Wednesday, March 11, 2026
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बीज पर कारपोरेट कब्ज़ा: किसान अधिकारों के लिए बढ़ता खतरा

बीज संशोधन बिल–2025: किसान, बीज संप्रभुता और खाद्य सुरक्षा पर मंडराता संकट

लेखक: इंद्रजीत सिंह


बीज संशोधन बिल–2025 के नाम से भारत सरकार के कृषि मंत्रालय द्वारा हाल ही में एक मसौदा जारी किया गया, जिस पर 11 दिसंबर तक सार्वजनिक सुझाव आमंत्रित किए गए थे। इस प्रस्तावित कानून को केवल तकनीकी या प्रशासनिक सुधार के रूप में नहीं, बल्कि व्यापक आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में देखे जाने की आवश्यकता है। वर्तमान दौर में केंद्र सरकार नव-उदारवादी नीतियों के तहत लगातार ऐसे कदम उठा रही है, जिनसे सार्वजनिक क्षेत्र, किसान-मजदूर और आम जनता के अधिकारों का क्षरण होता जा रहा है। बिजली संशोधन बिल, चार लेबर कोड, मनरेगा को कमजोर करने की कोशिशें और कृषि मंडी विपणन का राष्ट्रीय प्रारूप—ये सभी उसी नीति-धारा के उदाहरण हैं।

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बीज कृषि का मूल आधार है और कृषि भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़। इसलिए बीज या “प्लांट मैटर” मात्र एक व्यापारिक वस्तु नहीं, बल्कि किसान की पीढ़ियों से संजोई गई विरासत है। बीज पर नियंत्रण का अर्थ है—कृषि, भोजन और जीवन पर नियंत्रण। यही कारण है कि बहुराष्ट्रीय और देशी कारपोरेट कंपनियां बीज से जुड़े राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय कानूनों में अपने पक्ष में बदलाव कराने के लिए निरंतर दबाव बना रही हैं। दिसंबर 2025 में जारी यह मसौदा भी उसी दिशा में एक खतरनाक कदम प्रतीत होता है।
इतिहास गवाह है कि बीज का संरक्षण और विकास मानव सभ्यता से भी पुराना है। महिलाओं की भूमिका इसमें विशेष रूप से महत्वपूर्ण रही है। जलवायु, मिट्टी, वर्षा, सूखा, कीट और रोगों से जूझते हुए बीजों ने लाखों वर्षों में अपने भीतर प्राकृतिक प्रतिरोधक क्षमता विकसित की है। किसान परंपरागत रूप से खेतों में श्रेष्ठ पौधों का चयन कर अगली पीढ़ी के लिए बीज बचाता रहा है। वैज्ञानिक शब्दावली से पहले भी किसान स्वयं एक प्रयोगधर्मी वैज्ञानिक था।

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आधुनिक कृषि विज्ञान और जेनेटिक इंजीनियरिंग ने बीज प्रजनन को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया है। संकर और हाइब्रिड किस्मों के माध्यम से उत्पादन बढ़ा, लेकिन इसके साथ ही जोखिम भी बढ़े। जीएम बीजों को लेकर उठे विवाद, बीटी कॉटन और गुलाबी सुंडी का उदाहरण इस बात का प्रमाण हैं कि कारपोरेट हितों के लिए की गई जल्दबाजी किसानों को भारी नुकसान पहुंचा सकती है।
हरित क्रांति (1960–65) के दौर में भारत ने खाद्यान्न आत्मनिर्भरता हासिल की, जिसमें सरकारी कृषि अनुसंधान, विश्वविद्यालयों और सार्वजनिक संस्थानों की केंद्रीय भूमिका थी। उस समय बीज, उर्वरक और दवाओं पर निजी कंपनियों का वर्चस्व नहीं था। लेकिन बाद के वर्षों में कृषि क्षेत्र में निजी पूंजी का प्रवेश बढ़ा और सरकारी संस्थानों को धीरे-धीरे कमजोर किया गया। आज स्थिति यह है कि लगभग 70 प्रतिशत बीज बाजार निजी कंपनियों के नियंत्रण में है और मात्र चार बहुराष्ट्रीय कंपनियां—बायर, कार्टेवा, सिंजेंटा और बीएएसएफ—56 प्रतिशत बाजार पर कब्जा किए हुए हैं।

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बीज अधिनियम 1966 के तहत बीज की गुणवत्ता, पंजीकरण, बिक्री और किसान के अधिकारों की रक्षा के प्रावधान थे। किसान को बीज बचाने, बेचने, बदलने और विकसित करने का अधिकार प्राप्त था। नए मसौदा बिल में इन अधिकारों को कमजोर करने की आशंका है। मूल्य नियंत्रण का कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं है, जबकि सब्जियों और अन्य फसलों के बीज पहले से ही बेहद महंगे हो चुके हैं।
सबसे चिंताजनक प्रावधान यह है कि विदेशी कंपनियों द्वारा अपने देश में किए गए बीज परीक्षण को भारत में मान्यता देने की बात कही गई है। भिन्न जलवायु और परिस्थितियों में किए गए परीक्षण भारतीय कृषि के लिए कितने उपयुक्त होंगे, यह गंभीर प्रश्न है। साथ ही, यदि कोई पंजीकृत कंपनी अपने गुणवत्ता दावों पर खरी नहीं उतरती, तो उस पर आपराधिक कार्रवाई न होना किसानों के हितों के खिलाफ है।
संसद में दिए गए आंकड़ों के अनुसार 2022 से 2025 के बीच 43,001 बीज नमूने गुणवत्ता परीक्षण में विफल पाए गए। ऐसे में बीज संशोधन बिल–2025 यदि बिना व्यापक विमर्श और सुधार के लागू हुआ, तो यह बीज संप्रभुता, किसान अधिकार और राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा को गंभीर खतरे में डाल सकता है।

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अखिल भारतीय किसान सभा ने इस मसौदे पर विस्तार से आपत्तियां दर्ज कराई हैं। मांग की गई है कि केंद्र और राज्य स्तरीय बीज समितियों में किसान प्रतिनिधियों—विशेषकर महिलाओं—को शामिल किया जाए, विदेशी बीजों की बाहरी प्रमाणिकता वाले प्रावधान को हटाया जाए, किसान हितैषी मूल्य निर्धारण सुनिश्चित हो और जमाखोरी व इजारेदारी पर सख्त नियंत्रण लगाया जाए। स्थानीय स्वयं सहायता समूहों और बीज सहकारी समितियों को प्रोत्साहन देने की भी आवश्यकता है।
बीज केवल उत्पादन का साधन नहीं, बल्कि किसान की आज़ादी और देश की खाद्य सुरक्षा का आधार है। इसलिए इस मुद्दे पर देशव्यापी जन-जागरण और लोकतांत्रिक संघर्ष अपरिहार्य है, जैसा कि संयुक्त किसान मोर्चा ने आह्वान किया है।

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