चार प्रकार के जीव संत बतलाते हैं,
इन चारों के लिए चार प्रकार के ही
व्यवहार भी यथानिम्न वताये जाते हैं
सत्पुरुष, शठ, खल और मूर्ख पुरुष।
चारों पुरुषों को जानने व इनकी
प्रकृति को पहचानने की ज़रूरत
होती है तभी उनसे धर्म सम्मत आचार
ब्यवहार से जीवन सुखी रहता है।
सबसे पहले सत्पुरुष की पहचान,
जो संत ह्रदय नवनीत समान होता है
उनको उनके सदव्यवहार से पहचान
कर उनसे ही सत्संग किया जाता है।
दूसरे शठ पुरुष की प्रकृति होती है
यथा “शठ सुधरहिं सत्संगति पायी,”
जो सत्संगति पाकर सुधर जाए उसे
सत्संग द्वारा सुधारने का प्रयत्न करें।
तीसरे हैं खल पुरुष जिनकी प्रकृति है
“जो काहूकी सुनहि बड़ाई,
स्वास लेय जनि जूड़ी आयी,
जो काहूकेँ देखें विपती,
सुखी होंय मानों जग नृपती।”
“खल परिहरहू स्वान की नाई,”
आवारा कुत्ते की तरह ही खलपुरुष
का तिरस्कार किया जाता है, उनपर
कोई प्रतिक्रिया नहीं करनी चाहिए।
चौथे मूर्ख पुरुष इनके लिए लिखा है,
“मूरख ह्रदय न चेत जो गुरु मिलै
विरंचि सम, फूलहिं फलहिं न बेंत,
जदपि सुधा बरसहिं जलद”।
अर्थात् ब्रह्मा समान गुरु मिल जाये
पर उसके विचार व आचरण बदलें
तो उससे बात करना मूर्ख के अंदर
अपनी छवि खोजने के समान होगा।
अपने आस पास इनमे से कैसे लोग हैं,
आदित्य इसको पहचानें और उनसे
उसी के अनुसार व्यवहार करें तो मन
को काफी सुख व शान्ति प्राप्त होगी।
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