उपहार, विदेशी यात्राएं और फ्रीबीज के जरिए डॉक्टरों को प्रभावित करने के आरोपों की होगी जांच • केंद्र सरकार को तीन सदस्यीय विशेषज्ञ समिति गठित करने का निर्देश • एसेंशियल कमोडिटीज एक्ट 1955, ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट 1940 और यूसीपीएमपी 2024 के कानूनी पहलुओं पर मंथन • 29 जनवरी 2027 को अगली सुनवाई

लेखक: एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी, गोंदिया, महाराष्ट्र

गोंदिया, महाराष्ट्र। चिकित्सा सेवा को सदियों से मानवता की सबसे पवित्र सेवाओं में गिना जाता रहा है। चिकित्सक को केवल उपचार करने वाला व्यक्ति नहीं, बल्कि जीवनरक्षक और संकट की घड़ी में आशा का प्रतीक माना जाता है। भारत सहित विश्व की अनेक सभ्यताओं में वैद्य और चिकित्सकों के प्रति विश्वास एवं सम्मान की यही परंपरा रही है। लेकिन बदलते आर्थिक और सामाजिक परिवेश में स्वास्थ्य सेवाओं के बढ़ते व्यावसायीकरण, महंगे उपचार, अनावश्यक जांचों की शिकायतों और दवाओं की कीमतों को लेकर उठते सवालों ने डॉक्टर और मरीज के बीच विश्वास के रिश्ते को नई चुनौती दी है।

मामूली बीमारी में महंगे उपचार, जरूरत से अधिक जांच, अस्पतालों के भारी बिल, आईसीयू या वेंटिलेटर के कथित दुरुपयोग और दवाओं की कीमतों से जुड़ी शिकायतें आम लोगों की चिंता बढ़ाती रही हैं। हालांकि, किसी एक घटना या आरोप के आधार पर पूरे चिकित्सा समुदाय को दोषी ठहराना उचित नहीं होगा, लेकिन जब डॉक्टर की प्रिस्क्रिप्शन लिखने की स्वतंत्रता को किसी व्यावसायिक प्रलोभन से प्रभावित किए जाने की आशंका पैदा होती है, तो यह मामला सीधे मरीज के स्वास्थ्य, आर्थिक हित और जीवन से जुड़ जाता है।

इसी व्यापक चिंता के बीच 8 अक्टूबर 2026 को सुप्रीम कोर्ट का महत्वपूर्ण हस्तक्षेप सामने आया। फेडरेशन ऑफ मेडिकल एंड सेल्स रिप्रेजेंटेटिव्स एसोसिएशन्स ऑफ इंडिया एवं अन्य बनाम भारत संघ एवं अन्य, रिट याचिका (सिविल) संख्या 323/2021 से जुड़े मामले में अदालत ने केंद्र सरकार को फार्मास्युटिकल कंपनियों की मार्केटिंग गतिविधियों के नियमन की आवश्यकता पर विचार करने के लिए तीन सदस्यीय विशेषज्ञ समिति गठित करने का निर्देश दिया। समिति संबंधित सुझावों और अभ्यावेदनों पर विचार कर केंद्र सरकार को अपनी सिफारिशें देगी। मामले को 29 जनवरी 2027 को केंद्र सरकार के अनुपालन संबंधी हलफनामे पर विचार के लिए सूचीबद्ध किया गया है।

इस घटनाक्रम ने एक बार फिर महत्वपूर्ण सवाल खड़ा किया है—क्या डॉक्टरों को दिए जाने वाले महंगे उपहार, आतिथ्य, यात्रा सुविधाएं और अन्य आर्थिक लाभ दवाओं के प्रिस्क्रिप्शन को प्रभावित कर सकते हैं? यदि ऐसा होता है, तो इसकी जिम्मेदारी केवल लाभ लेने वाले व्यक्ति की होगी या लाभ देने वाली कंपनी की भी जवाबदेही तय की जानी चाहिए?

2021 की याचिका से शुरू हुई नियामक बहस

इस मामले की जड़ वर्ष 2021 में दायर याचिका में है। याचिकाकर्ता संगठन ने फार्मास्युटिकल कंपनियों की कथित अनैतिक मार्केटिंग गतिविधियों को नियंत्रित करने के लिए प्रभावी और कानूनी रूप से लागू किए जा सकने वाले नियामक ढांचे की मांग की थी।

याचिका में आरोप लगाया गया कि कुछ कंपनियां डॉक्टरों को महंगे उपहार, आतिथ्य, यात्रा सुविधाएं, विदेशी यात्राएं, नकद अथवा अन्य प्रकार के लाभ देकर अपने उत्पादों की बिक्री बढ़ाने और अधिक प्रिस्क्रिप्शन हासिल करने का प्रयास करती हैं। ऐसी गतिविधियों से महंगी ब्रांडेड दवाओं अथवा अनावश्यक दवा-संयोजनों के इस्तेमाल को बढ़ावा मिलने की आशंका जताई गई। इसका अंतिम आर्थिक बोझ मरीज पर पड़ सकता है।

सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप का महत्वपूर्ण पहलू यह है कि बहस केवल डॉक्टरों के पेशेवर आचरण तक सीमित नहीं रही। अदालत के समक्ष यह सवाल भी आया कि यदि किसी डॉक्टर को अनुचित लाभ लेने के लिए अनुशासनात्मक कार्रवाई का सामना करना पड़ सकता है, तो उस लाभ की पेशकश करने वाली कंपनी के विरुद्ध प्रभावी कानूनी व्यवस्था कितनी मजबूत है?

केंद्र सरकार ने अदालत के समक्ष फार्मास्युटिकल कंपनियों के आचरण को सीधे और बाध्यकारी तरीके से नियंत्रित करने के लिए स्पष्ट वैधानिक व्यवस्था की कमी से जुड़े मुद्दे को उठाया। प्रस्तावित विशेषज्ञ समिति इसी नियामक अंतर की समीक्षा करेगी और यह विचार करेगी कि वर्तमान व्यवस्था पर्याप्त है या अलग कानून अथवा किसी मौजूदा कानून में संशोधन की जरूरत है।

यूसीपीएमपी 2024: नैतिक संहिता कितनी प्रभावी?

फार्मास्युटिकल मार्केटिंग प्रथाओं को नियंत्रित करने के लिए यूनिफॉर्म कोड फॉर फार्मास्युटिकल मार्केटिंग प्रैक्टिसेज यानी यूसीपीएमपी 2024 महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। औषध विभाग की ओर से जारी इस संहिता का उद्देश्य फार्मा कंपनियों और स्वास्थ्य पेशेवरों के बीच पारदर्शिता, नैतिकता और जिम्मेदारी सुनिश्चित करना है।

इस संहिता के अंतर्गत फार्मास्युटिकल कंपनियों और संबंधित संगठनों के लिए नैतिक मानकों, शिकायतों के निस्तारण और अनुपालन की व्यवस्था निर्धारित की गई है। एथिक्स कमेटियों के माध्यम से शिकायतों पर विचार करने तथा औषध विभाग के स्तर पर अपीलीय व्यवस्था का भी प्रावधान है।

संहिता का मूल उद्देश्य स्पष्ट है—दवाओं का प्रचार वैज्ञानिक तथ्यों, प्रमाणों और अनुमोदित चिकित्सकीय उपयोग के अनुरूप होना चाहिए। डॉक्टरों को निजी लाभ देकर उनके पेशेवर निर्णय को प्रभावित करने वाली गतिविधियों से बचना जरूरी है। उपहार, नकद अथवा अन्य अनुचित आर्थिक लाभ और आतिथ्य पर नियंत्रण का उद्देश्य यही है कि डॉक्टर का निर्णय मरीज की चिकित्सा आवश्यकता के अनुसार हो, न कि किसी कंपनी के व्यावसायिक हित के अनुसार।

हालांकि, यह समझना भी जरूरी है कि प्रत्येक चिकित्सकीय सम्मेलन, वैज्ञानिक चर्चा या डॉक्टर और फार्मा कंपनी के बीच होने वाला हर संपर्क अपने-आप में अनैतिक नहीं है। चिकित्सा अनुसंधान, चिकित्सकीय शिक्षा और नई दवाओं के बारे में प्रमाण-आधारित जानकारी का आदान-प्रदान स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए आवश्यक है। समस्या तब पैदा होती है, जब वैज्ञानिक सहयोग की आड़ में निजी लाभ, प्रिस्क्रिप्शन को प्रभावित करने या मरीज के हितों से समझौता करने की स्थिति बनती है।

यही वजह है कि अब यूसीपीएमपी 2024 की प्रभावशीलता, उसके अनुपालन और उल्लंघन की स्थिति में उपलब्ध कार्रवाई के उपायों पर गंभीरता से विचार किए जाने की आवश्यकता है। नैतिक संहिता का होना एक महत्वपूर्ण कदम है, लेकिन उसका प्रभाव इस बात पर निर्भर करता है कि शिकायतों की जांच कितनी निष्पक्षता से होती है और उल्लंघन के मामलों में जवाबदेही कितनी प्रभावी रहती है।

एसेंशियल कमोडिटीज एक्ट और ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट की भूमिका

इस पूरे विवाद में एसेंशियल कमोडिटीज एक्ट, 1955 और ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट, 1940 जैसे कानूनों की प्रासंगिकता भी महत्वपूर्ण है। सवाल यह है कि क्या मौजूदा कानूनी प्रावधानों के माध्यम से फार्मास्युटिकल मार्केटिंग गतिविधियों पर प्रभावी नियंत्रण स्थापित किया जा सकता है, या इसके लिए अलग वैधानिक व्यवस्था की जरूरत पड़ेगी?

सरकार के समक्ष पहले भी यूसीपीएमपी को वैधानिक आधार देने और मौजूदा कानूनों के माध्यम से नियमन की संभावनाओं पर विचार किया गया है। लेकिन संबंधित कानूनों के अधिकार-क्षेत्र, उनके वास्तविक उपयोग और कंपनियों की मार्केटिंग गतिविधियों पर सीधे कार्रवाई करने की क्षमता जैसे सवाल सामने आते रहे हैं।

इसी पृष्ठभूमि में अब विशेषज्ञ समिति की भूमिका अहम हो जाती है। उसे यह देखना होगा कि मौजूदा व्यवस्था में कहां कमियां हैं, शिकायतों की जांच और निस्तारण में किन सुधारों की जरूरत है तथा कंपनियों के लिए स्पष्ट और बाध्यकारी जवाबदेही कैसे सुनिश्चित की जा सकती है।

यदि अलग कानून की आवश्यकता सामने आती है, तो उसके स्वरूप, दायरे, उल्लंघन की परिभाषा, दंडात्मक प्रावधानों और निष्पक्ष जांच की प्रक्रिया पर भी विचार करना होगा। साथ ही, ऐसी व्यवस्था बनाते समय वास्तविक वैज्ञानिक सहयोग और अनैतिक व्यावसायिक प्रलोभन के बीच स्पष्ट अंतर बनाए रखना आवश्यक होगा।

अपेक्स लेबोरेटरीज मामले ने भी उठाए थे गंभीर सवाल

फार्मा कंपनियों द्वारा डॉक्टरों को दिए जाने वाले फ्रीबीज का मुद्दा नया नहीं है। वर्ष 2022 में अपेक्स लेबोरेटरीज प्राइवेट लिमिटेड बनाम डिप्टी कमिश्नर ऑफ इनकम टैक्स मामले में सुप्रीम कोर्ट ने इस विषय पर महत्वपूर्ण टिप्पणी की थी।

अदालत ने डॉक्टर और मरीज के बीच विश्वास के रिश्ते तथा डॉक्टर के प्रिस्क्रिप्शन के प्रभाव को ध्यान में रखते हुए फार्मा कंपनियों की ओर से दिए जाने वाले निषिद्ध लाभों के आर्थिक और नैतिक पहलुओं पर विचार किया था। उस मामले में अदालत ने माना कि डॉक्टरों को दिए गए ऐसे लाभ, जो लागू नियमों के तहत निषिद्ध हों, फार्मा कंपनी के लिए आयकर अधिनियम की धारा 37(1) के अंतर्गत व्यावसायिक खर्च की कटौती के पात्र नहीं हैं।

इस फैसले का महत्व केवल कर कटौती तक सीमित नहीं है। यह उस व्यापक प्रश्न की ओर भी ध्यान आकर्षित करता है कि यदि दवाओं के प्रचार और विपणन पर होने वाला खर्च अनुचित लाभ देने में इस्तेमाल होता है, तो उसका आर्थिक प्रभाव अंततः मरीजों तक किस तरह पहुंच सकता है।

दवाओं की कीमतों के निर्धारण में अनेक कारक काम करते हैं, इसलिए प्रत्येक महंगी दवा की कीमत को सीधे ऐसे खर्चों से जोड़ना उचित नहीं होगा। फिर भी, अनैतिक मार्केटिंग पर नियंत्रण मरीजों के हितों की रक्षा, दवाओं के तर्कसंगत उपयोग और स्वास्थ्य व्यवस्था में विश्वास बनाए रखने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकता है।

शिकायतें, जांच और जवाबदेही: व्यवस्था के सामने बड़ी चुनौती

इस प्रकरण में शिकायत-निवारण तंत्र की वास्तविक प्रभावशीलता भी चर्चा का विषय है। केंद्र सरकार के समक्ष प्रस्तुत विवरण में यूसीपीएमपी से संबंधित शिकायतों और उनके निस्तारण का उल्लेख किया गया। उपलब्ध विवरण के अनुसार, संबंधित व्यवस्था को तीन शिकायतें मिली थीं। इनमें एक मामले में लगभग 30 डॉक्टरों को महंगी यात्राएं उपलब्ध कराने का आरोप था। इस मामले में कंपनी को संहिता के उल्लंघन के लिए फटकार लगाए जाने और संबंधित डॉक्टरों की सूची उचित कार्रवाई के लिए राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग को भेजे जाने का उल्लेख है।

ऐसे मामलों से यह सवाल उठता है कि शिकायतों की संख्या, जांच की गति, कार्रवाई की पारदर्शिता और दंडात्मक प्रभावशीलता को कैसे बेहतर बनाया जाए। केवल शिकायत दर्ज करने की व्यवस्था पर्याप्त नहीं है; शिकायतकर्ता को निष्पक्ष सुनवाई, समयबद्ध जांच और कार्रवाई की स्पष्ट जानकारी मिलना भी जरूरी है।

प्रस्तावित समिति के सामने यह अवसर होगा कि वह शिकायतों के निस्तारण की प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी और जवाबदेह बनाने, उल्लंघनों का उचित रिकॉर्ड रखने तथा कंपनियों और संबंधित व्यक्तियों की जिम्मेदारी स्पष्ट करने के उपाय सुझाए।

यहां मूल प्रश्न डॉक्टर बनाम फार्मा कंपनी का नहीं, बल्कि मरीज के हित बनाम अनुचित व्यावसायिक प्रभाव का है। डॉक्टरों को कठिन परिस्थितियों में सेवा देने वाले पेशेवरों के रूप में सम्मान मिलना चाहिए। किसी आरोप के आधार पर पूरे चिकित्सा समुदाय पर संदेह करना उचित नहीं होगा। लेकिन जहां किसी व्यक्ति या कंपनी के विरुद्ध अनैतिक गतिविधियों के प्रमाण मिलते हैं, वहां निष्पक्ष जांच और नियमानुसार कार्रवाई भी उतनी ही जरूरी है।

29 जनवरी 2027 पर टिकी निगाहें

अब इस मामले में अगली महत्वपूर्ण तारीख 29 जनवरी 2027 है। उस दिन केंद्र सरकार के अनुपालन हलफनामे के आधार पर समिति के गठन और आगे की कार्रवाई की स्थिति पर विचार किया जाना है।

यह सुनवाई इस व्यापक नीति-प्रश्न के लिए महत्वपूर्ण हो सकती है कि क्या यूसीपीएमपी 2024 जैसी नैतिक संहिता पर्याप्त है या फार्मास्युटिकल कंपनियों की मार्केटिंग गतिविधियों को नियंत्रित करने के लिए संसद द्वारा बनाया गया अधिक स्पष्ट, बाध्यकारी और प्रभावी कानूनी ढांचा आवश्यक है।

समिति की सिफारिशें सामने आने के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि सरकार किस दिशा में आगे बढ़ती है। इसलिए फिलहाल किसी नए कानून के बन जाने या फार्मा कंपनियों पर नए दंडात्मक प्रावधान लागू हो जाने का निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी। अभी प्रमुख मुद्दा नियमन की जरूरत, मौजूदा व्यवस्था की सीमाओं और भविष्य के संभावित कानूनी उपायों की समीक्षा है।

निष्कर्ष: डॉक्टर की कलम पर प्रभाव नहीं, मरीज का हित सर्वोपरि

यदि पूरे घटनाक्रम का समग्र विश्लेषण किया जाए, तो स्पष्ट होता है कि चिकित्सा व्यवस्था का मूल मंत्र मरीज का हित होना चाहिए। मरीज केवल ग्राहक नहीं, बल्कि उपचार और सम्मान का अधिकार रखने वाला इंसान है। डॉक्टर केवल दवा लिखने वाला व्यक्ति नहीं, बल्कि स्वास्थ्य का संरक्षक है। वहीं, फार्मास्युटिकल उद्योग को व्यावसायिक लाभ कमाने का अधिकार है, लेकिन यह लाभ मरीज के हित, वैज्ञानिक प्रमाणों और चिकित्सकीय निर्णय की स्वतंत्रता से ऊपर नहीं हो सकता।

सुप्रीम कोर्ट की यह पहल इसी विश्वास को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। इसका उद्देश्य किसी पूरे उद्योग या चिकित्सा समुदाय को दोषी ठहराना नहीं, बल्कि ऐसी व्यवस्था की आवश्यकता पर विचार करना है, जिसमें अनुचित प्रलोभनों पर प्रभावी नियंत्रण हो और मरीजों के हितों की रक्षा सुनिश्चित की जा सके।

आखिरकार, डॉक्टर की कलम पर किसी उपहार, विदेशी यात्रा या निजी लाभ का प्रभाव नहीं होना चाहिए। उसका मार्गदर्शन मरीज की वास्तविक जरूरत, वैज्ञानिक प्रमाण और चिकित्सा नैतिकता से होना चाहिए। यदि प्रस्तावित विशेषज्ञ समिति इस दिशा में व्यावहारिक और प्रभावी सुझाव देती है, तो यह भारत की स्वास्थ्य व्यवस्था में पारदर्शिता, जवाबदेही और मरीज-केंद्रित उपचार को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल साबित हो सकती है।

लेखक परिचय: एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी, गोंदिया, महाराष्ट्र — विशेषज्ञ स्तंभकार, साहित्यकार, अंतरराष्ट्रीय लेखक, चिंतक, कवि, संगीत माध्यमा एवं सीए (एटीसी)।