गंभीर खतरे को आमंत्रण देने जैसा है। सीडीएससीओ की चेतावनी इसी दिशा में “सेफ्टी फर्स्ट” का मजबूत संदेश मानी जा रही है।

लेखक
एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी, गोंदिया महाराष्ट्र
इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा आदेश: तकनीकी सहायक भर्ती में बोर्ड की लापरवाही उजागर, अभ्यर्थी के लिए खुला नियुक्ति का रास्ता
इलाहाबाद हाईकोर्ट लखनऊ पीठ ने उत्तर प्रदेश खादी एवं ग्रामोद्योग बोर्ड की भर्ती प्रक्रिया में गंभीर लापरवाही पर कड़ा रुख अपनाते हुए अधिकारियों को तलब किया है। न्यायमूर्ति Rajeev Singh ने मामले की सुनवाई के दौरान अपर मुख्य सचिव (खादी एवं ग्रामोद्योग), उत्तर प्रदेश अधीनस्थ सेवा चयन आयोग के सचिव और बोर्ड के मुख्य कार्यपालक अधिकारी (CEO) को 15 जुलाई 2026 तक लिखित अनुपालन रिपोर्ट प्रस्तुत करने का निर्देश दिया है।
टॉपर अभ्यर्थी को नौकरी से किया गया था बाहर
मामला बहराइच निवासी अरविंद कुमार तिवारी से जुड़ा है, जिन्होंने वर्ष 2016 में आयोजित ‘तकनीकी सहायक रेशा’ भर्ती परीक्षा में सामान्य श्रेणी में सर्वाधिक अंक प्राप्त किए थे। इसके बावजूद विभागीय समिति ने यह कहते हुए उनका चयन निरस्त कर दिया कि उनका प्रशिक्षण “सनई के रेशे” में नहीं, बल्कि “टेक्सटाइल केमिस्ट्री” में है।
हैरानी की बात यह रही कि इसी संस्थान और समान योग्यता वाले अन्य अभ्यर्थियों के प्रमाणपत्र विभाग द्वारा मान्य कर लिए गए थे। इससे भर्ती प्रक्रिया की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल खड़े हो गए।
स्पेशल अपील के बाद फिर शुरू हुई सुनवाई
पीड़ित अभ्यर्थी ने इस फैसले के खिलाफ हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। प्रारंभिक स्तर पर देरी के तकनीकी आधार पर याचिका का निस्तारण कर दिया गया था। इसके बाद अधिवक्ता अभिषेक कुमार द्विवेदी, आबिद अल्वी और वर्षा सिंह ने स्पेशल अपील संख्या 165/2026 दाखिल की।
स्पेशल अपील में अधिकारियों की कार्यप्रणाली और चयन प्रक्रिया में कथित मनमानी का मुद्दा उठाए जाने के बाद अदालत ने मामले को गंभीरता से लिया और मूल याचिका की दोबारा सुनवाई शुरू हुई।
कोर्ट की सख्ती के बाद बोर्ड ने मानी गलती
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर नाराजगी जताई। अदालत के सख्त रुख के बाद खादी एवं ग्रामोद्योग बोर्ड ने उच्चस्तरीय जांच समिति गठित की। संयुक्त मुख्य कार्यपालक अधिकारी सिद्धार्थ यादव की अध्यक्षता में गठित समिति ने जांच के बाद माना कि सेवा विनियमावली-2005 में “सनई के रेशे” में प्रशिक्षण की कोई अनिवार्यता नहीं थी।
जांच रिपोर्ट में स्पष्ट कहा गया कि तत्कालीन अधिकारियों ने नियमों के विपरीत जाकर अरविंद कुमार तिवारी का अभ्यर्थन निरस्त किया। रिपोर्ट में इसे “स्पष्ट लापरवाही एवं उदासीन कार्यप्रणाली” बताया गया।
खाली पद पर नियुक्ति की संभावना बढ़ी
जांच में यह भी सामने आया कि इसी पद पर चयनित एक अन्य अभ्यर्थी ने ज्वाइन नहीं किया था, जिससे पद अभी भी रिक्त है। इसके बाद बोर्ड के CEO शिशिर ने शासन को पत्र भेजकर अरविंद कुमार तिवारी की नियुक्ति के लिए अनुमति और दिशा-निर्देश मांगे हैं।
अदालत ने बोर्ड की रिपोर्ट को रिकॉर्ड पर लेते हुए संबंधित अधिकारियों को अगली सुनवाई तक कार्रवाई रिपोर्ट प्रस्तुत करने का आदेश दिया है। हाईकोर्ट के इस सख्त रुख के बाद प्रदेश के भर्ती बोर्डों और प्रशासनिक विभागों में हड़कंप मचा हुआ है।
ऐतिहासिक बंदी में थमा गोरखपुर का दवा कारोबार, ऑनलाइन दवा बिक्री के खिलाफ व्यापारियों का प्रदर्शन
गोरखपुर (राष्ट्र की परम्परा)। ऑल इंडिया ऑर्गेनाइजेशन ऑफ केमिस्ट्स एंड ड्रगिस्ट्स (AIOCD) और ऑर्गेनाइजेशन ऑफ केमिस्ट एंड ड्रगिस्ट उत्तर प्रदेश के आह्वान पर दवा विक्रेता समिति गोरखपुर के नेतृत्व में जनपद के दवा व्यापारियों ने राष्ट्रव्यापी बंद को ऐतिहासिक सफलता दिलाई। शहर से लेकर ग्रामीण क्षेत्रों तक थोक और फुटकर दवा की सभी दुकानें बंद रहीं, जिससे बंदी का व्यापक असर देखने को मिला।
भालोटिया मार्केट, बेतियाहाता, गोरखनाथ, मोहद्दीपुर, गोलघर, दाउदपुर, नौशाद और शिव बाजार समेत शहर के प्रमुख इलाकों में दवा प्रतिष्ठान पूरी तरह बंद रहे। वहीं बड़हलगंज, हाटा, कौड़ीराम, गगहा, बांसगांव, गोला, पीपीगंज, चौरी-चौरा, कैंपियरगंज, बेलघाट, सिकरीगंज और खजनी सहित ग्रामीण क्षेत्रों में भी बंदी का व्यापक असर दिखाई दिया।
बंदी के दौरान हजारों दवा व्यापारी भालोटिया मार्केट में एकत्रित हुए और शांतिपूर्ण प्रदर्शन करते हुए जिलाधिकारी कार्यालय पहुंचे। जिलाधिकारी की अनुपस्थिति में सिटी मजिस्ट्रेट उत्कर्ष श्रीवास्तव को प्रधानमंत्री Narendra Modi के नाम संबोधित ज्ञापन सौंपा गया। ज्ञापन में अवैध ऑनलाइन दवा बिक्री, फर्जी ई-प्रिस्क्रिप्शन, अनियंत्रित होम डिलीवरी और कॉर्पोरेट मनमानी पर तत्काल रोक लगाने की मांग की गई।
दवा विक्रेता समिति के अध्यक्ष योगेन्द्र नाथ दूबे और महामंत्री आलोक चौरसिया ने कहा कि ऑनलाइन फार्मेसी प्लेटफॉर्म बिना पर्याप्त नियमन के बड़े स्तर पर दवाओं की बिक्री कर रहे हैं, जो जनस्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा बनता जा रहा है। उन्होंने आशंका जताई कि इससे नकली और गलत दवाओं की आपूर्ति बढ़ सकती है। साथ ही अत्यधिक छूट यानी डीप डिस्काउंटिंग को बाजार की पारदर्शिता और निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा के लिए नुकसानदायक बताया।
व्यापारियों ने GSR 220(E) और GSR 817(E) जैसी अधिसूचनाओं को निरस्त करने तथा ऑनलाइन प्लेटफॉर्म की मनमानी पर नियंत्रण की मांग की। हालांकि जनहित को ध्यान में रखते हुए जिला अस्पताल, जन औषधि केंद्र और अमृत फार्मेसी को बंदी से अलग रखा गया, ताकि मरीजों को किसी प्रकार की असुविधा न हो। आपात स्थिति के लिए हेल्पलाइन नंबर भी जारी किए गए थे।
दवा व्यापारियों के अनुसार इस बंदी से जनपद में लगभग 7 करोड़ रुपये के कारोबार का नुकसान हुआ, लेकिन इसके बावजूद व्यापारियों ने जनस्वास्थ्य को प्राथमिकता देते हुए आंदोलन को सफल बनाया। पूरे कार्यक्रम के दौरान “जनस्वास्थ्य बचाओ—दवा व्यापार बचाओ” जैसे नारों से माहौल गूंजता रहा।
इस अवसर पर चेयरमैन अर्जुन अग्रवाल, संयोजक संतोष श्रीवास्तव सहित बड़ी संख्या में दवा व्यापारी मौजूद रहे। समिति ने स्पष्ट किया कि यह आंदोलन मरीजों के हित और सुरक्षित दवा व्यवस्था सुनिश्चित करने के उद्देश्य से किया गया है।
पूर्वांचल को नई रफ्तार, देवरिया में करोड़ों की परियोजनाओं का शुभारंभ करेंगे योगी आदित्यनाथ
देवरिया,(राष्ट्र की परम्परा डेस्क)। पूर्वी उत्तर प्रदेश के विकास को नई गति देने की दिशा में 22 मई का दिन देवरिया जिले के लिए महत्वपूर्ण साबित होने जा रहा है। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री Yogi Adityanath जिले को 655.45 करोड़ रुपये की बड़ी विकास सौगात देंगे। प्रस्तावित कार्यक्रम के अनुसार मुख्यमंत्री भीमपुर गौरा के समीप पोखरभिंडा में आयोजित जनसभा एवं विकास समारोह में शामिल होंगे, जहां वे करोड़ों रुपये की विभिन्न परियोजनाओं का लोकार्पण और शिलान्यास करेंगे।
प्रशासनिक अधिकारियों के मुताबिक मुख्यमंत्री कुल 19 विकास परियोजनाओं को जनता को समर्पित करेंगे। इनमें 116.54 करोड़ रुपये की लागत से तैयार आठ परियोजनाओं का लोकार्पण किया जाएगा, जबकि 538.91 करोड़ रुपये लागत की 11 नई परियोजनाओं का शिलान्यास होगा। इन योजनाओं के माध्यम से जिले में सड़क, आधारभूत संरचना, स्वास्थ्य, शिक्षा और जनसुविधाओं को मजबूती मिलने की उम्मीद जताई जा रही है।
कार्यक्रम को लेकर प्रशासनिक तैयारियां तेज कर दी गई हैं। आयोजन स्थल पर सुरक्षा व्यवस्था, यातायात प्रबंधन, पेयजल, विद्युत एवं जनसुविधाओं को लेकर अधिकारियों की लगातार निगरानी जारी है। जिला प्रशासन और विभिन्न विभागों के अधिकारी कार्यक्रम को सफल बनाने में जुटे हुए हैं।
मुख्यमंत्री का यह दौरा पूर्वांचल के विकास एजेंडे को आगे बढ़ाने की दिशा में अहम माना जा रहा है। स्थानीय लोगों को उम्मीद है कि इन परियोजनाओं के पूरा होने से रोजगार, कनेक्टिविटी और नागरिक सुविधाओं में उल्लेखनीय सुधार देखने को मिलेगा। विकास योजनाओं के जरिए ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के बीच बुनियादी सुविधाओं की दूरी कम करने का प्रयास भी किया जा रहा है।
देवरिया में होने वाला यह कार्यक्रम राजनीतिक और प्रशासनिक दोनों दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि इससे जिले में लंबे समय से प्रस्तावित कई योजनाओं को गति मिलने की संभावना है। मुख्यमंत्री के आगमन को लेकर भाजपा कार्यकर्ताओं और स्थानीय नागरिकों में उत्साह का माहौल है।
एल्गोरिदम के पीछे छिपी सेंसरशिप: Digital युग में पत्रकारिता की स्वतंत्रता पर बढ़ता संकट
✍️ दिव्या भोसले
लोकतंत्र में पत्रकारिता केवल सूचना देने का माध्यम नहीं, बल्कि सत्ता से सवाल पूछने, नागरिक अधिकारों की रक्षा करने और सरकार व जनता के बीच जवाबदेही कायम रखने वाली महत्वपूर्ण संस्था है। यही कारण है कि पत्रकारिता को विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के साथ लोकतंत्र का “चौथा स्तंभ” कहा जाता है। स्वतंत्र प्रेस किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की आधारशिला मानी जाती है, क्योंकि सत्ता का स्वभाव केंद्रीकरण की ओर होता है और पत्रकारिता उस पर सार्वजनिक नियंत्रण बनाए रखने का कार्य करती है।
अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति Thomas Jefferson का प्रसिद्ध कथन है—
“यदि मुझे सरकार के बिना समाचार पत्र और समाचार पत्रों के बिना सरकार में से किसी एक को चुनना पड़े, तो मैं समाचार पत्रों को चुनूँगा।” यह कथन लोकतंत्र में स्वतंत्र पत्रकारिता की अनिवार्यता को स्पष्ट करता है।
डिजिटल क्रांति और पत्रकारिता पर नए खतरे
21वीं सदी की डिजिटल क्रांति ने सूचना के स्वरूप, प्रसार और नियंत्रण को पूरी तरह बदल दिया है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डेटा निगरानी और एल्गोरिदमिक नियंत्रण ने पत्रकारिता की स्वतंत्रता के सामने नए और जटिल खतरे खड़े कर दिए हैं। सूचना अब केवल खबर नहीं रही, बल्कि राजनीतिक प्रभाव, आर्थिक हित और सामाजिक ध्रुवीकरण का शक्तिशाली माध्यम बन चुकी है।
हाल ही में नॉर्वे की पत्रकार Hele Lang ने दावा किया कि भारत के प्रधानमंत्री Narendra Modi से सवाल पूछने के बाद उनका इंस्टाग्राम अकाउंट निलंबित कर दिया गया। घटना तकनीकी कारणों से हुई या इसके पीछे व्यापक डिजिटल नियंत्रण के संकेत हैं, यह अलग विषय हो सकता है, लेकिन इससे एक गंभीर प्रश्न फिर सामने आया—क्या डिजिटल युग में पत्रकारिता की स्वतंत्रता सुरक्षित है?
एल्गोरिदम आधारित सेंसरशिप का बढ़ता प्रभाव
आज पत्रकारिता पर दबाव केवल सरकारों से नहीं, बल्कि निजी तकनीकी कंपनियों, डेटा निगरानी तंत्र, ट्रोल नेटवर्क और कॉर्पोरेट हितों से भी बढ़ रहा है। “प्रेस की स्वतंत्रता” अब केवल अखबारों और न्यूज चैनलों तक सीमित नहीं रही, बल्कि यह डिजिटल नागरिकता और सूचना के अधिकार से सीधे जुड़ गई है।
पहले सेंसरशिप खुलकर दिखाई देती थी, लेकिन अब वह एल्गोरिदम के पीछे छिपी हुई है। अकाउंट निलंबन, पोस्ट हटाना, शैडो बैनिंग, इंटरनेट बंदी और एल्गोरिदमिक रीच कम करना आधुनिक डिजिटल नियंत्रण के प्रमुख साधन बन चुके हैं।
Meta, Google, X और YouTube जैसी कंपनियाँ आज वैश्विक सूचना प्रवाह को प्रभावित करने वाली शक्तियाँ बन चुकी हैं। प्रसिद्ध विदुषी Shoshana Zuboff ने इस व्यवस्था को “Surveillance Capitalism” कहा है, अर्थात ऐसी पूँजीवादी व्यवस्था जो डिजिटल निगरानी और डेटा नियंत्रण पर आधारित हो।
पत्रकारिता की स्वतंत्रता का वैचारिक आधार
पत्रकारिता की स्वतंत्रता का इतिहास सत्ता के विरुद्ध वैचारिक संघर्ष का इतिहास रहा है। John Milton की प्रसिद्ध कृति Areopagitica (1644) ने सेंसरशिप के विरोध में मजबूत तर्क प्रस्तुत किए। वहीं John Stuart Mill ने On Liberty में विचारों की स्वतंत्रता को लोकतंत्र की आत्मा बताया।
संयुक्त राष्ट्र के United Nations द्वारा जारी Universal Declaration of Human Rights के अनुच्छेद 19 में प्रत्येक व्यक्ति को विचार व्यक्त करने और सूचना प्राप्त व प्रसारित करने का अधिकार दिया गया है। भारत में संविधान का अनुच्छेद 19(1)(a) अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को संवैधानिक संरक्षण प्रदान करता है।
वैश्विक स्तर पर प्रेस की स्वतंत्रता पर संकट
दुनिया भर में पत्रकारिता की स्वतंत्रता पर दबाव लगातार बढ़ रहा है। Julian Assange के खिलाफ कार्रवाई, Jamal Khashoggi की हत्या, Maria Ressa पर मुकदमे, तथा Dmitry Muratov और Anna Politkovskaya पर दमन जैसे मामले प्रेस स्वतंत्रता पर बढ़ते संकट के उदाहरण हैं।
इसी तरह Daphne Caruana Galizia की हत्या, Can Dündar का निर्वासन और Apple Daily पर कार्रवाई ने खोजी पत्रकारिता के सामने खड़े गंभीर खतरों को उजागर किया है।
भारत में प्रेस स्वतंत्रता की स्थिति
भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है, लेकिन प्रेस स्वतंत्रता को लेकर चिंताएँ लगातार बढ़ रही हैं। Reporters Without Borders के 2024 प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक में भारत 157वें स्थान पर रहा। पत्रकारों पर हमले, ऑनलाइन ट्रोलिंग, कॉर्पोरेट दबाव, यूएपीए और देशद्रोह कानूनों का उपयोग, इंटरनेट बंदी तथा डिजिटल निगरानी इसके प्रमुख कारण बताए जाते हैं।
Pegasus spyware विवाद ने पत्रकारों की डिजिटल निगरानी के खतरे को और गंभीर बना दिया। ऐसी परिस्थितियों में कई पत्रकार आलोचनात्मक रिपोर्टिंग से बचने लगते हैं, जिसे “सेल्फ-सेंसरशिप” कहा जाता है।
महिला पत्रकारों के सामने बढ़ती चुनौतियाँ
महिला पत्रकारों के लिए स्थिति और अधिक चुनौतीपूर्ण है। UNESCO की रिपोर्ट के अनुसार 73 प्रतिशत महिला पत्रकारों ने ऑनलाइन हिंसा का अनुभव किया है। ट्रोलिंग, यौन धमकियाँ, मॉर्फिंग और डॉक्सिंग के जरिए उन्हें डराने और चुप कराने की कोशिश की जाती है। इसलिए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता अब केवल कानूनी नहीं, बल्कि सामाजिक और मानसिक सुरक्षा का विषय भी बन गई है।
लोकतंत्र और सूचना की स्वतंत्रता
“फेक न्यूज” रोकने के नाम पर कई सरकारें डिजिटल नियंत्रण बढ़ा रही हैं। लेकिन यदि “झूठी जानकारी” और “सरकार विरोधी जानकारी” के बीच की सीमा धुंधली हो जाए, तो लोकतंत्र के लिए खतरा पैदा हो सकता है।
Edward Snowden द्वारा अमेरिकी निगरानी कार्यक्रमों का खुलासा किए जाने के बाद डिजिटल निगरानी और नागरिक स्वतंत्रता का मुद्दा वैश्विक बहस का केंद्र बन गया।
आज आवश्यकता है कि पत्रकारिता की स्वतंत्रता की रक्षा के लिए डिजिटल अधिकारों के स्पष्ट कानून, सोशल मीडिया कंपनियों की जवाबदेही, पत्रकार सुरक्षा कानून, डेटा संरक्षण नीतियाँ और मीडिया साक्षरता को मजबूत किया जाए।
डिजिटल युग में सूचना ही सबसे बड़ी शक्ति बन चुकी है। जिस समाज में सूचना नियंत्रित होती है, वहां नागरिकों की सोच भी नियंत्रित होने लगती है। इसलिए पत्रकारिता की स्वतंत्रता केवल मीडिया का अधिकार नहीं, बल्कि हर नागरिक के सूचना के अधिकार की रक्षा है। लोकतंत्र की वास्तविक मजबूती इसी में है कि पत्रकार कितनी निर्भीकता से सवाल पूछ सकते हैं। क्योंकि जिस समाज में पत्रकार डरने लगते हैं, वहां सत्य धीरे-धीरे मौन में खो जाता है।
मंदिर में देव प्रतिमा खंडित होने से मचा हड़कंप, पुलिस ने आरोपी को किया गिरफ्तार
कोल्हुई (राष्ट्र की परम्परा)। थाना क्षेत्र के कस्बा स्थित सोनार गली में बुधवार दोपहर एक मंदिर में देव प्रतिमा खंडित किए जाने की घटना से इलाके में सनसनी फैल गई। घटना की जानकारी मिलते ही बड़ी संख्या में लोग मौके पर जुट गए और स्थानीय लोगों में आक्रोश फैल गया। हालांकि पुलिस की तत्परता से स्थिति को समय रहते नियंत्रित कर लिया गया, जिससे कोई बड़ा विवाद नहीं हुआ।
जानकारी के अनुसार बुधवार दोपहर करीब 2 बजे पुलिस को सूचना मिली कि सोनार गली स्थित मंदिर में एक युवक ने घुसकर देव प्रतिमा को नुकसान पहुंचाया है। घटना की खबर फैलते ही आसपास के लोग मंदिर परिसर में पहुंच गए। प्रतिमा खंडित देख लोगों में नाराजगी बढ़ गई और क्षेत्र में तनावपूर्ण माहौल बन गया।
सूचना मिलते ही कोल्हुई थाना पुलिस मौके पर पहुंची और आरोपी को तत्काल हिरासत में ले लिया। आरोपी की पहचान राजेश वर्मा पुत्र जयप्रकाश वर्मा निवासी ग्राम कुशहा थाना कोल्हुई जनपद महराजगंज, उम्र लगभग 30 वर्ष के रूप में हुई है। पुलिस के अनुसार आरोपी मानसिक रूप से विक्षिप्त बताया जा रहा है।
पुलिस ने मामले में त्वरित कार्रवाई करते हुए प्राप्त तहरीर के आधार पर थाना कोल्हुई में मु.अ.सं. 60/2026 के तहत धारा 298 बीएनएस में मुकदमा दर्ज किया। आवश्यक कानूनी प्रक्रिया पूरी करने के बाद आरोपी को न्यायालय भेज दिया गया।
घटना के बाद पुलिस ने इलाके में अतिरिक्त सतर्कता बढ़ा दी है और लोगों से शांति बनाए रखने की अपील की है। अधिकारियों ने कहा कि स्थिति पूरी तरह नियंत्रण में है तथा अफवाह फैलाने वालों पर सख्त कार्रवाई की जाएगी।
स्थानीय लोगों का कहना है कि मंदिर जैसी आस्था के केंद्र में हुई इस घटना से धार्मिक भावनाएं आहत हुई हैं। हालांकि पुलिस की तेजी और सूझबूझ के चलते माहौल बिगड़ने से बच गया। घटना के बाद क्षेत्र में सुरक्षा व्यवस्था भी कड़ी कर दी गई है। गिरफ्तारी करने वाली टीम में उप-निरीक्षक राजीव कुमार सिंह और कांस्टेबल राकेश सिंह शामिल रहे।
घुघली टैक्सी स्टैंड गंदगी और अव्यवस्था का शिकार, यात्रियों को हो रही भारी परेशानी
घुघली (राष्ट्र की परम्परा)। नगर क्षेत्र का टैक्सी स्टैंड इन दिनों बदहाल व्यवस्था, गंदगी और अव्यवस्थित संचालन के कारण लोगों के बीच चर्चा का केंद्र बना हुआ है। यात्रियों की सुविधा के लिए बनाए गए इस टैक्सी स्टैंड की हालत इतनी खराब हो चुकी है कि यहां आने वाले लोगों को बदबू, गंदे पानी और कूड़े-कचरे के बीच घंटों वाहन का इंतजार करना पड़ रहा है।
टैक्सी स्टैंड परिसर में जहां यात्रियों के बैठने की व्यवस्था है, वहीं पास से नाले का गंदा पानी बह रहा है और आसपास कूड़े का अंबार लगा हुआ है। चारों ओर फैली गंदगी और दुर्गंध से यात्रियों के साथ-साथ दुकानदारों और राहगीरों को भी भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि नगर पंचायत द्वारा नियमित साफ-सफाई नहीं कराए जाने से हालात लगातार बिगड़ते जा रहे हैं।
लोगों का कहना है कि नालियों की समय पर सफाई नहीं होने के कारण गंदा पानी सड़क तक फैल जाता है। बारिश के दौरान पूरा इलाका कीचड़ और जलभराव की चपेट में आ जाता है। प्लास्टिक कचरे, सड़े हुए अपशिष्ट और गंदे पानी के कारण संक्रामक बीमारियों का खतरा भी बढ़ गया है। मजबूरी में यात्रियों को इसी गंदगी के बीच बैठकर वाहन का इंतजार करना पड़ता है।
स्थानीय नागरिकों ने यह भी आरोप लगाया कि मुख्य मार्ग पर अवैध रूप से संचालित टैक्सी स्टैंड सड़क सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा बन चुका है। सड़क किनारे बेतरतीब खड़े वाहन आए दिन जाम की स्थिति पैदा कर रहे हैं। कई बार सवारियां बैठाने और उतारने के दौरान दुर्घटना होते-होते बची है। लोगों का कहना है कि यदि प्रशासन ने समय रहते ध्यान नहीं दिया तो कभी भी बड़ा हादसा हो सकता है।
व्यापारियों और राहगीरों का कहना है कि टैक्सी स्टैंड के आसपास फैली गंदगी से पूरे इलाके की छवि खराब हो रही है। बदबू के कारण दुकानों पर ग्राहकों की आवाजाही भी प्रभावित हो रही है, लेकिन जिम्मेदार अधिकारी समस्या की ओर ध्यान नहीं दे रहे हैं।
नगरवासियों ने प्रशासन से मांग की है कि टैक्सी स्टैंड की नियमित साफ-सफाई सुनिश्चित कराई जाए, जल निकासी की उचित व्यवस्था बनाई जाए तथा मुख्य मार्ग से हटाकर टैक्सी स्टैंड को किसी सुरक्षित और व्यवस्थित स्थान पर संचालित कराया जाए, ताकि यात्रियों को राहत मिल सके और दुर्घटनाओं की आशंका को रोका जा सके।
डिजिटल जनगणना 2027 को कानूनी मजबूती : सुप्रीम कोर्ट ने खारिज की चुनौती याचिका
जातिगत जनगणना पर सुप्रीम कोर्ट की ऐतिहासिक मुहर : सामाजिक न्याय और डेटा आधारित शासन का नया अध्याय

✍️एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी, गोंदिया महाराष्ट्र
भारत में वर्षों से चल रही जातिगत जनगणना की बहस को 20 मई 2026 को निर्णायक मोड़ तब मिला जब सुप्रीम कोर्ट ने जातिगत जनगणना के खिलाफ दायर जनहित याचिका को खारिज कर दिया। यह फैसला केवल एक कानूनी प्रक्रिया का अंत नहीं, बल्कि भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था, सामाजिक न्याय की अवधारणा और डेटा आधारित शासन प्रणाली के भविष्य को दिशा देने वाला ऐतिहासिक निर्णय माना जा रहा है।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जनगणना और सामाजिक आंकड़ों का संकलन सरकार का नीतिगत अधिकार है। जब तक कोई नीति संविधान या कानून का उल्लंघन नहीं करती, तब तक न्यायपालिका उसमें हस्तक्षेप नहीं कर सकती। अदालत की यह टिप्पणी भारतीय लोकतंत्र में शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत को और मजबूत करती है।
बीते कुछ महीनों से जातिगत जनगणना को लेकर देश में तीखी राजनीतिक और वैचारिक बहस चल रही थी। समर्थकों का कहना था कि सामाजिक न्याय और कल्याणकारी योजनाओं की वास्तविक प्रभावशीलता के लिए अद्यतन जातिगत आंकड़े आवश्यक हैं, जबकि विरोधियों को आशंका थी कि इससे सामाजिक ध्रुवीकरण बढ़ सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि यदि सरकार सामाजिक और आर्थिक नीतियों को अधिक प्रभावी बनाने के लिए आंकड़े जुटाना चाहती है तो यह उसका वैध प्रशासनिक अधिकार है। अदालत ने यह भी कहा कि किसी नीति के संभावित दुरुपयोग की आशंका मात्र से उसे रोका नहीं जा सकता।
जनगणना 2027 : डिजिटल इंडिया का सबसे बड़ा प्रशासनिक अभियान
भारत की जनगणना 2027 को केवल पारंपरिक जनगणना नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे डिजिटल इंडिया और डेटा आधारित गवर्नेंस के सबसे बड़े प्रशासनिक अभियानों में गिना जा रहा है। लगभग डेढ़ सौ वर्षों पुरानी जनगणना व्यवस्था अब आधुनिक डिजिटल स्वरूप में प्रवेश कर चुकी है।
इस बार जनगणना दो चरणों में आयोजित की जा रही है। पहला चरण अप्रैल 2026 से प्रारंभ हुआ जिसमें हाउस लिस्टिंग और आवासीय गणना की प्रक्रिया पूरी की गई। इस दौरान घरों, भवनों, बिजली, पानी, इंटरनेट, शौचालय, वाहन और सामाजिक-आर्थिक सुविधाओं से संबंधित विस्तृत जानकारी संकलित की गई।
दूसरे चरण में वर्ष 2027 के दौरान प्रत्येक परिवार और उसके सदस्यों की व्यक्तिगत जानकारी दर्ज की जाएगी। इसमें आयु, शिक्षा, रोजगार, भाषा, वैवाहिक स्थिति, प्रवासन और जातिगत विवरण शामिल होंगे।
पहली बार मोबाइल एप, टैबलेट आधारित डेटा एंट्री, ऑनलाइन सत्यापन और रियल टाइम मॉनिटरिंग जैसी तकनीकों का व्यापक उपयोग किया जा रहा है। इससे जनगणना प्रक्रिया अधिक पारदर्शी, तेज और त्रुटिहीन बनने की संभावना है।
सामाजिक न्याय की नई आधारशिला
भारत में 1931 के बाद व्यापक स्तर पर जातिगत आंकड़े उपलब्ध नहीं रहे। यही कारण रहा कि पिछड़े वर्गों की वास्तविक संख्या और सामाजिक-आर्थिक स्थिति को लेकर लगातार विवाद बना रहा। विशेषज्ञों का मानना है कि बिना अद्यतन आंकड़ों के सामाजिक न्याय की नीतियां अधूरी रहती हैं।
सुप्रीम Court ने भी माना कि सरकार के लिए यह जानना आवश्यक है कि अन्य पिछड़ा वर्ग और सामाजिक रूप से वंचित समूहों की वास्तविक संख्या कितनी है ताकि उनके लिए प्रभावी योजनाएं बनाई जा सकें।
इस फैसले के बाद यह संभावना और मजबूत हुई है कि भविष्य में संसाधनों का वितरण, कल्याणकारी योजनाएं और सामाजिक प्रतिनिधित्व अधिक डेटा आधारित और लक्ष्य केंद्रित होंगे।
राजनीतिक और प्रशासनिक प्रभाव
जातिगत जनगणना अब केवल सामाजिक मुद्दा नहीं बल्कि राष्ट्रीय राजनीतिक विमर्श का केंद्र बन चुकी है। बिहार, कर्नाटक सहित कई राज्यों में हुए जातीय सर्वेक्षणों ने इस बहस को नई गति दी।
विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में राजनीतिक दलों की रणनीति, आरक्षण नीति, सामाजिक प्रतिनिधित्व और कल्याणकारी योजनाओं की संरचना पर इस जनगणना का गहरा प्रभाव पड़ेगा।
सरकार की मंशा यह संकेत देती है कि भविष्य की नीतियां अधिक प्रमाणिक आंकड़ों और वास्तविक जरूरतों के आधार पर तैयार की जाएंगी।
वैश्विक संदर्भ में भारत की पहल
दुनिया के अनेक देशों में सामाजिक और आर्थिक नीतियों के निर्माण के लिए नस्ल, जातीयता और सामाजिक पृष्ठभूमि से जुड़े आंकड़ों का उपयोग किया जाता है। अमेरिका, ब्रिटेन और ब्राजील जैसे देशों में जनसांख्यिकीय डेटा नीति निर्माण का महत्वपूर्ण आधार है।
भारत में जातिगत जनगणना को भी अब उसी वैश्विक संदर्भ में देखा जा रहा है जहां डेटा आधारित सामाजिक नीति को लोकतांत्रिक शासन का महत्वपूर्ण स्तंभ माना जाता है।
लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण संदेश
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले ने स्पष्ट कर दिया है कि नीति निर्माण की प्राथमिक जिम्मेदारी निर्वाचित सरकारों की होती है। न्यायपालिका केवल यह सुनिश्चित करती है कि नीतियां संवैधानिक दायरे में हों।
यह निर्णय आने वाले वर्षों में भारत की सामाजिक संरचना, प्रशासनिक नीति, आर्थिक योजनाओं और राजनीतिक विमर्श को गहराई से प्रभावित कर सकता है।
स्पष्ट रूप से कहा जा सकता है कि जनगणना 2027 अब संवैधानिक और कानूनी रूप से मजबूत आधार पर आगे बढ़ेगी तथा डेटा आधारित शासन प्रणाली के नए युग की शुरुआत करेगी।
✍️एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी
गोंदिया, महाराष्ट्र
अनुच्छेद 21 की व्यापक व्याख्या: सुप्रीम कोर्ट ने डॉग लवर्स की सभी याचिकाएं खारिज कीं
आवारा कुत्तों पर सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक रुख: जनसुरक्षा बनाम पशु अधिकार बहस में नया अध्याय

भारत में बढ़ते डॉग बाइट मामलों, रेबीज संक्रमण और सार्वजनिक सुरक्षा को लेकर वर्षों से चल रही बहस को 19 मई 2026 को निर्णायक मोड़ मिला, जब भारतीय सुप्रीम कोर्ट ने डॉग लवर्स, पशु अधिकार कार्यकर्ताओं और विभिन्न गैर-सरकारी संगठनों द्वारा दायर सभी याचिकाओं को खारिज कर दिया।
यह फैसला केवल आवारा कुत्तों के पुनर्वास या नसबंदी तक सीमित नहीं रहा, बल्कि संविधान के अनुच्छेद 21 के अंतर्गत नागरिकों के भयमुक्त और सुरक्षित जीवन के अधिकार तथा पशु संरक्षण के बीच संतुलन स्थापित करने वाला ऐतिहासिक निर्णय बन गया।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि स्कूलों, कॉलेजों, अस्पतालों, रेलवे स्टेशनों, बस स्टैंडों, खेल परिसरों और अन्य भीड़भाड़ वाले सार्वजनिक स्थानों पर आवारा कुत्तों की अनियंत्रित मौजूदगी को सामान्य नहीं माना जा सकता। अदालत ने बच्चों, महिलाओं और बुजुर्गों की सुरक्षा को सर्वोपरि बताते हुए राज्य सरकारों और नगर निकायों को कड़ी जिम्मेदारी निभाने के निर्देश दिए।

डॉग बाइट मामलों पर सुप्रीम कोर्ट की गंभीर टिप्पणी
सर्वोच्च अदालत के समक्ष रखे गए आंकड़ों ने स्थिति की भयावहता को उजागर किया। राजस्थान के श्रीगंगानगर में मात्र 30 दिनों में 1084 डॉग बाइट के मामले दर्ज हुए, जबकि तमिलनाडु में चार महीनों के भीतर दो लाख से अधिक डॉग बाइट केस सामने आए।
अदालत ने टिप्पणी की कि यह केवल प्रशासनिक विफलता नहीं बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातस्थिति का संकेत है। न्यायालय ने कहा कि जब छोटे बच्चों के चेहरे नोचे जा रहे हों, बुजुर्गों पर झुंड बनाकर हमले हो रहे हों और लोग रेबीज के भय में जी रहे हों, तब अदालत जमीनी वास्तविकताओं से आंखें नहीं मूंद सकती।
फैसले का पहला भाग: एबीसी नियमों और राज्यों की विफलता पर चिंता
फैसले के पहले भाग में सुप्रीम कोर्ट ने विभिन्न राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों द्वारा प्रस्तुत रिपोर्टों, एनिमल बर्थ कंट्रोल (ABC) रूल्स 2023 तथा भारतीय पशु कल्याण बोर्ड द्वारा जारी दिशा-निर्देशों की समीक्षा की।
अदालत ने पाया कि अधिकांश राज्यों में नसबंदी, टीकाकरण, पुनर्वास और शेल्टर प्रबंधन की स्थिति बेहद कमजोर है। कई राज्यों में एंटी-रेबीज वैक्सीन की भारी कमी, प्रशिक्षित पशु चिकित्सकों का अभाव तथा नगर निकायों के बीच समन्वय की कमी सामने आई।
न्यायालय ने कहा कि यदि एनिमल बर्थ कंट्रोल नियमों का समय पर और प्रभावी पालन किया गया होता तो स्थिति इतनी गंभीर नहीं बनती।
दूसरा भाग: पशु अधिकार बनाम नागरिक सुरक्षा
डॉग लवर्स और पशु अधिकार संगठनों ने अदालत में तर्क दिया कि नसबंदी और टीकाकरण के बाद कुत्तों को उसी स्थान पर वापस छोड़ा जाना चाहिए। उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 19, अनुच्छेद 21 और अनुच्छेद 51A(जी) का हवाला देते हुए पशुओं के प्रति करुणा को नागरिकों का मौलिक कर्तव्य बताया।
हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने इन दलीलों को पूर्ण रूप से स्वीकार नहीं किया। अदालत ने स्पष्ट कहा कि पशु संरक्षण महत्वपूर्ण है, लेकिन सार्वजनिक सुरक्षा उससे कम महत्वपूर्ण नहीं हो सकती।
न्यायालय ने कहा कि अनुच्छेद 21 केवल जीवित रहने का अधिकार नहीं देता, बल्कि भयमुक्त और सम्मानजनक जीवन का अधिकार भी प्रदान करता है। यदि कोई बच्चा स्कूल जाते समय डर में जी रहा है या बुजुर्ग सार्वजनिक स्थानों पर असुरक्षित महसूस कर रहे हैं, तो राज्य का संवैधानिक दायित्व है कि वह नागरिकों की रक्षा करे।
तीसरा भाग: सार्वजनिक स्थानों से कुत्तों को हटाने के निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया कि स्कूलों, कॉलेजों, अस्पतालों, खेल परिसरों, रेलवे स्टेशनों, बस डिपो, एयरपोर्ट और अन्य भीड़भाड़ वाले सार्वजनिक क्षेत्रों से पकड़े गए आवारा कुत्तों को दोबारा उसी स्थान पर नहीं छोड़ा जाएगा।
अदालत ने राज्यों और नगर निकायों को निर्देश दिए कि पर्याप्त संख्या में आधुनिक शेल्टर होम्स स्थापित किए जाएं, जहां भोजन, चिकित्सा, नसबंदी और टीकाकरण की समुचित व्यवस्था हो।
न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि रेबीज संक्रमित या अत्यधिक आक्रामक व्यवहार वाले कुत्तों के विरुद्ध कानून के अनुसार कार्रवाई की जा सकती है, जिसमें आवश्यक परिस्थितियों में इच्छामृत्यु भी शामिल हो सकती है।
सर्वोच्च अदालत की यह टिप्पणी विशेष रूप से महत्वपूर्ण रही कि —
“लोगों की जान सबसे पहले है।”
राज्यों को चेतावनी और सख्त निर्देश
अदालत ने राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों को नए एनिमल बर्थ कंट्रोल केंद्र स्थापित करने तथा पर्याप्त मात्रा में एंटी-रेबीज वैक्सीन उपलब्ध कराने के निर्देश दिए।
साथ ही न्यायालय ने कहा कि केवल कुत्तों को पकड़कर स्थानांतरित कर देना समाधान नहीं है। वैज्ञानिक तरीके से नसबंदी, टीकाकरण, पुनर्वास और जनसंख्या नियंत्रण कार्यक्रम चलाना आवश्यक है।
सुप्रीम Court ने नवंबर 2025 के आदेश का सही पालन न होने पर नाराजगी जताई और भविष्य में लापरवाही होने पर अवमानना कार्रवाई की चेतावनी भी दी।
मेनका गांधी की प्रतिक्रिया और व्यावहारिक चुनौतियां
पूर्व केंद्रीय मंत्री मेनका गांधी ने कहा कि देशभर में पर्याप्त शेल्टर होम्स और पुनर्वास केंद्र बनाने के लिए लगभग तीन लाख करोड़ रुपये की आवश्यकता होगी, जो वर्तमान आर्थिक परिस्थितियों में बेहद कठिन दिखाई देता है।
उन्होंने यह भी कहा कि रेबीज संक्रमित या अत्यधिक बीमार कुत्तों को इच्छामृत्यु देने का प्रावधान पहले से कानून में मौजूद है, लेकिन उसकी प्रक्रिया अत्यंत जटिल और कठोर नियमों से नियंत्रित है।
भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती
भारत में करोड़ों की संख्या में मौजूद आवारा कुत्तों के लिए पर्याप्त शेल्टर, पशु चिकित्सालय, प्रशिक्षित स्टाफ और वित्तीय संसाधनों की व्यवस्था करना अत्यंत चुनौतीपूर्ण कार्य है।
नगर निकाय पहले से ही कचरा प्रबंधन, जल निकासी और शहरी अव्यवस्था जैसी समस्याओं से जूझ रहे हैं। ऐसे में व्यापक स्तर पर डॉग शेल्टर प्रणाली खड़ी करना केवल न्यायिक आदेश से संभव नहीं होगा। इसके लिए केंद्र और राज्यों के बीच समन्वित नीति, भारी बजटीय निवेश और दीर्घकालिक शहरी नियोजन की आवश्यकता होगी।
अंतरराष्ट्रीय मॉडल और भारत की स्थिति
यूरोप के कई देशों में अनिवार्य पंजीकरण, व्यापक शेल्टर प्रणाली और पालतू पशुओं पर कठोर नियम लागू हैं। कुछ देशों में आक्रामक और संक्रमित कुत्तों के इच्छामृत्यु की स्पष्ट नीति भी है।
भारत की स्थिति इन मॉडलों के बीच फंसी हुई दिखाई देती है, जहां पशु अधिकार, धार्मिक-सांस्कृतिक संवेदनाएं, शहरी अव्यवस्था और सार्वजनिक सुरक्षा एक-दूसरे से टकराती रहती हैं।
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला इसी जटिल संतुलन को स्थापित करने का प्रयास माना जा रहा है।
19 मई 2026 का यह निर्णय भारतीय न्यायिक इतिहास में केवल “डॉग बाइट केस” नहीं बल्कि संविधान के अनुच्छेद 21 की व्यापक व्याख्या, सार्वजनिक सुरक्षा और पशु अधिकारों के बीच संतुलन स्थापित करने वाले ऐतिहासिक फैसले के रूप में याद किया जाएगा।
यदि राज्यों ने अदालत के निर्देशों के अनुरूप आधुनिक शेल्टर होम्स, प्रभावी नसबंदी कार्यक्रम, व्यापक टीकाकरण और वैज्ञानिक पुनर्वास नीति विकसित की, तो भारत में पहली बार आवारा कुत्तों की समस्या को समन्वित सार्वजनिक स्वास्थ्य नीति के रूप में देखा जा सकेगा।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने अंतिम शब्दों में स्पष्ट कर दिया कि अदालत न तो पशुओं के खिलाफ है और न ही पशु प्रेमियों की भावनाओं के विरोध में, लेकिन जब प्रश्न नागरिकों की जान, बच्चों की सुरक्षा और सार्वजनिक स्वास्थ्य का हो, तब राज्य की पहली जिम्मेदारी मनुष्यों के जीवन की रक्षा करना है।
✍️ लेखक : एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी, गोंदिया महाराष्ट्र
पंचायत चुनाव को लेकर गरमाई सियासत, प्रधान संगठन ने प्रशासनिक कार्रवाई पर उठाए सवाल
पंचायत चुनाव टलने की चर्चाओं के बीच प्रधान संगठन आक्रोशित, लखनऊ महासम्मेलन में जाने से पहले कई प्रधान नजरबंद
वर्तमान प्रधानों को प्रशासक बनाए जाने की मांग तेज
महराजगंज(राष्ट्र की परम्परा)। पंचायत चुनाव टलने की संभावनाओं के बीच प्रदेश भर में प्रधान संगठन का विरोध तेज होता जा रहा है। वर्तमान ग्राम प्रधानों को प्रशासक बनाए जाने की मांग को लेकर संगठन अब आंदोलन के मूड में दिखाई दे रहा है। इसी क्रम में 20 मई को लखनऊ में आयोजित प्रस्तावित महासम्मेलन में शामिल होने जा रहे प्रधान संगठन के कई पदाधिकारियों को मंगलवार सुबह पुलिस प्रशासन ने उनके आवास पर ही हाउस अरेस्ट कर लिया।
प्रधान संगठन के जिलाध्यक्ष अनिल कुमार जोशी ने प्रशासन की इस कार्रवाई को अलोकतांत्रिक बताते हुए कड़ी नाराजगी जताई। उन्होंने कहा कि प्रधान संगठन सरकार के विरोध में नहीं है, बल्कि पंचायत व्यवस्था की निरंतरता बनाए रखने और गांवों के विकास कार्य प्रभावित न होने देने की मांग कर रहा है।
उन्होंने कहा कि वर्ष 2021 की तरह पुनः एडीओ पंचायत को प्रशासक नियुक्त किए जाने की चर्चाओं से ग्राम प्रधानों में असमंजस और असंतोष का माहौल है। लोकतांत्रिक प्रक्रिया से चुने गए जनप्रतिनिधियों की अनदेखी उचित नहीं है।
जिलाध्यक्ष ने सरकार से मांग की कि अगले पंचायत चुनाव तक वर्तमान ग्राम प्रधानों के कार्यकाल का विस्तार किया जाए अथवा प्रशासक समिति गठन को लेकर स्पष्ट आदेश जारी किए जाएं, ताकि ग्रामीण विकास योजनाएं प्रभावित न हों और प्रशासनिक व्यवस्था सुचारु बनी रहे।
प्रधान संगठन ने चेतावनी दी है कि यदि सरकार द्वारा शीघ्र निर्णय नहीं लिया गया तो प्रदेश स्तर पर व्यापक आंदोलन की रणनीति तैयार की जाएगी। संगठन के पदाधिकारियों का कहना है कि पंचायत प्रतिनिधियों की उपेक्षा किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं की जाएगी।
पुराने कलेक्ट्रेट में एसी आउटडोर चोरी सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल
रात्रि ड्यूटी न होने से हुई घटना, CRO कोर्ट परिसर में बढ़ी चिंता
गोरखपुर(राष्ट्र की परम्परा)l पुराने कलेक्ट्रेट स्थित मुख्य राजस्व अधिकारी (CRO) कोर्ट परिसर से वोल्टास कंपनी के स्प्लिट एसी का आउटडोर यूनिट चोरी होने का मामला सामने आया है। इस घटना ने कलेक्ट्रेट की सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
सूत्रों के मुताबिक, गर्मी बढ़ने पर जब एसी की जरूरत पड़ी तो सर्विसिंग के लिए मिस्त्री बुलाया गया। मौके पर पहुंचने पर पता चला कि एसी का आउटडोर यूनिट पहले से ही गायब है। यह जानकारी मिलते ही कर्मचारियों में चिंता का माहौल बन गया।
प्रारंभिक जानकारी के अनुसार, पुराने कलेक्ट्रेट परिसर में रात्रि के समय किसी प्रकार की ड्यूटी या निगरानी की व्यवस्था नहीं होने के कारण चोरों ने इस घटना को अंजाम दिया। बिना किसी रोक-टोक के आउटडोर यूनिट को उखाड़कर ले जाना सुरक्षा में बड़ी चूक मानी जा रही है।
कलेक्ट्रेट जैसे संवेदनशील सरकारी परिसर में इस तरह की चोरी होना प्रशासनिक लापरवाही की ओर इशारा करता है। फिलहाल यह स्पष्ट नहीं हो सका है कि चोरी कब और किसने की। मामले की जांच शुरू कर दी गई है और सीसीटीवी फुटेज खंगाले जा रहे हैं।
इस घटना के बाद कर्मचारियों और आम लोगों में नाराजगी देखी जा रही है। सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करने, रात्रि ड्यूटी लगाने और निगरानी बढ़ाने की मांग उठने लगी है, ताकि भविष्य में इस तरह की घटनाओं को रोका जा सके।
