
नई दिल्ली (राष्ट्र की परम्परा डेस्क)। अमेरिका और भारत के बीच व्यापार तथा रणनीतिक रिश्तों में उतार-चढ़ाव का इतिहास नया नहीं है। मौजूदा दौर में रूस से भारत के ऊर्जा और व्यापारिक संबंधों को लेकर अमेरिकी प्रतिबंधों या अतिरिक्त टैरिफ की संभावनाओं पर चर्चा हो रही है। ऐसे समय में 1998 के पोखरण-II परमाणु परीक्षणों के बाद भारत पर लगाए गए अमेरिकी प्रतिबंधों का दौर एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक संदर्भ प्रस्तुत करता है।
मई 1998 में भारत के परमाणु परीक्षणों के बाद तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन प्रशासन ने भारत पर व्यापक प्रतिबंध लगाए थे। ये कदम अमेरिकी कानून के तहत अनिवार्य थे और इनमें विदेशी सहायता, कुछ ऋण एवं क्रेडिट, सैन्य सहयोग, रक्षा सामग्री तथा कुछ संवेदनशील तकनीक के निर्यात पर रोक जैसी पाबंदियां शामिल थीं। अमेरिका ने अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों के जरिए भारत को मिलने वाली गैर-मानवीय सहायता के खिलाफ भी रुख अपनाया था।
पोखरण-II के बाद बढ़ा भारत-अमेरिका तनाव
11 मई 1998 को राजस्थान के पोखरण में भारत ने तीन भूमिगत परमाणु परीक्षण किए। इसके बाद 13 मई को दो और परीक्षण किए गए। इन परीक्षणों को ‘ऑपरेशन शक्ति’ के नाम से जाना गया।
भारत सरकार ने परीक्षणों को राष्ट्रीय सुरक्षा से जोड़ते हुए अपनी परमाणु क्षमता को देश की सुरक्षा जरूरतों का हिस्सा बताया। दूसरी ओर, अमेरिका ने इन परीक्षणों को परमाणु अप्रसार व्यवस्था के लिए गंभीर चुनौती माना और तत्काल प्रतिबंध लागू किए। अमेरिकी विदेश विभाग के तत्कालीन रिकॉर्ड में कहा गया कि प्रतिबंधों का उद्देश्य भारत को आगे परमाणु परीक्षण और परमाणु हथियारों से जुड़ी गतिविधियों पर रोक लगाने के लिए प्रेरित करना था।
क्या-क्या प्रतिबंध लगाए गए थे?
13 मई 1998 को अमेरिका ने ‘आर्म्स एक्सपोर्ट कंट्रोल एक्ट’ की धारा 102, जिसे ग्लेन अमेंडमेंट के नाम से जाना जाता है, के तहत भारत पर प्रतिबंधों की घोषणा की।
इनमें अमेरिकी सरकारी सहायता पर रोक, रक्षा सामग्री और रक्षा सेवाओं की बिक्री पर प्रतिबंध, विदेशी सैन्य वित्तपोषण रोकना, अमेरिकी सरकारी ऋण एवं क्रेडिट पर पाबंदी तथा अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों से मिलने वाली कुछ गैर-मानवीय वित्तीय सहायता के खिलाफ अमेरिकी विरोध शामिल था। कुछ संवेदनशील वस्तुओं और तकनीकों के निर्यात पर भी नियंत्रण लगाया गया।
इन प्रतिबंधों का असर भारत-अमेरिका आर्थिक और रक्षा सहयोग पर पड़ा। हालांकि, अमेरिकी नीति में समय के साथ कुछ प्रतिबंधों में छूट भी दी गई। अक्टूबर 1999 में अमेरिकी प्रशासन ने कुछ गतिविधियों के लिए ग्लेन अमेंडमेंट से जुड़े प्रतिबंधों में राहत दी थी।
भारत ने जारी रखा अपना रास्ता
प्रतिबंधों के बावजूद भारत ने परमाणु नीति में तत्काल बदलाव नहीं किया। तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने संसद में परीक्षणों का बचाव करते हुए राष्ट्रीय सुरक्षा को निर्णय का प्रमुख आधार बताया था।
इस दौरान भारत ने अमेरिका के साथ संवाद भी बंद नहीं किया। दोनों देशों के बीच परमाणु अप्रसार, सुरक्षा और द्विपक्षीय संबंधों को लेकर लगातार बातचीत चलती रही। अमेरिकी विदेश विभाग के रिकॉर्ड के अनुसार, इस संवाद का उद्देश्य मतभेदों के बावजूद दोनों देशों के बीच संपर्क बनाए रखना था।
क्लिंटन की भारत यात्रा से बदले रिश्तों के संकेत
प्रतिबंधों के दौर में भी भारत और अमेरिका के बीच कूटनीतिक संपर्क जारी रहा। वर्ष 2000 में राष्ट्रपति बिल क्लिंटन भारत की यात्रा पर आए। यह यात्रा दोनों देशों के संबंधों में एक महत्वपूर्ण पड़ाव बनी और इससे संकेत मिला कि परमाणु विवाद के बावजूद द्विपक्षीय संबंधों में संवाद की गुंजाइश बनी हुई है।
इसके बाद अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों में भी बदलाव आया। 2001 में अमेरिका ने भारत और पाकिस्तान पर लागू ग्लेन अमेंडमेंट से जुड़े परमाणु प्रतिबंधों में व्यापक राहत दी।
22 सितंबर 2001 को प्रतिबंधों में मिली बड़ी राहत
22 सितंबर 2001 को राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू. बुश ने भारत और पाकिस्तान पर लागू ग्लेन अमेंडमेंट से जुड़े प्रतिबंधों को माफ कर दिया। अमेरिकी विदेश विभाग के रिकॉर्ड के अनुसार, इससे अमेरिकी सरकारी सहायता, क्रेडिट, रक्षा बिक्री और सैन्य वित्तपोषण सहित कई प्रतिबंधों पर लगी रोक हट गई।
बाद के वर्षों में भारत-अमेरिका संबंधों में लगातार सुधार हुआ। दोनों देशों ने रणनीतिक, रक्षा, तकनीक और परमाणु ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाया। अमेरिकी विदेश विभाग के ऐतिहासिक रिकॉर्ड के अनुसार, 2001 के बाद दोनों देशों के बीच उच्चस्तरीय संपर्क और सहयोग में तेजी आई तथा 2004 में ‘नेक्स्ट स्टेप्स इन स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप’ जैसी पहल सामने आई।
1998 से 2001 तक की कहानी क्या बताती है?
पोखरण-II के बाद लगाए गए अमेरिकी प्रतिबंध तत्काल प्रभाव से भारत-अमेरिका संबंधों में तनाव का कारण बने। इनका असर रक्षा सहयोग, वित्तीय सहायता और कुछ तकनीकी क्षेत्रों पर पड़ा। हालांकि, प्रतिबंध स्थायी नहीं रहे। तीन वर्षों के भीतर अमेरिकी प्रशासन ने प्रमुख परमाणु-संबंधी प्रतिबंधों में व्यापक छूट दे दी और दोनों देशों ने संवाद तथा सहयोग का रास्ता आगे बढ़ाया।
आज भारत-अमेरिका संबंधों का आर्थिक और रणनीतिक महत्व 1998 की तुलना में कहीं अधिक व्यापक है। इसलिए मौजूदा व्यापारिक या प्रतिबंध संबंधी मतभेदों को समझने में 1998-2001 का अनुभव एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक संदर्भ जरूर देता है। हालांकि, उस दौर की परिस्थितियां और आज की वैश्विक अर्थव्यवस्था अलग हैं, इसलिए दोनों स्थितियों को पूरी तरह समान मानना उचित नहीं होगा।
अभिषेक कुमार
