महँगाई की मार से महँगे हुए मंगल के प्रतीक, त्योहार की खुशियों पर भारी पड़ता बाजार

Ai निर्मित

कवि, लेखक एवं समीक्षक संजय एम. तराणेकर की कलम से

बाजारों में दीपावली की रौनक है, दुकानों पर सजावट की चमक है और हर तरफ शुभ-लाभ के प्रतीकों की बहार है। लेकिन जब आस्था से जुड़े मंगल प्रतीकों के दाम आम आदमी की जेब पर भारी पड़ने लगें, तो त्योहार की खुशियों के बीच महँगाई का दर्द भी उभर आता है। इसी बाजार की बदलती तस्वीर और आम आदमी की परेशानी को शब्द देती है कवि संजय एम. तराणेकर की यह सामयिक कविता।

बाजारों में रौनक और शुभ-लाभ के भाव!

बाजारों में रौनक आई, दीपों का त्योहार है,
शुभ-लाभ और स्वागत के बढ़ गए भाव हैं।
कभी दस रुपये में मिलें थे, मंगल के संदेश,
कीमत सुन सोच रहा, आम आदमी विशेष।

स्वागत करना महँगा, शुभ-लाभ भी महँगा,
महँगाई ने कर दिया है, हर उत्सव को तंग!
लक्ष्मीजी के चरणों का हैं, बढ़ गया बाजार,
पूजा से पहले जेब टटोले, हरेक दुकानदार।

शंख, स्वास्तिक व कलश, सभी के दाम बढ़े,
खुशियों के इस पर्व में, बजट के पहिए अड़े।
तीन दिनों का बाजार हुआ, पाँच दिनों से कम,
खरीदार की जेब में पैसा, दुकानदार को गम।

तीस फीसदी दाम बढ़े हैं, ग्राहक हुआ उदास,
बिक्री की उम्मीदों पर भी, पड़ने लगी है घास।
शुभ-लाभ के खेल में, लाभ किसे मिल पाए?
शुभ की आशा लें ग्राहक, खाली हाथ न जाए।

लक्ष्मी पूजा तभी सफल, जब मन में हो प्यार,
अब मंगल के प्रतीकों को न बनाओ व्यापार।
दीप जलें हर घर-आँगन, खुशियों की बरसात,
महँगे शुभ-लाभ से बेहतर, ‘सस्ती’ हो सौगात।


रचनाकार परिचय-संजय एम. तराणेकर
कवि, लेखक एवं समीक्षक
31, संजय नगर, इन्दौर–452011
मध्य प्रदेश