कुशीनगर के आसमान में गूंजा ‘लॉन्च’ का शोर! 17 राज्यों के 76 दलों का जमावड़ा, पहले दिन 20 कैनसैट लॉन्च; निरमा यूनिवर्सिटी का रॉकेट बना आकर्षण

देवरिया/कुशीनगर (राष्ट्र की परम्परा)। नारायणी नदी के तट पर रविवार को आसमान की ओर उठती निगाहें, उल्टी गिनती के बीच गूंजता ‘थ्री, टू, वन, जीरो… लॉन्च!’ और फिर उड़ान भरता रॉकेट। यह किसी फिल्म का दृश्य नहीं, बल्कि कुशीनगर के पिपराघाट में आयोजित राष्ट्रीय स्तर की मॉडल रॉकेट्री और कैनसैट प्रतियोगिता का रोमांचक नजारा था। यहां देश के 17 राज्यों से पहुंचीं 76 चयनित टीमों के युवा वैज्ञानिक अपनी तकनीकी प्रतिभा का प्रदर्शन कर रहे हैं। प्रतियोगिता के पहले दिन विभिन्न टीमों के 20 कैनसैट लॉन्च किए गए, जबकि अहमदाबाद की निरमा यूनिवर्सिटी ने मॉडल रॉकेट्री श्रेणी में पहला रॉकेट लॉन्च कर आयोजन के रोमांच को और बढ़ा दिया। 3 नवंबर तक चलने वाले इस आयोजन में विद्यार्थियों को अपने प्रयोगों के जरिए इंजीनियरिंग की वास्तविक चुनौतियों से जूझने का अवसर मिल रहा है।
छोटे शहर में अंतरिक्ष विज्ञान का बड़ा मंच
भारतीय राष्ट्रीय अंतरिक्ष संवर्धन एवं प्राधिकरण केंद्र (इन-स्पेस) ने इसरो और श्रीनारायणी साइंस डेवलपमेंट फाउंडेशन (एसएसडीएफ) के सहयोग से प्रतियोगिता का आयोजन किया है। इसका उद्देश्य विद्यार्थियों को अंतरिक्ष विज्ञान, रॉकेट तकनीक और उपग्रह आधारित प्रयोगों से जोड़ना है। प्रतियोगिता में शामिल युवा केवल तैयार मॉडल दिखाने नहीं आए हैं, बल्कि अपनी तकनीकी समझ, टीमवर्क और समस्या सुलझाने की क्षमता को वास्तविक परिस्थितियों में परख रहे हैं।
उद्घाटन समारोह में देवरिया के सांसद शशांक मणि त्रिपाठी, इन-स्पेस के अध्यक्ष डॉ. पवन कुमार गोयनका, निदेशक (प्रमोशन) डॉ. विनोद कुमार, इसरो के पूर्व एसोसिएट रॉय एम. चेरियन, कैनसैट मूल्यांकन समिति के प्रमुख डॉ. सुरेंद्र पाल और स्थानीय आयोजक संस्था एसएसडीएफ के निदेशक मनीष बजाज सहित विभिन्न संस्थानों के शिक्षक, मार्गदर्शक और प्रतिभागी मौजूद रहे।
14 से 450 से अधिक स्पेस स्टार्टअप तक पहुंचा भारत
इन-स्पेस के अध्यक्ष डॉ. पवन कुमार गोयनका ने कहा कि पिछले पांच वर्षों में भारत के अंतरिक्ष क्षेत्र में उल्लेखनीय बदलाव आया है। उनके अनुसार, वर्ष 2019 में देश में केवल 14 स्पेस स्टार्टअप थे, जबकि अब इनकी संख्या 450 से अधिक हो गई है। इससे युवाओं के सामने अंतरिक्ष तकनीक, प्रक्षेपण प्रणालियों, उपग्रह आंकड़ों पर आधारित सेवाओं और उद्यमिता के नए रास्ते खुले हैं।
उन्होंने कहा कि प्रतियोगिता में विद्यार्थियों का उत्साह और आत्मविश्वास उनकी तैयारी को दर्शाता है। ऐसे आयोजन कक्षा में मिलने वाली सैद्धांतिक शिक्षा को व्यावहारिक अनुभव से जोड़ते हैं। विद्यार्थियों को यहां अपनी तकनीकी क्षमताओं को परखने और गलतियों से सीखने का अवसर मिलता है।
असफलता से घबराएं नहीं, प्रयोग से सीखें युवा
सांसद शशांक मणि त्रिपाठी ने कहा कि अंतरिक्ष तकनीक के अवसर बड़े शहरों तक सीमित नहीं रहने चाहिए। टियर-2 और टियर-3 शहरों तथा छोटे जिलों के विद्यार्थियों तक भी विज्ञान और तकनीक की सुविधाएं पहुंचनी चाहिए। उन्होंने प्रतिभागियों को संदेश दिया कि रॉकेट या कैनसैट का प्रयोग अपेक्षा के अनुरूप सफल न हो, तो निराश होने के बजाय उससे सीख लेकर आगे बढ़ना चाहिए।
उन्होंने कहा कि धैर्य, टीमवर्क और लगातार प्रयास ही भविष्य के वैज्ञानिकों, इंजीनियरों और उद्यमियों को आगे बढ़ाएंगे। कुशीनगर और देवरिया जैसे क्षेत्रों में राष्ट्रीय स्तर की वैज्ञानिक गतिविधियां आयोजित होना स्थानीय युवाओं को नई संभावनाओं से परिचित कराने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।
रोजगार मेले में भी दिखेंगे करियर के अवसर
इन-स्पेस के निदेशक (प्रमोशन) डॉ. विनोद कुमार ने बताया कि मॉडल रॉकेट्री प्रतियोगिता के तीसरे संस्करण और कैनसैट इंडिया प्रतियोगिता के चौथे संस्करण के लिए पंजीकरण 1 दिसंबर 2026 से शुरू होंगे। दोनों प्रतियोगिताओं में कुल 10 ट्रॉफियां प्रदान की जाएंगी।
उन्होंने बताया कि विद्यार्थियों को अंतरिक्ष क्षेत्र में रोजगार और करियर के अवसरों से जोड़ने के लिए आयोजन के साथ रोजगार मेले का भी प्रबंध किया गया है, जिसमें चार स्पेस कंपनियां हिस्सा ले रही हैं। उन्होंने आयोजन में सहयोग देने वाली इन-स्पेस, इसरो, एनएएल, थ्रस्टेक इंडिया, एसएसडीएफ, बरगद अमृत संगठन और अन्य सहयोगी संस्थाओं तथा निर्णायक मंडल के सदस्यों के प्रति आभार जताया।
डॉ. विनोद कुमार ने कहा कि ऐसी प्रतियोगिताएं विद्यार्थियों को किताबी ज्ञान से आगे बढ़कर वास्तविक इंजीनियरिंग समस्याओं पर काम करने का अवसर देती हैं। इससे तकनीकी दक्षता, समस्या समाधान और सामूहिक रूप से काम करने की क्षमता विकसित होती है।
स्थानीय आयोजक संस्था एसएसडीएफ के निदेशक मनीष बजाज ने प्रतिभागी टीमों, शिक्षकों और मार्गदर्शकों का स्वागत किया। उन्होंने आयोजन को सफल बनाने में सहयोग देने वाली संस्थाओं और स्थानीय टीम के सदस्यों के योगदान की सराहना की।
अपने रॉकेट की उड़ान देख थम गईं निगाहें
दोपहर 2:20 बजे निरमा यूनिवर्सिटी के रॉकेट ने भरी उड़ान, ग्रामीणों में भी दिखा जबरदस्त कौतूहल
कुशीनगर के पिपराघाट में रविवार को दोपहर 2:20 बजे जैसे ही अहमदाबाद की निरमा यूनिवर्सिटी के मॉडल रॉकेट के लॉन्च की उल्टी गिनती पूरी हुई, मैदान में मौजूद लोगों की निगाहें आसमान पर टिक गईं। किसी ने मोबाइल कैमरा चालू कर दिया तो कोई रॉकेट की दिशा में नजरें गड़ाए खड़ा रहा। रॉकेट के जमीन छोड़ते ही विद्यार्थियों के चेहरों पर उत्साह साफ दिखाई देने लगा। सुबह 9:43 बजे ड्रोन के माध्यम से कैनसैट लॉन्चिंग की प्रक्रिया भी शुरू हुई थी।
इस रोमांच को देखने के लिए प्रतियोगिता में हिस्सा लेने वाली टीमों के अलावा आसपास के गांवों से भी लोग पहुंचे थे। बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक में यह जानने की उत्सुकता थी कि विद्यार्थियों ने अपने हाथों से तैयार रॉकेट को उड़ान भरने लायक कैसे बनाया। खुले मैदान में मौजूद लोगों के लिए यह विज्ञान को अपनी आंखों के सामने घटित होते देखने जैसा अनुभव था।
हालांकि, निरमा यूनिवर्सिटी की टीम को अपने रॉकेट मिशन में आंशिक सफलता ही मिली। शुरुआती उत्साह के बाद टीम के सामने अपने मॉडल के प्रदर्शन का आकलन करने और कमियों को समझने की चुनौती थी। रॉकेट का अपेक्षा के अनुरूप प्रदर्शन न होना उनके लिए सीखने का अवसर भी बना। आखिर अंतरिक्ष विज्ञान में हर प्रयोग केवल सफलता की कहानी नहीं होता, बल्कि हर नतीजा अगली कोशिश को बेहतर बनाने का रास्ता भी खोलता है।
तीन नवंबर तक जारी रहेगा रोमांच: अब प्रतियोगिता के आगामी चरणों में प्रतिभागियों के सामने अपनी तकनीकी तैयारी और प्रयोगों को साबित करने का अवसर होगा। पिपराघाट में आयोजित यह आयोजन स्थानीय युवाओं के लिए विज्ञान, नवाचार और अंतरिक्ष क्षेत्र में करियर की संभावनाओं को करीब से समझने का मंच बन रहा है।