थाने की चौखट पर टूटता भरोसा, वर्दी की गरिमा पर उठते सवाल

विशेष कविता | संजय एम. तराणेकर

जिस वर्दी पर आमजन अपनी सुरक्षा का भरोसा करता है, जब उसी वर्दी पर गंभीर आरोप लगते हैं, तो कानून-व्यवस्था और जनविश्वास दोनों पर सवाल खड़े होते हैं। गम्हरिया थाने से जुड़े मामले के संदर्भ में प्रस्तुत यह कविता सुरक्षा की आस लेकर पहुंचने वाली महिलाओं की पीड़ा और रक्षक की जिम्मेदारी को शब्द देती है।
रक्षक ही बन बैठे भक्षक!
जिस थाने में सुरक्षा की उम्मीद ले आई,
वहीं इंसानियत शर्मसार करने को आई।
जिस वर्दी पर विश्वास जताया था उसने,
उसी वर्दी पर सवालों की बौछार आई।
यूँ पति के अत्याचारों से बचने की आस,
कानून के दरवाजे पर न्याय की तलाश।
सोचा, पुलिस उसे सुरक्षा प्रदान करेगी,
मगर आरोपों ने व्यवस्था की पोल खोल दी।
जिस हाथ में कानून की जिम्मेदारी थी,
क्या उसमें ऐसी भी कोई लाचारी थी?
जिसे जनता का रक्षक बनकर रहना था,
वह आरोपों के घेरे में खड़ा नजर आया।
वर्दी की गरिमा पर दाग न लगना चाहिए,
रक्षक को कभी भक्षक नहीं बनना चाहिए।
थाने की चौखट पर जब विश्वास टूटता है,
आमजन का कानून से भरोसा उठता है।
रचनाकार: संजय एम. तराणेकर
कवि, लेखक एवं समीक्षक
📍 इन्दौर–452011, मध्य प्रदेश
संदर्भ: गम्हरिया थाने से जुड़ा मामला — “यहाँ भी बहू-बेटी असुरक्षित?”