
महराजगंज (राष्ट्र की परम्परा)। सनातन धर्म में धनतेरस का पर्व केवल धन-संपत्ति और खरीदारी का उत्सव नहीं, बल्कि आरोग्य, आयु, सुख-समृद्धि और आध्यात्मिक चेतना का प्रतीक भी है। कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को मनाया जाने वाला यह पावन पर्व पांच दिवसीय दीपोत्सव का शुभारंभ करता है। इस दिन भगवान धन्वंतरि, माता लक्ष्मी और धन के देवता कुबेर की पूजा-अर्चना कर श्रद्धालु परिवार की सुख-समृद्धि, उत्तम स्वास्थ्य और दीर्घायु की कामना करते हैं।
वाराणसी क्षेत्र के आचार्य राजू उपाध्याय के अनुसार, पौराणिक मान्यताओं में धनतेरस का विशेष धार्मिक महत्व है। मान्यता है कि देवताओं और असुरों के बीच हुए समुद्र मंथन के दौरान इसी तिथि पर भगवान धन्वंतरि हाथों में अमृत कलश लेकर प्रकट हुए थे। भगवान धन्वंतरि को भगवान विष्णु का अंशावतार तथा आयुर्वेद और आरोग्य का अधिष्ठाता देवता माना जाता है। यही वजह है कि धनतेरस पर उनकी पूजा का विशेष विधान है। यह पर्व संदेश देता है कि जीवन में धन-संपत्ति के साथ अच्छा स्वास्थ्य भी सबसे बड़ी पूंजी है।
आचार्य राजू उपाध्याय ने बताया कि धनतेरस के दिन भगवान धन्वंतरि की आराधना कर परिवार के सभी सदस्यों के निरोगी और स्वस्थ जीवन की कामना करनी चाहिए। पूजा में स्वच्छता, सात्विकता और श्रद्धा का विशेष ध्यान रखना चाहिए। उनके अनुसार, निरोगी शरीर के बिना भौतिक सुख-सुविधाओं का वास्तविक आनंद संभव नहीं है।
धनतेरस पर माता लक्ष्मी और भगवान कुबेर की पूजा का भी विशेष महत्व है। माता लक्ष्मी को धन, वैभव और ऐश्वर्य की अधिष्ठात्री देवी, जबकि कुबेर को धन का संरक्षक माना जाता है। इस दिन लोग अपने घरों और प्रतिष्ठानों में दीप प्रज्वलित कर विधि-विधान से लक्ष्मी-कुबेर का पूजन करते हैं। धार्मिक मान्यता है कि श्रद्धा और भक्ति के साथ की गई आराधना से घर में सुख-शांति और समृद्धि का वातावरण बनता है।
इस अवसर पर सोना, चांदी, पीतल, तांबा सहित अन्य धातुओं से बनी वस्तुओं की खरीदारी को शुभ माना जाता है। लोग अपनी सामर्थ्य के अनुसार आभूषण, बर्तन, वाहन और घरेलू उपयोग की वस्तुएं खरीदते हैं। वहीं, झाड़ू खरीदने की परंपरा को स्वच्छता और माता लक्ष्मी के आगमन से जोड़कर देखा जाता है।
धनतेरस की संध्या पर यमराज के निमित्त दीपदान करने की प्राचीन परंपरा भी निभाई जाती है, जिसे यम दीपदान कहा जाता है। आचार्य उपाध्याय के अनुसार, घर के बाहर दक्षिण दिशा में दीपक जलाकर भगवान यमराज से परिवार के सदस्यों की दीर्घायु और मंगलमय जीवन की प्रार्थना की जाती है। धार्मिक मान्यता है कि श्रद्धापूर्वक यम दीपदान करने से अकाल मृत्यु का भय दूर होता है। यह परंपरा जीवन की अनिश्चितता का बोध कराने के साथ ईश्वर के प्रति आस्था और कृतज्ञता का संदेश भी देती है।
धनतेरस के साथ ही दीपावली की तैयारियां भी जोर पकड़ने लगती हैं। घरों की साफ-सफाई, रंगाई-पुताई और सजावट के साथ दीप प्रज्वलित करने की परंपरा है। आचार्य राजू उपाध्याय ने कहा कि धनतेरस का वास्तविक संदेश केवल धन अर्जित करना नहीं, बल्कि उसका सदुपयोग, स्वास्थ्य की रक्षा, सदाचार, संतोष और जरूरतमंदों की सहायता करना भी है। घर में स्वच्छता, आपसी प्रेम, आरोग्य और सकारात्मकता का वातावरण ही वास्तविक सुख-समृद्धि का आधार है। इसी धार्मिक और आध्यात्मिक संदेश के साथ धनतेरस से पांच दिवसीय दीपोत्सव का शुभारंभ होता है।
